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फार्मा कंपनियों की मनमानी पर लगाम जरूरी : फार्मास्युटिकल मार्केटिंग की समान संहिता कानूनी रूप से अनिवार्य हो – सुप्रीम कोर्ट में याचिका

नई दिल्ली, 2 मई । भारत में दवा कंपनियों की अनैतिक विपणन प्रथाओं पर रोक लगाने के लिए फेडरेशन ऑफ मेडिकल एंड सेल्स रिप्रेजेंटेटिव्स ऑफ इंडिया (FMSRAI) और जन स्वास्थ्य अभियान इंडिया से जुड़े अमिताव गुहा ने सुप्रीम कोर्ट में जनहित याचिका दायर की है। इस याचिका की सुनवाई आज न्यायमूर्ति विक्रम नाथ, न्यायमूर्ति संजय करोल और न्यायमूर्ति संदीप मेहता की पीठ के समक्ष हुई।

याचिकाकर्ता अमिताव गुहा की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता संजय पारीख ने तर्क दिया कि वर्तमान में मौजूद स्वैच्छिक ‘फार्मास्युटिकल मार्केटिंग प्रैक्टिसेज की समान संहिता (UCPMP)’ पूरी तरह अप्रभावी रही है और इसे कानूनी रूप से बाध्यकारी बनाया जाना आवश्यक है।

उन्होंने कहा कि अगर डॉक्टरों द्वारा रिश्वत लेने – जैसे मुफ्त उपहार, विदेश यात्राएँ या अन्य सुविधाएं स्वीकार करने – को अवैध माना जाता है, तो फिर ऐसी रिश्वत देने वाली फार्मा कंपनियों के खिलाफ भी कानूनी कार्रवाई संभव होनी चाहिए। याचिका में यह भी बताया गया है कि दवाओं की कुल लागत में से लगभग 20% हिस्सा इन्हीं अनैतिक प्रचार खर्चों में शामिल होता है।

पीठ ने इस विषय पर गंभीर टिप्पणी करते हुए कहा कि यदि डॉक्टरों के लिए जेनेरिक दवाएँ लिखना वैधानिक रूप से अनिवार्य है, तो वे महँगी ब्रांडेड दवाएँ नहीं लिख सकते। पीठ ने राजस्थान हाई कोर्ट के एक फैसले का भी हवाला दिया, जहाँ केवल जेनेरिक दवाएँ लिखने के निर्देश दिए गए थे। माननीय न्यायाधीशों ने सुझाव दिया कि यदि देशभर में केवल जेनेरिक दवाओं के लिखने की बाध्यता लागू हो, तो अनैतिक मार्केटिंग से जुड़ी अधिकांश समस्याएँ स्वतः सुलझ सकती हैं।

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हालांकि केंद्र सरकार ने पूर्व में इस मुद्दे पर एक उच्चस्तरीय समिति गठित की थी, लेकिन याचिकाकर्ताओं का कहना है कि अब तक कोई ठोस कदम नहीं उठाया गया है। उन्होंने यह आग्रह भी किया कि जब तक कोई विधिक ढांचा लागू नहीं होता, तब तक सुप्रीम कोर्ट फार्मा कंपनियों की विपणन गतिविधियों को नियंत्रित करने के लिए स्पष्ट दिशानिर्देश जारी करें।

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