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लेबर कोड 2025 : श्रमिक गरिमा और सामाजिक न्याय की दिशा में एक निर्णायक मोड़

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लेबर कोड 2025 केवल कानून में बदलाव नहीं, बल्कि भारत के श्रम परिदृश्य में संरचनात्मक सुधार की शुरुआत है। न्यूनतम वेतन की एकरूपता, स्वास्थ्य सुरक्षा, सामाजिक संरक्षण और असंगठित क्षेत्र के करोड़ों मजदूरों के लिए नई गारंटियाँ—इन सबके बावजूद असली चुनौती इन अधिकारों को ज़मीन तक पहुँचाने और श्रमिक गरिमा को वास्तविक रूप देने की है।


कृष्णार्जुन बर्वे

लेबर कोड 2025 का लागू होना भारत के श्रमिक वर्ग के लिए सिर्फ एक प्रशासनिक या कानूनी बदलाव नहीं है, बल्कि श्रम जगत में संरचनात्मक परिवर्तन की दिशा में उठाया गया महत्वपूर्ण कदम है। दशकों से देश के श्रमिक न्यूनतम वेतन, सामाजिक सुरक्षा, स्वास्थ्य संरक्षण, कार्यस्थल पर सुरक्षा मानकों और सम्मानजनक माहौल जैसी बुनियादी ज़रूरतों के लिए संघर्ष करते आए हैं। भारत की अर्थव्यवस्था को अपने कंधों पर ढोने वाले इन मजदूरों की स्थिति विडंबनापूर्ण रूप से कमजोर रही है। नए लेबर कोड का उद्देश्य इन जटिल और बिखरी हुई समस्याओं को एक समग्र ढांचे में देखकर समाधान विकसित करना है, जो इस बात को मान्यता देता है कि मजदूर केवल उत्पादन की इकाई नहीं, बल्कि समाज और अर्थव्यवस्था की सबसे मजबूत नींव हैं।

नए प्रावधान इस बात को रेखांकित करते हैं कि कानून अब श्रमिकों की गरिमा को केंद्र में रखकर आगे बढ़ना चाहता है। राष्ट्रीय स्तर पर न्यूनतम वेतन में एकरूपता की व्यवस्था तय करना लंबे समय से अपेक्षित था, क्योंकि राज्यों में न्यूनतम वेतन की असंगति का परिणाम अक्सर मजदूरों के शोषण के रूप में सामने आता था। इसी तरह 40 वर्ष से अधिक आयु के श्रमिकों के लिए वार्षिक स्वास्थ्य जांच को अनिवार्य करना केवल स्वास्थ्य सुरक्षा ही नहीं, बल्कि कार्य–संबंधी बीमारियों की रोकथाम की दिशा में महत्वपूर्ण कदम है। ग्रेचुइटी का अधिकार केवल एक वर्ष के कार्यकाल के बाद मिलना उन लाखों श्रमिकों के लिए राहत है, जो असंगठित या अर्ध–संगठित क्षेत्रों में अल्पकालिक रोजगार पर निर्भर रहते हैं। सुरक्षा मानकों की स्पष्ट परिभाषा, प्रवासी और असंगठित श्रमिकों के लिए सामाजिक सुरक्षा कवरेज का विस्तार—ये सभी सुधार मिलकर कार्य–संबंधी गरिमा की उस अवधारणा को साकार करते हैं, जिसकी बात अंतरराष्ट्रीय स्तर पर वर्षों से होती रही है।

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लेकिन इन बदलावों की सफलता का असली पैमाना यही है कि क्या ये अधिकार वास्तव में ज़मीन तक पहुँच पाएंगे। भारत की कार्यशक्ति का लगभग 90 प्रतिशत हिस्सा असंगठित क्षेत्र में काम करता है, जहाँ श्रम संबंध या तो लिखित नहीं होते या फिर पूरी तरह संविदात्मक और अनिश्चित। नाका श्रमिकों से लेकर घरेलू कामगारों, प्रवासी मजदूरों, छोटी औद्योगिक इकाइयों, दुकानों, निर्माण स्थलों और परिवहन क्षेत्र से जुड़े लाखों श्रमिकों का जीवन ऐसे ढाँचे के भीतर बीतता है जिसमें वेतन, सुरक्षा और शिकायत निवारण जैसी मूलभूत बातें भी सुनिश्चित नहीं होतीं। कागज़ों पर लिखे अधिकार तभी वास्तविक मायने रखते हैं जब निरीक्षण, पारदर्शिता और शिकायत–निवारण की मजबूत व्यवस्था उसके पीछे खड़ी हो।

