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अर्थ व्‍यवस्‍था : बैंकों की बदनीयत

अर्थ व्‍यवस्‍था : बैंकों की बदनीयत

लोक-कल्याणकारी राज्यों से उम्मीद की जाती है कि वे ऐसे काम करें जो जनहित में, बिना शुल्क के हों। बैंकों का गठन भी सेवा के इसी भरोसे के साथ किया गया था, लेकिन आजकल वे खुलकर धंधे में लगे हैं।...

थॉमस फ्रैंको

लोक-कल्याणकारी राज्यों से उम्मीद की जाती है कि वे ऐसे काम करें जो जनहित में, बिना शुल्क के हों। बैंकों का गठन भी सेवा के इसी भरोसे के साथ किया गया था, लेकिन आजकल वे खुलकर धंधे में लगे हैं। सब जानते हैं, धंधों की बुनियाद मुनाफे पर ही टिकी होती है तो बैंक भी मुनाफा कूटने में कोई कसर नहीं छोड़ रहे हैं। कैसे होता है, बैंकों के मुनाफे का धंधा?

थॉमस फ्रैंको

पिछले महिने से ‘भारतीय रिज़र्व बैंक’ (आरबीआई) ने बैंकों को यह अनुमति दी है कि वे ग्राहकों से एटीएम (ऑटोमेटेड टेलर मशीन) की मुफ्त सीमा से अधिक लेन-देन पर ज़्यादा शुल्क वसूल कर सकें। अपने ही बैंक के एटीएम से 5 बार मुफ्त लेन-देन की अनुमति है, जिसमें वित्तीय (जैसे नकद निकासी) और गैर-वित्तीय (जैसे बैलेंस जांचना) दोनों शामिल हैं। अगर आप नकद निकालते हैं और उसके बाद मशीन पूछती है कि ‘क्या आप अपना बैलेंस देखना चाहते हैं?’ और आप ‘हां’ पर क्लिक करते हैं, तो यह एक अलग लेन-देन माना जाएगा। इसका मतलब हुआ कि अगर आपने 3 बार नकद निकाला और हर बार बैलेंस देखा, तो कुल 6  लेन-देन हो गए—और 6वें से शुल्क लगने लगेगा। किसी अन्य बैंक के एटीएम से शहर में लेन-देन करने पर 3 मुफ्त लेन-देन ही मिलते हैं। शहर से बाहर करने पर 5 मुफ्त लेन-देन मिलते हैं।

पर क्या आम ग्राहक यह सब जानता है? पहले प्रति अतिरिक्त लेन-देन पर ₹21 चार्ज होता था, अब एक मई से ₹23 + 18% ‘जीएसटी’ (वस्तु एवं सेवा कर), यानी कुल ₹27.14 प्रति लेन-देन वसूला जा रहा है। भले ही आप सिर्फ ₹100 निकालें, शुल्क वही रहेगा। शायद यह वृद्धि छोटी लगे, पर देश में औसतन प्रतिदिन  600  करोड़ एटीएम लेन-देन होते हैं—जिससे बैंकों को ज़बरदस्त मुनाफा हो रहा है। 2023 में बैंकों ने एटीएम शुल्कों से ₹8,000 करोड़ कमाए।

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कैसे ग्राहकों को ATM की आदत डलवाई गई

जब एटीएम शुरू हुए थे तो बैंकों ने ग्राहकों को ज़बरन एटीएम कार्ड दिए, यह कहकर कि अब आप  24 घंटे बैंकिंग कर सकते हैं, कतारों में नहीं लगना पड़ेगा, किसी भी शहर से पैसा निकाल सकते हैं। यह भी कहा गया कि आप छोटी-छोटी रकम कई बार निकाल सकते हैं इसलिए ज़्यादा नकदी ले जाने की ज़रूरत नहीं होगी। अब जब जनता को इसकी आदत पड़ गई, बैंकों ने शुल्क वसूलना शुरू कर दिया — और यह शुल्क भविष्य में और बढ़ता जाएगा।

