‘लंपी त्वचा रोग’ गाय और भैंसों में होने वाला एक संक्रामक वायरल रोग है जो मक्खी, मच्छर और किलनी जैसे कीटों के जरिए फैलता है। इसमें तेज बुखार, पशु के सुस्त होने, त्वचा पर कठोर और गोल गांठें होने के अलावा दूध उत्पादन में अचानक भारी कमी होने लगती है। ‘लंपी’ किसानों की आर्थिक हालत बिगाड़ती है और दुधारू पशुओं की मौतों की वजह भी बनती है।
राजस्थान में लंपी रोग फिर लौट आया है। अभी बीमारी भरतपुर संभाग तक सीमित है, लेकिन चिंता पूरे प्रदेश में है। अगस्त में संक्रमण के मामले सामने आए। उसके बाद बीमारी तेजी से फैली। भरतपुर संभाग के पांच जिलों में दस हजार से ज्यादा पशु संक्रमित पाए जा चुके हैं। करीब दो दर्जन पशुओं की मौत हो चुकी है। यह आंकड़ा भले अभी बहुत बड़ा न लगे, लेकिन उन परिवारों से पूछिए जिनकी रोजी-रोटी पशुओं से चलती है। एक पशु का मरना पशुपालक के लिए बहुत बड़ा झटका होता है, इसे कोई पशुपालक ही महसूस कर सकता है।
पशुपालकों के लिए एक गाय सिर्फ पशु नहीं है। वह दूध है। वह आमदनी है। वह घर का सहारा है और कई बार वह परिवार की जमा-पूंजी भी है। राजस्थान चार साल पहले ‘लंपी’ की भयावह मार देख चुका है। सरकारी आंकड़ों के अनुसार 2022-23 में 76,030 गायों की मौत हुई थी। सरकार ने हजारों पशुपालकों को मुआवजा दिया, लेकिन पशुपालकों का कहना था कि वास्तविक नुकसान इससे कहीं ज्यादा हुआ था। इतनी बड़ी त्रासदी के बाद हर किसी को एक स्वाभाविक उम्मीद थी कि अगर अगली बार ऐसे हालात पैदा होते हैं तो हम बेहतर ढंग से सामना करने को तैयार होंगे, लेकिन बीमारी की वापसी के साथ वही सवाल फिर सामने खड़ा है कि क्या हम सचमुच तैयार थे?
राज्य सरकार कह रही है कि निगरानी बढ़ा दी गई है। टीकाकरण तेज कर दिया गया है।प्रभावित इलाकों में पशु मेले और पशुओं के जमावड़े पर रोक लगाई गई है। सचमुच, ये जरूरी कदम हैं, लेकिन इनका बीमारी फैलने के बाद उठना ही अपने आप में चिंता की बात है। भरतपुर में पशुपालकों की शिकायत है कि कई इलाकों में समय पर टीकाकरण नहीं हुआ।
विभाग की ओर से सफाई में कहा गया है कि कुछ जगह वैक्सीन समय पर उपलब्ध नहीं थी। कहीं शुरुआती खेप पहुंची, फिर आपूर्ति रुक गई और अगली खेप बीमारी सामने आने के बाद आई। टीकाकरण में कमियां रही हैं, लेकिन इसके लिए दोष किसी एक अधिकारी या कर्मचारी का नहीं है। प्रश्नचिन्ह पूरी व्यवस्था पर है। अगर ‘लंपी’ का खतरा पहले से मालूम था तो वैक्सीन की उपलब्धता लगातार क्यों नहीं रही? क्या संवेदनशील जिलों के लिए पहले से पर्याप्त स्टॉक नहीं होना चाहिए था? क्या टीकाकरण का काम शुरू करने से पहले संक्रमण का इंतजार किया जाना चाहिए?
