कला और संस्‍कृति

पांच दशक की लेखन यात्रा : क्या, क्‍यों और कैसे लिखें, लेखक?

पांच दशक की लेखन यात्रा : क्या, क्‍यों और कैसे लिखें, लेखक?

वैकल्पिक पत्रकारिता कही जाने वाली विधा में भारत डोगरा एक जाना-माना नाम है। उन्होंने हिन्दी, अंग्रेजी के अखबारों, पत्रिकाओं में हजारों लेख और सैकडों पुस्तक-पुस्तिकाएं लिखी हैं। यह सब करते हुए, एक लेखक के रूप में उन्हें किन अनुभवों से...

भारत डोगरा

वैकल्पिक पत्रकारिता कही जाने वाली विधा में भारत डोगरा एक जाना-माना नाम है। उन्होंने हिन्दी, अंग्रेजी के अखबारों, पत्रिकाओं में हजारों लेख और सैकडों पुस्तक-पुस्तिकाएं लिखी हैं। यह सब करते हुए, एक लेखक के रूप में उन्हें किन अनुभवों से गुजरना पडा? क्या समाज के आम लोगों के मुद्दों पर लिखना उनके लिए आसान रहा? अपने इन्हीं अनुभवों के बारे में बता रहे हैं, भारत डोगरा।

20 वर्ष की आयु में वर्ष 1976 में जब मैंने यह निर्णय लिया कि मुझे जीवन भर कहीं नौकरी न कर एक स्वतंत्र लेखक के रूप में ही जीवन-निर्वाह करना है, तब शायद मुझे स्वयं पूरा विश्वास नहीं था कि मैं इस निश्चय को जीवन-भर निभा सकूंगा। पर किसी तरह यह निश्चय अभी तक तो निभ ही गया है।

यह लेखकीय जीवन-यात्रा आरंभ करने से पहले भी मैं एक छात्र के रूप में 4 वर्ष तक पैट्रियट, टाईम्स ऑफ इंडिया आदि समाचार पत्रों में लिखता रहता था व इस तरह मेरी लेखन यात्रा अब 52 वर्ष की हो गई है, पर उस समय मैंने मुख्य रूप से सिनेमा के गंभीर अध्ययन पर ही लिखा था। पूर्ण-कालिक लेखन अपनाने पर यह सवाल सामने आया कि जब जीवन-भर लेखन ही करना है तो सबसे सार्थक विषय क्या चुनना चाहिए।

उस समय की मेरी समझ के अनुसार मुझे यही लगा कि गरीबी व इससे जुड़े विषय ही सबसे महत्त्वपूर्ण हैं। अतः इस पर ध्यान केन्द्रित करना ही सबसे उचित होगा। कुछ समय बाद मुझे अपने सरोकार अधिक व्यापक करना जरूरी लगने लगा। जब ‘चिपको आंदोलन’ पर उत्तराखंड से रिपोर्टिंग की, तो पर्यावरणीय विषयों का महत्त्व बेहतर ढंग से समझ में आया। इस आंदोलन के गांधीवादी कार्यकर्ताओं से संबंध बढ़ने पर उन्होंने मुझे शराब व नशे के विरोध का महत्त्व समझाया।

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इस तरह अनेक मित्रों और साथियों से सीखते हुए अंत में मैं इस निष्कर्ष पर पहुंचा कि दुख-दर्द के जो भी कारण हैं, वे सभी लेखन का विषय बनने चाहिए। इसके साथ यह भी सीखा कि केवल मनुष्य के दुख-दर्द की चिंता नहीं होनी चाहिए। सभी जीव-जंतुओं के दुख-दर्द के बारे में सोचना चाहिए। दूसरी बात यह भी सीखी कि केवल इस पीढ़ी की नहीं आगामी पीढ़ियों के दुख-दर्द की भी चिंता करना जरूरी है।

इस दूसरी बात पर अधिक अध्ययन-चिंतन किया तो यह समझ में आया कि आगामी समय की दृष्टि से देखें तो धरती की जीवनदायिनी क्षमताएं ही खतरे में पड़ रही हैं – कुछ तो अति गंभीर पर्यावरणीय समस्याओं (जैसे जलवायु परिवर्तन) के कारण व कुछ महाविनाशक हथियारों (जैसे परमाणु हथियारों) के कारण। जैसे-जैसे इन समस्याओं की अति गंभीरता समझ आई, वैसे-वैसे इस पर मैंने अधिक ध्यान केंद्रित किया व अपनी नई पुस्तकों का विषय भी बनाया। ‘धरती रक्षा अभियान’ भी आरंभ किया।