बैंकों से विश्वास क्यों डगमगाया

वर्ष 2016 में हुई नोटबंदी से बैंकों पर लोगों का विश्वास टूटने लगा था। इसने सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्योगों को बर्बाद कर दिया और आम लोगों को बहुत कष्ट झेलना पड़े, सिवाय नव-धनाढ्य वर्ग के। अब हर चीज़ पर शुल्क वसूले जा रहे हैं। वर्ष 2023 में बैंकों ने ‘न्यूनतम औसत बैलेंस’ नहीं रखने पर ₹21,000 करोड़ वसूले। केवल ‘भारतीय स्टेट बैंक’ (एसबीआई) ने 2020 में यह शुल्क समाप्त किया, लेकिन उसी साल  एसएमएस शुल्क के नाम पर ₹6,000 करोड़ वसूले गए।

अन्य शुल्क

इसके अलावा बैंक ‘नकद लेन-देन शुल्क,’ ‘लेन-देन शुल्क,’ ‘चेकबुक शुल्क,’ ‘ऋण खाता निरीक्षण शुल्क’ आदि कई प्रकार के शुल्क वसूल रहे हैं — जिन पर ‘भारतीय रिज़र्व बैंक’ आंखें मूंदे बैठा है। उसे गरीबों पर लगाए जाने वाले ‘न्यूनतम बैलेंस शुल्क’ पर रोक लगानी चाहिए थी। ‘जन धन योजना’ के 30% खाते बंद हो चुके हैं। खाता बंद करने पर ₹500 तक का शुल्क लिया जाता है।

क्या बैंक बिना जमा पूँजी के चल सकते हैं?

बैंक पूरी तरह ‘जमा पूँजी’ (डिपॉजिट्स) पर निर्भर हैं। भारत में 80% से अधिक जमा धन घरेलू जमाकर्ताओं से आते हैं। ‘करंट अकाउंट’ (चालू खाता) पर कोई ब्याज नहीं मिलता और ‘बचत खातों’ में ‘न्यूनतम औसत बैलेंस’ पर साधारण ब्याज मिलता है। चालू खाता और बचत खाता की जमा राशि बैंकों की कुल जमा पूँजी का 40% है, और इन्हें बैंकों द्वारा कर्ज देने में इस्तेमाल किया जाता है—जिससे बैंक भारी मुनाफा कमाते हैं। 1990 के दशक तक ये सारे शुल्क नहीं होते थे—फिर भी बैंक मुनाफे में चलते थे।

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ऐसा क्यों हो रहा है?

वर्ष 1991 में ‘अंतरराष्ट्रीय मुद्राकोष’ (आईएमएफ) और ‘विश्वबैंक’ की शर्तों के तहत तथा ‘नरसिंहम समिति’ की सिफारिशों के बाद बैंकिंग व्यवस्था का उद्देश्य बदल गया। बैंकों पर कॉरपोरेट कंपनियों को सस्ते ब्याज पर भारी कर्ज देने का दबाव बढ़ा। ‘विकास वित्तीय संस्थाएं’ (डॅवलपमेंट फाइनेंस इंस्टीट्यूशन्स) — जो लंबे समय के ऋण देने में माहिर थीं — को बदलकर वाणिज्यिक बैंक बना दिया गया, जैसे : ‘आईसीआईसीआई बैंक,’ ‘एक्सिस बैंक,’ ‘एचडीएफसी बैंक।’

इन बैंकों को निजी हाथों में सौंप दिया गया और अब इनमें अधिकांश विदेशी निवेशक हिस्सेदार हैं। सरकारी बैंकों को लंबी अवधि के ऋण देने पड़े, जो बाद में ‘एनपीए’ (‘नॉन परफार्मिंग एसेट्स’/गैर-निष्पादित ऋण) बन गए। वर्ष 2016 में ‘दीवालियापन और दिवालियापन संहिता’ (इंसाल्वेंसी एण्ड बेंकरप्सी कोड) लाया गया और ‘राष्ट्रीय कंपनी विधि न्यायाधिकरण’ (एनसीएलटी) की स्थापना हुई। ‘हेयरकट’ के नाम पर 80% तक बकाया राशि माफ की गई, जिससे बैंकों को भारी घाटा हुआ।

