प्रशांत भूषण और सुप्रीम कोर्ट की अवमानना

विनीत जार्ज

ख्‍यात वकील प्रशांत भूषण पर सुप्रीमकोर्ट द्वारा ‘सुओ मोटो’ यानि अपनी पहल पर अवमानना का प्रकरण दर्ज करने और उस पर सुनवाई करके उन्‍हें दोषी करार देने ने देशभर में बवाल खडा कर दिया है। इसमें एक तरफ आजादी के बाद जनहित में सर्वाधिक याचिकाएं लगाने और अधिकांश में जीतने वाले प्रशांत भूषण हैं और दूसरी तरफ न्‍यायपालिका की सर्वोच्‍च संस्‍था सुप्रीमकोर्ट। क्‍या इसमें अदालत प्रशांत भूषण को सजा देकर अपनी श्रेष्‍ठता कायम रख पाएगी? या गांधी के रास्‍ते को अपनाने वाले भूषण देश के नागरिकों के सामने खुद को निर्दोष साबित कर पाएंगे?

सुप्रीमकोर्ट के वकील, प्रशांत भूषण को सर्वोच्य न्यायालय द्वारा ‘न्यायालयीन अवमानना’ का दोषी ठहराए जाने पर, व्यक्ति के अभिव्यक्ति के मौलिक अधिकार और इस अधिकार की रक्षा में सर्वोच्च न्यायालय की पिछले सालों की भूमिका पर फिर बहस छिड गयी है। प्रशांत भूषण ने 27 जून को पहला ट्वीट किया था। इसमें उन्होंने कहा था कि जब इतिहासकार भारत में बीते छह सालों के इतिहास को देखेंगे तो पाएंगे कि कैसे बिना इमरजेंसी के देश में लोकतंत्र को खत्म किया गया। ये इतिहासकार सुप्रीम कोर्ट के, खासकर चार पूर्व मुख्‍य न्‍यायाधीशों की भूमिका पर सवाल उठाएंगे। प्रशांत भूषण ने अपने दूसरे ट्वीट में मौजूदा मुख्‍य न्‍यायाधीश एसए बोबडे की ‘हार्ले डेविडसन मोटरसाइकल’ के साथ फोटो शेयर की, जिसमें उन्होंने बोबडे की आलोचना करते हुए लिखा कि उन्होंने कोरोना काल में अदालतों को बंद करने का आदेश दिया है।

इन्ही दो ट्वीट के आधार पर सर्वोच्च न्यायालय ने प्रशांत भूषण को न्यायालय की अवमानना का दोषी पाया है। ‘कंटेम्‍प्‍ट ऑफ़ कोर्ट्स ऐक्ट-1971’ के तहत इस मामले में प्रशांत भूषण को अधिकतम छह माह तक की सजा हो सकती है या फिर दो हज़ार रूपये का जुर्माना लगाया जा सकता है या फिर एक साथ दोनों सजा सुनाई जा सकती है

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प्रशांत भूषण के खिलाफ अवमानना याचिका स्वीकार करने एवं 108 पेज लम्बे निर्णय द्वारा दोषी ठहराए जाने की इस घटना के मद्देनजर कुछ विधिक एवं राजनीतिक महत्व के सवाल खड़े हो गए हैं। विधिक आधार पर कई विधिवेत्ताओं ने इस निर्णय की आलोचना की है। संविधान विशेषज्ञ और वकील नवरोज़ सीरवाई के मतानुसार याचिका की कार्यवाही उन्हीं न्‍यायमूर्ति अरुण मिश्रा की बेंच में लगी है जिनका प्रशांत भूषण के साथ तनावपूर्ण सम्बन्ध होने और अवमानना की ताकीद देने की पृष्ठभूमि रही है। इससे यह याचिका, स्‍वयमेव ‘पक्षपात के सिद्धान्‍तों’ का उल्‍लंघन करती है। मुख्य रूप से यह कहा गया है कि अवमानना की याचिका पर दिया गया निर्णय, ‘मेरिट्स ऑफ़ डेफेंसेस’ याने गुण-दोष के आधार पर खरा नहीं उतरता क्योंकि वह प्रशांत भूषण द्वारा किये गए ट्वीट पर ठोस रूप से कोई राय कायम करने में सफल नहीं होता।

