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पद्मश्री भूरीबाई और ‘चित्तरकाज’

गणतंत्र दिवस पर इस साल लोक-कलाकार श्रीमती भूरी बाई को पद्मश्री से सम्मानित किया गया है। कोई पचास साल पहले ‘लिखमा जोखारी’ ने भूरीबाई के नाम के आगे ‘चित्तरकाज’ लिखा था जिसे भूरीबाई दिनों-दिन बढ़ती लगन से करती जा रही…

‘गण’ की महत्ता को स्वीकार करें

सरकार को चाहिए कि किसानों की मांगे स्वीकार करे और देश में एक शांतिमय-सद्भावपूर्ण माहौल बनाने की पहल करे। अब समय आ गया है कि वर्तमान राज्य सत्ता और सरकारी तंत्र अतीत के साम्राज्यवादी शासनतंत्र की प्रेत-छाया से मुक्त होकर…

किसान आंदोलन : अपने पाले में आंदोलन

‘गणतंत्र दिवस’ की 26 जनवरी पर पुलिस, प्रशासन और आंदोलनकारी किसानों के नेतृत्व के कतिपय हिस्से द्वारा अपनी-अपनी वजहों से की गईं गफलतों ने हिंसा और अराजकता का अप्रिय माहौल बना दिया था। लगने लगा था कि आजादी के बाद…

महामारी के बाद शुक्रिया अदा करने का वक़्त

कोविड योद्धाओं ने जब काम शुरू किया तो उन्हें अन्दाज़ा नहीं था कि यह कब ख़त्म होगा। हर गुज़रते हफ्‍़ते के साथ यह साफ़ होता गया कि यह संकट उनकी कल्पना से कहीं ज़्यादा लम्बा है। देखते-देखते सितम्बर आ गया,…

इस आंदोलन का “महात्मा गांधी” कौन है ?

छह महीने के राशन-पानी और चालित चोके-चक्की की तैयारी के साथ राजधानी दिल्ली की सीमाओं पर पहुँचे किसान अपने धैर्य की पहली सरकारी परीक्षा में ही असफल हो गए हैं ,क्या ऐसा मान लिया जाए ? जाँचें अब उनके सत्तर…

2020 और 2021 के भोपाल का फर्क, उर्फ ठंड कुछ ज्यादा है इस बार !

किसान आंदोलन भोपाल में दो कदम आगे बढ़ा है। नीलम पार्क पर जहां प्रशासन ने बैठने भी नहीं दिया है, तो वहीं मंडी गेट पर दो दिन तक नारों और भाषणों का दौर जारी रहा। अब आगे भी सीमित ताकत,…

जीवन का प्रतीक है – आंदोलन

किसी भी समाज में होने वाले आंदोलन उस समाज की जीवन्तता का प्रतीक होते हैं और इस लिहाज से देखें तो दिल्ली की सीमाओं पर जारी किसान आंदोलन, अपने तमाम सवालों के अलावा कृषि-क्षेत्र की जिन्दादिली का प्रतीक भी है।…

नए दशक की दहलीज पर खड़ा गणदेवता

‘गणतंत्र दिवस’ की 26 जनवरी 71 साल पहले हमें अपने संविधान को अंगीकार करने की याद तो दिलाती ही है, साथ ही एक नागरिक की हैसियत से हमें अपने कर्तव्‍यों का बोध भी कराती है। इक्‍कीसवीं सदी के तीसरे दशक…

कौन सीखना चाहता है, महामारियों से?

कोरोना वायरस ने और कुछ किया हो, ना किया हो, उसने हमें पर्यावरण के लगातार बदहाल होते जाने की चेतावनी जरूर दे दी है। क्या इस चेतावनी से हमारी दुनिया कुछ सीख पाएगी? मौजूदा हालातों से तो ऐसा कतई नहीं…

शहरी मध्‍यवर्ग की बेतुकी मान्यताएं

किसान आंदोलन पर भी शिद्दत और नासमझी से सवाल उठाया गया है कि लाखों लोगों के भोजन (लंगर) और दूसरी व्यवस्थाओं का इंतजाम आखिर कैसे और कौन कर रहा है? कुछ अधिक ‘कल्पनाशील’ शहरी इसमें कनाडा, इंग्लेंड, अमरीका और वहां…