इसके साथ ही सबसे बड़ा सवाल ये है कि क्या पिछली बार की त्रासदी से सबक लेकर हमने कोई स्थाई व्यवस्था बनाई? राज्य के पशुपालन विभाग का कहना है कि संक्रमण दूसरे प्रदेशों से आए संक्रमित पशुओं के जरिए पहुंचा हो सकता है। भरतपुर संभाग की सीमा उत्तरप्रदेश से लगती है और वहां भी ‘लंपी’ के मामले सामने आने की बात कही गई है। यह संभावना सच हो सकती है, लेकिन इससे एक और सवाल पैदा होता है कि इस संभावना के दृष्टिगत समय रहते क्या कदम उठाए गए?
‘लंपी’ जैसी बीमारी पशुपालन पर आधारित पूरी ग्रामीण अर्थ-व्यवस्था को चौपट कर सकती है, यह हमने चार साल में देख लिया है। बीमारी को रोकने के लिए सिर्फ टीका पर्याप्त नहीं है। हमें बीमारी के रास्ते बंद करने होंगे। संक्रमित पशुओं की जल्द पहचान करनी होगी। पशुपालकों को तुरंत सूचना और उपचार देना होगा। सबसे जरूरी बात यह है कि वैक्सीन की उपलब्धता को लेकर किसी तरह की अनिश्चितता नहीं होनी चाहिए। ‘लंपी’ के खतरे को इसलिए भी हल्के में नहीं लिया जा सकता कि फिलहाल यह एक संभाग में हैं।
‘राष्ट्रीय पशु रोग पूर्व चेतावनी प्रणाली’ ने नवंबर के लिए राजस्थान समेत कई राज्यों में ‘लंपी’ के संभावित जोखिम का पूर्वानुमान व्यक्त किया है। भले ही यह बीमारी फैलने की भविष्यवाणी नहीं है, लेकिन यह चेतावनी जरूर है कि खतरा मौजूद है। चेतावनी का मतलब यही होता है कि तैयारी पहले की जाए, न कि बीमारी फैलने के पश्चात।
राजस्थान की ग्रामीण अर्थव्यवस्था में पशुपालन की भूमिका बहुत बड़ी है। दूध का कारोबार इससे जुड़ा है। खेती इससे जुड़ी है। पशु बाजार और मेले इससे जुड़े हैं। संक्रमण अगर दूसरे जिलों तक पहुंचता है तो नुकसान केवल पशुपालकों तक सीमित नहीं रहेगा। इसलिए सरकार को इस बार आंकड़ों के बढऩे का इंतजार नहीं करना चाहिए। अभी बीमारी सीमित है। यही इससे बचने के उपाय करने का सबसे सही समय है।
दरअसल, जरूरत एक राज्यव्यापी रोकथाम अभियान की है, सिर्फ प्रभावित जिलों में नहीं। खासकर सीमावर्ती और संवेदनशील इलाकों में भी अभियान चलाया जाना चाहिए। हर जिले की अपनी तैयारी स्पष्ट होनी चाहिए कि कितनी वैक्सीन उपलब्ध है, कितने पशुओं का टीकाकरण हो चुका है, कितने पशु जोखिम में हैं? ‘लंपी’ से लड़ाई पूरी पारदर्शिता से होनी चाहिए। पारदर्शिता से भरोसा बनता है।
इस समय पशुपालकों को सबसे ज्यादा भरोसे की जरूरत है क्योंकि उनके लिए ‘लंपी’ सिर्फ एक बीमारी का नाम नहीं है। यह चार साल पुराना डर है। वह डर जिसमें एक पशु के बीमार पडऩे का मतलब पूरे परिवार की चिंता है। एक पशु की मौत का मतलब आय का टूटना है। इसलिए पशुपालन विभाग को इस बार सिर्फ यह साबित नहीं करना है कि उसके पास टीके हैं, बल्कि उसे यह भी साबित करना है कि उसने पिछली त्रासदी से सबक लिया है।
‘लंपी’ की वापसी को एक और बीमारी की तरह देखकर आगे बढ़ जाना महंगा पड़ सकता है। अभी संक्रमण सीमित है। इसे वहीं रोकना होगा, क्योंकि बीमारी को फैलने से पहले रोकना ही असली परीक्षा है। पशुओं को बचाकर ही हम पशुपालकों की आजीविका को बचा सकते हैं। (सप्रेस)