जिन दो ट्वीट्स के आधार पर प्रशांत भूषण को दोषी ठहराया जा रहा है, उनकी विवेचना करते हुए, नवरोज़ सिरवाई लिखते हैं कि उनमें से एक ट्वीट, जो मुख्‍य न्‍यायाधीश के बिना मास्क लगाये मोटर-साइकिल पर बैठने के बारे में है, वह तथ्यात्मक बात है, जिसकी पुष्टि की जा सकती है। किसी तथ्यपरक बात को दोहराना अवमानना के दायरे में नहीं आता। दूसरा ट्वीट, जो कि पिछले छह वर्षों के चार मुख्‍य न्‍यायाधीशों के कार्यकाल पर टिप्पणी करता है, वह प्रशांत भूषण का अपना मत है और “कमेंट्री” के दायरे में आता है। अटॉर्नी जनरल की अधिकृत अनुमति के आभाव के चलते यह याचिका, अरविन्द दत्तर के अनुसार, ‘कंटेम्‍प्‍ट ऑफ कोर्ट’ कानून का ही उल्‍लंघन करती है।

आये दिन ही ऐसे मामले सामने आते हैं जिनमें सरकार को न्‍यायालयीन अवमानना का दोषी पाया जा सकता है, परन्तु इन मामलों में सरकारी अफसरों पर कोई कार्यवाही नहीं होती। ऐसे में एक व्यक्ति के दो ट्वीट को, महामारी के कठिन समय में भी, प्राथमिकता से अंजाम देना न्यायालय को पक्षपात पूर्ण रवैये के दायरे में लाता है। खासतौर पर तब, जबकि यह ट्वीट उसी बात को दोहराते नज़र आते हैं जो सर्वोच्‍च न्यायालय के ही न्‍यायमूर्तियों द्वारा सार्वजनिक रूप से रेखांकित की गयी थी।

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न्‍यायविद् और दिल्‍ली विश्‍वविद्यालय के पूर्व उप-कुलपति डॉ. उपेन्द्र बक्षी ने इस ओर भी ध्‍यान आकर्षित किया है कि यह निर्णय उस विवादास्पद ब्रिटिश निर्णय का उल्लेख करता है जिसके ‘राजा और उसके दिये निर्णयों’ के अवमाना की त्रुटिपूर्ण अवधारण छुपी हुई थी। यह विडम्बना ही है कि आज 21वीं शताब्दी के लोकतान्त्रिक समाज में भी, राजशाही से कड़े संघर्ष के उपरांत मौलिक अधिकारों का चार्टर एक बार फिर से अधिनायकवादी ताकतों के समक्ष नतमस्तक है। संविधान में न्यायालय की भूमिका मौलिक अधिकारों के संरक्षक के रूप में स्थापित है, परन्तु जब सर्वोच्य न्यायालय स्वयं ही नागरिकों के मौलिक अधिकारों के हनन में लग जाये तो आगे अपील की कोई गुंजाइश समाप्त ही हो जाती है।

प्रशांत भूषण को सर्वोच्च न्यायालय द्वारा, न्यायालय की अवमाना का दोषी ठहराया जाना, अपने आप में एक एतिहासिक क्षण है। इसकी तुलना महात्मा गाँधी को अंग्रेजों द्वारा राजद्रोह का दोषी करार दिए जाने की घटना से करना अतिश्योक्ति नहीं होगी। गाँधी के ‘आग्रह की परंपरा’ को आगे बढ़ाते हुए, अपने ट्वीट पर कायम प्रशांत भूषण ने दुर्लभ साहस और ईमानदारी  का परिचय दिया है और स्वयं को न्यायालय के समक्ष प्रस्तुत किया है। दरअसल प्रशांत भूषण की ट्वीट पर इस प्रकार से अतिवादी प्रतिक्रिया दिखाते हुए न्यायालय ने मानो अपने आप को ही कटघरे में खड़ा कर लिया है। अवमानना याचिका पर बहस के फलस्वरूप उनके ट्वीट का अप्रत्याशित विस्तार हुआ है, जिससे न्यायालय और उसकी गरिमा पर संकट के बादल और भी गहरे हो गए हैं। प्रशांत भूषण को न्यायालय की अवमानना का दोषी पाये जाने का मतलब है, न्यायालय को संविधान की अवमानना का दोषी पाया जाना। इस प्रकरण के ज़रिये, सर्वोच्‍च न्यायालय द्वारा कश्मीर से ‘हेबियस कार्पस’ याचिकाओं का इंकार, धारा-370 का निराकरण, ‘नागरिकता संशोधन कानून’ (सीएए) की सम्वैधानिकता, कार्यपालिका के अनाधिकृत हस्तक्षेप जैसे तमाम संगीन मामले एक बार फिर सामने आ गए हैं। (सप्रेस)

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