इस घाटे की भरपाई के लिए सेवा शुल्क लगाए गए, पर उनसे भी भरपाई नहीं हो सकी, इसलिए जमा पर ब्याज घटाया गया। ‘एफडी’ (फिक्स्ड डिपॉजिट) की ब्याज दरें 18% से गिरकर 6.5% हो गईं। बचत खातों में 5–6% की जगह अब सिर्फ 2–2.5% मिल रहा है। जबकि कॉरपोरेट्स को कम ब्याज पर लोन मिल रहा है, आम लोगों के लिए ‘गृह ऋण,’ ‘एमएसएमई ऋण’ और ‘शिक्षा ऋण’ की दरें अब भी 11–12% हैं।

फायदा किसे मिल रहा है?

सन् 2024 में 449 कॉरपोरेट कंपनियों को ₹100 करोड़ से ऊपर के लोन 5% से कम ब्याज पर मिले। 10,838 कॉरपोरेट्स को 10% से कम ब्याज पर लोन मिले। इन ‘गरीब’ कॉरपोरेट्स की मदद के लिए,  छोटे  जमाकर्ताओं को कम ब्याज और अधिक शुल्क देकर दंडित किया जा रहा है — और ‘आरबीआई’ बस देख रहा है। सरकारी बैंकों के निदेशक मंडलों में अब ‘वर्कमेन निदेशक’ और ‘गैर-वर्कमेन निदेशक’ नहीं हैं — यानी निगरानी करने वाले लोग नहीं बचे। ‘ग़ैर-बैंकिंग वित्तीय कंपनियों’ (एनबीएफसी) पर ब्याज दरों की सीमा को भी ‘आरबीआई’ ने हटा दिया है।

बचत का महत्व

वर्ष 2023 में भारत की ‘घरेलू बचत दर’ पिछले 50 वर्षों में सबसे कम रही। अब लोग बैंक की बजाय सोना और ‘रीयल एस्टेट’ को बेहतर निवेश विकल्प मान रहे हैं। ‘आरबीआई’ ने खुद की यह नीति भी लागू नहीं की कि किसी एक कॉरपोरेट को ₹10,000 करोड़ से अधिक कर्ज बैंकों के समूह से नहीं दिया जाना चाहिए। देश की 90% आबादी कर्ज में डूबी हुई है। साहूकार इनसे 100% तक ब्याज वसूल रहे हैं।

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ऋण में पारदर्शिता नहीं है

ऋण-दरों में पारदर्शिता पूरी तरह नदारद है। टाटा समूह को ‘एयर इंडिया’ खरीदने के लिए ₹10,000 करोड़ का ऋण सिर्फ 4% ब्याज पर कैसे मिल गया? अडानी और अंबानी समूह को कितना ब्याज देना पड़ा — कोई नहीं जानता। ऐसे में ‘आरबीआई’ को अपनी जिम्मेदारी निभानी होगी। उसकी गतिविधियाँ और निष्क्रियता दोनों ही देश की अर्थव्यवस्था को नुकसान पहुँचा रही हैं। अब जागने का समय है। (सप्रेस)

 थॉमस फ्रैंको, ‘ऑल इंडिया बैंक ऑफिसर्स कॉन्फेडरेशन’ के पूर्व महासचिव और ‘ग्लोबल लेबर यूनिवर्सिटी’ की संचालन समिति के सदस्य हैं। आलेख को मूल रूप से सेंटर फॉर फाइनेंशियल एकाउंटबिलिटी द्वारा प्रकाशित किया गया है।

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