अंतरराष्ट्रीय विचार

युद्ध का यशोगान : रक्षा बजट की दौड़ में उलझती दुनिया

युद्ध का यशोगान : रक्षा बजट की दौड़ में उलझती दुनिया

कुछ लोग पूछते हैं कि ट्रंप की आक्रामक नीतियों पर दुनिया चुप क्यों है। कारण साफ है—जब शक्ति के साथ हथियार और आर्थिक प्रभुत्व जुड़ जाए, तो विरोध जोखिम बन जाता है। अमेरिका के बढ़ते रक्षा बजट, तकनीकी बढ़त और...

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कुछ लोग पूछते हैं कि ट्रंप की आक्रामक नीतियों पर दुनिया चुप क्यों है। कारण साफ है—जब शक्ति के साथ हथियार और आर्थिक प्रभुत्व जुड़ जाए, तो विरोध जोखिम बन जाता है। अमेरिका के बढ़ते रक्षा बजट, तकनीकी बढ़त और हालिया सैन्य कार्रवाइयों ने वैश्विक संतुलन को अस्थिर किया है, जिससे हथियारों की होड़ तेज होने और भारत सहित कई देशों पर दबाव बढ़ने की आशंका गहरा गई है।


संजीव चांदोरकर

कुछ लोग पूछते हैं कि ट्रंप की इस दादागिरी पर कोई राष्ट्र प्रतिक्रिया क्यों नहीं देता? यदि कोई पागल व्यक्ति सिर्फ बड़बड़ा रहा हो या भद्दी गालियां दे रहा हो, तो लोग उसे नज़रअंदाज़ कर आगे बढ़ जाते हैं। यदि कोई पागल किसी पर झपट रहा हो, तो लोग उसे दो तमाचे मारकर और एक तरफ धकेल कर आगे निकल जाते हैं। लेकिन जब किसी पागल के हाथ में धारदार चाकू या पिस्तौल हो और वह धमकी भरे लहजे में बात करने लगे, तो लोग घबरा जाते हैं। तब बड़े-बड़ों को भी समझ नहीं आता कि आखिर किया क्या जाए। डोनाल्ड ट्रंप की दुनिया के कई देशों पर जारी ‘सशस्त्र दादागिरी’ इसी तीसरे प्रकार की है।

पिछले कई वर्षों से दुनिया के लगभग सभी देशों का कुल सैन्य खर्च (रक्षा व्यय) लगातार बढ़ रहा है। ‘स्टॉकहोम इंटरनेशनल पीस रिसर्च इंस्टीट्यूट’ (सिप्री) नामक संस्था इस संबंध में आंकड़े जारी करती रहती है। वर्ष 2024 में दुनिया का कुल सैन्य खर्च 2,700 बिलियन डॉलर था। इसमें अकेले अमेरिका का हिस्सा 900 बिलियन डॉलर था—यानी पूरी दुनिया के कुल खर्च का एक-तिहाई! (भारत का वर्तमान रक्षा बजट 78 बिलियन डॉलर है)। ये आंकड़े तो सिर्फ एक साल के हैं; सोचिए, कई वर्षों का संचयी खर्च कितना होगा।

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राष्ट्र की सैन्य शक्ति के मापदंड अब बदल गए हैं।  पहले तुलना इस आधार पर होती थी कि किसके पास कितनी पैदल सेना है, लेकिन अब ऐसा नहीं है। अब इसकी जगह यह देखा जाता है कि किस राष्ट्र के पास दूर से वार करने वाली मारक क्षमता, उपग्रह और आधुनिक इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों से लैस कितनी विनाशकारी शक्ति है। आज का युग डिफेंस टेक्नोलॉजी का है, और अमेरिका इसमें दुनिया के कई अन्य देशों से बहुत आगे है।

ट्रंप ने साल 2027 के लिए 1,500 बिलियन डॉलर (1.5 ट्रिलियन डॉलर) का रक्षा बजट प्रस्तावित किया है। इस बजट का एक बहुत बड़ा हिस्सा वायुसेना, लंबी दूरी की मारक क्षमता और अन्य संबंधित सैन्य साजो-सामान के लिए आवंटित किया जाएगा। ट्रंप अपनी सैन्य शक्ति के बल पर क्या कर सकते हैं, इसकी झलक हमने वेनेजुएला में देखी है, जहाँ जनवरी 2026 में अमेरिकी सेना ने एक ऑपरेशन कर राष्ट्रपति निकोलस मादुरो को हिरासत में ले लिया। इससे पहले, जून 2025 में ईरान के परमाणु केंद्रों पर भी भीषण हवाई हमले किए गए थे। आज भी ईरान को लगातार धमकियाँ दी जा रही हैं।

ग्रीनलैंड पर सैन्य ताकत के दम पर कब्ज़ा करने की बात कहकर ट्रंप फिलहाल भले ही पीछे हट गए हों, लेकिन भविष्य में वे ऐसा कुछ नहीं करेंगे, इसकी कोई गारंटी नहीं है। ऐसी कई और घटनाएं भी संभव हैं। रक्षा बजट में इस भारी वृद्धि के कारण अमेरिका पर पहले से ही लदा कर्ज का बोझ भविष्य में कुछ और ट्रिलियन डॉलर बढ़ सकता है।

इसी बीच, ट्रंप की इन घोषणाओं के कारण अमेरिकी रक्षा कंपनियों के शेयरों में उछाल आने लगा है। आखिर अमेरिका के पास इतना पैसा आता कहाँ से है? डॉलर प्रिंट करके, विज्ञान-तकनीक और शोध के लिए दुनिया की सर्वश्रेष्ठ प्रतिभा को आकर्षित करके और उसे ‘इंडस्ट्रियल-मिलिट्री कॉम्प्लेक्स’ का साथ देकर! हमारा इससे क्या लेना-देना?अमेरिका की इन नीतियों के कारण पूरी दुनिया में हथियारों की होड़ तेज हो जाएगी। कल को पाकिस्तान तक भी आधुनिक रक्षा उपकरण पहुँच सकते हैं। अमेरिका की बराबरी करने के लिए चीन अपना रक्षा खर्च बढ़ाएगा। 

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स्वाभाविक रूप से, भारत को भी अपना रक्षा बजट बढ़ाना मजबूरी हो जाएगी—इसके अलावा और कोई विकल्प नहीं होगा। इसका सीधा दबाव देश के राजस्व और बजट पर पड़ेगा, जिसका असर जन-कल्याणकारी योजनाओं के लिए उपलब्ध धन पर होगा। अंततः, आम नागरिकों के दैनिक मुद्दे पीछे छूट जाएंगे। (सप्रेस)

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