हालांकि हिंदी व अंग्रेजी दोनों के समाचार पत्रों व पत्रिकाओं में मैंने बहुत लिखा, लगभग 11000 लेख प्रकाशित हुए, फिर भी यह जरूरत महसूस होती रही कि अधिक समग्र लेखन पुस्तक-पुस्तिकाओं के रूप में किया जाए। मेरी पत्नी मधु व हमारी बेटी रेशमा भारती ने वैसे तो सभी कार्यों में भरपूर सहयोग दिया, पर पुस्तक-पुस्तिकाओं के इस कार्य में उनका विशेष महत्त्वपूर्ण सहयोग रहा। इस तरह लगभग 400 छोटी-बड़ी पुस्तक-पुस्तिकाओं का प्रकाशन हमारी कुटीर स्तर के प्रकाशन ‘सोशल चेंज पेपर्स’ से हो सका।

आर्थिक कठिनाईयां प्रायः बनी ही रहीं व इन्हें कम करने के लिए मैंने कई प्रयास भी किए, जैसे-प्रेस-क्लिपिंग-सर्विस निकाली, अनेक संस्थानों के लिए दस्तावेजीकरण व अनुवाद के कार्य किए। ऐसे में कठिनाईयां आती रहीं तो कुछ राह भी निकलती रही। कुल मिलाकर अभी तक का 52 वर्ष के स्वतंत्र लेखन का सफर तय हो सका। अब इस कार्य के साथ-साथ ‘धरती रक्षा अभियान’ की नई जिम्मेदारी भी मेरे साथ है। वृद्धावस्था में कितना हो सकेगा, कहां तक पहुंच सकेंगे कमजोर होते हाथ, पता नहीं, पर इतना जरूर पता है कि अंतिम समय तक हमारे प्रयास में कमी नहीं आएगी।

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साथ में दिल की गहराई से आभार प्रकट करना जरूरी है उन सभी मित्रों व साथियों, आंदोलनकारियों के प्रति, संपादकों के प्रति जिनके सहयोग से यह जीवन-यात्रा तय हो सकी, व इस दौरान उन सबसे बहुत कुछ सीखने को मिला जो बहुमूल्य रहा। सार्थक बदलाव पर स्वतंत्र लेखन का अर्थ यह है कि देश-दुनिया की महत्त्वपूर्ण समस्याओं का अध्ययन करना, उनके समाधान के बारे में अध्ययन-चिंतन करना व इसे ही अपने लेखन का मुख्य उद्देश्य व आधार बनाना।

यह कार्य वैसे तो बहुत सार्थक है, पर इसे निरंतरता से करने में अनेक कठिनाईयां भी हैं। एक कठिनाई तो फिलहाल यह रहेगी ही कि इस कार्य को निरंतरता से करते हुए जीवन-यापन करना सरल नहीं है। इस कठिनाई को किसी तरह सुलझा लिया जाए तो भी इससे कहीं पेचीदा समस्याएं लेखक के सामने आ सकती हैं।

जब ऐसा लेखक, जो सार्थक बदलाव पर लिखने के लिए प्रतिबद्ध है, पूरी ईमानदारी से समस्याओं का विश्लेषण कर समाधान की ओर बढ़ता है, तो कई बार उसका अनुभव यह रहता है कि पूरी ईमानदारी से इन समाधानों व सार्थक बदलावों के बारे में लिखने पर लेखन के प्रकाशन की संभावनाएं कम हो जाती हैं। दूसरी ओर यदि प्रचलित सोच के साथ समझौता कर लिखा जाए तो प्रकाशित होने की संभावना बढ़ जाती हैं।

इस स्थिति में लेखक-लेखिका के लिए बहुत दुविधा होती है कि वे क्या करें? कुछ विचार ऐसे होते हैं जो किसी समय समाज को बहुत महत्त्वपूर्ण नई दिशा दे सकते हैं, पर फौरी तौर पर उनका मजाक भी उड़ सकता है या उन्हें अव्यवहारिक मानकर उपेक्षित किया जा सकता है। जिन विचारों को बहुत शक्तिशाली तत्त्व स्वीकार नहीं कर सकते हैं उन्हें सामने लाने वाले लेखक को प्रकाशन का स्थान मिलना ही कठिन हो जाता है।

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किसी लेखक की इन समस्याओं को कैसे सुलझाया जाए, यह तो निश्चित नहीं है, पर इतना स्पष्ट है कि समाज को, देश व दुनिया को सार्थक बदलाव के लिए नए विचारों की, नई सोच की अधिक जगह बनानी चाहिए, क्योंकि इसकी बहुत जरूरत है। आज जब गंभीर गलतियों के कारण धरती की जीवनदायिनी क्षमता ही गंभीर रूप से संकटग्रस्त हो गई है, तो यह बहुत जरूरी हो गया है कि नई सोच को, नए विचारों को अधिक जगह मिले। (सप्रेस)

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