इसी वजह से श्रम विभाग की क्षमता को सुदृढ़ करना इस कोड की सफलता की पूर्वशर्त है। निरीक्षण प्रणाली पारदर्शी, तकनीक–आधारित और जवाबदेह बने, यह अत्यंत आवश्यक है। ऑनलाइन शिकायत प्रणाली सुलभ और समय–बद्ध होनी चाहिए ताकि मजदूर न सिर्फ शिकायत कर सकें बल्कि उसके निपटान की जानकारी भी पा सकें। राज्यों द्वारा संबंधित नियमों (Rules) का समय पर बनना और लागू करना भी उतना ही आवश्यक है, क्योंकि कोड तभी प्रभावी बनेगा जब केंद्र और राज्य दोनों समन्वित रूप से काम करें। उद्योगों के भीतर भी यह समझ विकसित होनी चाहिए कि श्रमिक अधिकार कोई ‘अतिरिक्त बोझ’ नहीं, बल्कि बेहतर उत्पादकता, स्थिर कार्य–बल और सामाजिक सुरक्षा का आधार हैं।

इस पूरी प्रक्रिया की रीढ़ है—श्रमिकों की जागरूकता। चाहे कानून कितना ही परिष्कृत क्यों न हो, यदि मजदूर ही अपने अधिकारों से अनभिज्ञ रहेंगे, तो वे उनका लाभ नहीं ले पाएंगे। यही कारण है कि स्थानीय संगठनों, ट्रेड यूनियनों, सामाजिक कार्यकर्ताओं, सामुदायिक समूहों और नागरिक समाज की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण हो जाती है। यह वही तंत्र है जो मजदूरों के बीच जाकर उन्हें कानून, योजनाओं और उपलब्ध सुविधाओं की जानकारी देता है और उनकी सामूहिक आवाज़ को मजबूत बनाता है। श्रमिकों की सक्रिय भागीदारी ही किसी कानून को जीवंत बनाती है।

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लेबर कोड 2025 एक अवसर लेकर आया है—वास्तविक परिवर्तन का अवसर। यह केवल कागज़ों पर दर्ज सुधारों का संग्रह नहीं, बल्कि परिस्थिति बदलने की संभावना का द्वार है। मगर यह तभी सार्थक होगा जब कोड की भावना फाइलों, बैठकों और घोषणाओं से निकलकर वास्तव में सड़क, निर्माण स्थल, फैक्ट्री, गोदाम, नाका, चौराहे और मजदूर बस्तियों तक पहुँचे। असली न्याय उसी दिन होगा जब हर श्रमिक यह महसूस करेगा कि कानून उसके साथ खड़ा है—उसकी मेहनत की क़ीमत, उसके हक़ और उसकी गरिमा की रक्षा करने के लिए।

इसलिए ज़रूरी है कि सरकार, उद्योग, समाज और संगठन मिलकर ऐसा वातावरण तैयार करें जहाँ श्रमिक अधिकार केवल चर्चा का विषय नहीं, बल्कि उनके जीवन की वास्तविकता बनें। भारत का विकास तभी स्थायी और न्यायपूर्ण माना जाएगा जब देश की प्रगति का लाभ उन हाथों तक पहुँचे जो इसकी नींव रखते हैं। जहां श्रमिक की गरिमा सुरक्षित है, वहीं एक समावेशी और संवेदनशील भारत का निर्माण संभव है। लेबर कोड 2025 इसी दिशा में उठाया गया एक निर्णायक कदम है—एक बेहतर, न्यायपूर्ण और श्रमिक–सम्मान वाले भविष्य की ओर।

कृष्णार्जुन बर्वे पिछले 2 दशक से सामाजिक क्षेत्र में सक्रिय है। आजकल आजीविका ब्यूरो के काम में जुड़े है।

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