Sarvodaya Press Service

सर्वोदय प्रेस सर्विस – फीचर्स सेवा के छ: दशक

ओडिशा की नदियों पर संकट गहराया, राज्यस्तरीय सम्मेलन में उठी नदी नीति और श्वेत पत्र की मांग

पर्यावरणविद् राजेन्द्र सिंह बोले— ओडिशा की नदियों का स्वास्थ्य खराब होगा, तो राज्य का स्वास्थ्य भी ठीक नहीं रहेगा

भुवनेश्वर, 13 जून। महानदी बचाओ आंदोलन और ओडिशा नदी सुरक्षा समिति द्वारा आयोजित ओडिशा नदी सुरक्षा सम्मेलन में राज्य की नदियों की बिगड़ती स्थिति पर गहरी चिंता व्यक्त की गई। सम्मेलन में प्रमुख पर्यावरणविदों, प्रशासनिक अधिकारियों, नदी कार्यकर्ताओं और नागरिक समाज के प्रतिनिधियों ने भाग लिया और सरकार से एक समग्र नदी नीति बनाने एवं ओडिशा की नदियों की स्थिति पर श्वेत पत्र जारी करने की पुरजोर मांग की।

सम्मेलन का उद्घाटन करते हुए पर्यावरणविद् राजेन्द्र सिंह ने कहा, “ओडिशा की कई नदियां मरने के कगार पर हैं। अगर नदियों का स्वास्थ्य नहीं सुधरा, तो राज्य का स्वास्थ्य भी नहीं बचेगा। सरकार को चाहिए कि वह जल संसाधन विभाग, विशेषज्ञों, नदी आंदोलन कार्यकर्ताओं और नागरिक समाज के साथ तत्काल संयुक्त बैठक करे और ठोस कार्ययोजना बनाए।”

सम्मेलन में यह भी निर्णय लिया गया कि स्कूलों और कॉलेजों में जल साक्षरता और नदी संरक्षण को लेकर जागरूकता अभियान चलाए जाएंगे, जिससे नई पीढ़ी नदियों की महत्ता को समझ सके।

पूर्व प्रशासक डॉ. अरविंद बेहरा ने कहा, “विकास के नाम पर विनाश स्वीकार्य नहीं है, और अस्मिता के नाम पर स्थिरता का क्षरण भी नहीं होना चाहिए।”

पर्यावरणविद् प्रफुल्ल सामंतराय ने राज्य के सभी नदी आंदोलनों को एक साझा मंच पर लाकर एक व्यापक जन आंदोलन खड़ा करने का आह्वान किया।

प्रख्यात लेखक और प्रशासक श्री संजीव होता ने ओडिशा की नदियों के स्वास्थ्य पर गहराते संकट के कारणों की विस्तार से व्याख्या की और समाधान के लिए समन्वित प्रयासों पर बल दिया।

See also  संविधान का सम्मान और जनसहभागिता से ही नदियों-पहाड़ों की रक्षा

सुदर्शन दास ने अपने उद्घाटन भाषण में कहा, “हर कोई नदी संसाधनों पर अधिकार चाहता है, लेकिन अब समय आ गया है कि जल और भूमि पर नदी का अधिकार बहाल किया जाए।” उन्होंने नदी कार्यकर्ताओं से जल-जमीन और नदी संबंधी अधिकारों के पक्ष में संगठित प्रयास करने की अपील की।

सम्मेलन में दया नदी के पुनरुद्धार, स्लरी पाइपलाइन के जरिए लौह अयस्क परिवहन पर रोक, नदियों में औद्योगिक और नगरीय कचरा प्रवाह पर नियंत्रण, और गंगा, सलांदी जैसी नदियों के पुनर्जीवन सहित कई महत्वपूर्ण प्रस्ताव पारित किए गए। साथ ही यह निर्णय लिया गया कि औद्योगिक इकाइयों को नदियों के स्वास्थ्य की जिम्मेदारी दी जाए।

सम्मेलन में प्रमुख वक्ताओं में —प्रदीप प्रधान, विजय प्रधान, विनोद मिश्रा, डॉ. जयकृष्ण पाणिग्रही, प्रकाश रथ, कृष्ण जगदेव, प्रो. विनायक रथ, अश्विनी महापात्र, हंसराज साहू, अशोक ठाकर, ब्रतिनदी जेना, निरुपमा पात्रा, संदीप पटनायक, युधिष्ठिर बेहरा, प्रसन्न बिशोई, अनादि बेहरा, लक्ष्मीधर बेहरा, डॉ. प्रदीप तराई, प्रभासिनी राउत, नीरद पारा खुंटिया, पांडव कर्ण- आदि शामिल थे।

कार्यक्रम का संचालन दयासुरखा अभियान के आयोजक श्री सचिकान्त प्रधान ने किया। सम्मेलन के अंत में डॉ. राजेन्द्र सिंह ने महानदी बचाओ आंदोलन के संयोजक सुदर्शन दास को “नदी प्रहरी” सम्मान से सम्मानित किया। सुदर्शन दास, वरिष्ठ सामाजिक कार्यकर्ता, नदी संरक्षण के क्षेत्र में सक्रिय रणनीतिक विचारक और ‘महानदी बचाओ आंदोलन’ के संयोजक के रूप में जाने जाते हैं।

Table of Contents

अनशन से आगे का संघर्ष: सोनम वांगचुक से उठी एक ऐसी अपील, जिसने लोकतंत्र की आत्मा को छू लिया

लोकतांत्रिक आंदोलनों का इतिहास केवल संघर्षों का इतिहास नहीं है, बल्कि उन नैतिक दुविधाओं का भी इतिहास है, जहाँ एक ओर सिद्धांतों के लिए जीवन दांव पर लगा होता है और दूसरी ओर वही जीवन आंदोलन की सबसे बड़ी पूंजी

Read More »

सोनम वांगचुक :  अनशन नहीं, सत्ता का चरित्र बदला है

सोनम वांगचुक का आमरण अनशन अब केवल शिक्षा सुधार या एक मंत्री की जवाबदेही का प्रश्न नहीं रह गया है, बल्कि लोकतांत्रिक प्रतिरोध की प्रभावशीलता की भी परीक्षा बन चुका है। इसी बीच न्यायालय ने उनके जीवन की रक्षा को

Read More »

यात्रा-वृत्तांत : अनोखी है बैतूल की भू-संस्कृति

भारत की विविध भू-संस्कृतियों की खोज में बैतूल एक ऐसा पड़ाव है, जहाँ प्रकृति, लोकजीवन, आस्था और सामुदायिक संस्कृति एक-दूसरे में सहज रूप से घुली-मिली दिखाई देती हैं। यह यात्रा-वृत्तांत एक शोधार्थी की आँखों से बैतूल की सांस्कृतिक और प्राकृतिक

Read More »