नदी, नारी और नीर : सनातन विकास की राह

“यह रिवरफ्रंट विकास नदियों की हत्या है, नदियों को नालों में बदल देना है।” यह केवल एक तीखी टिप्पणी नहीं, बल्कि जल-संरक्षण के क्षेत्र में दशकों से काम कर रहे राजेंद्र सिंह की गहरी पीड़ा और चेतावनी है। वे मानते हैं कि जिस देश में नदियाँ नालों में बदल जाती हैं, वहाँ केवल पर्यावरण ही नहीं, संस्कृति भी प्रदूषित हो जाती है। उनके अनुसार, इसका समाधान केवल एक ही है – समुदाय-आधारित, विकेंद्रीकृत जल प्रबंधन।

राजस्थान के एक छोटे से गाँव गोपालपुर में मंगू काका और नाथी बलाई जैसे साधारण ग्रामीणों ने उनके जीवन की दिशा बदल दी। उन्होंने उनसे कहा कि दवाई और पढ़ाई छोड़कर पानी के लिए काम करें। यह सलाह उनके लिए एक आह्वान बन गई। उन्होंने आयुर्वेद की प्रैक्टिस और सरकारी नौकरी छोड़ दी और पानी के साथ अपना रिश्ता जोड़ लिया। 1980 के दशक में उन्होंने अरवरी नदी को पुनर्जीवित करने का काम शुरू किया, जो दशकों से सूखी पड़ी थी।

यह काम किसी चमत्कार से नहीं, बल्कि पारंपरिक ज्ञान, वैज्ञानिक समझ और सामुदायिक सहयोग से संभव हुआ। छोटे-छोटे तालाब बनाए गए, मिट्टी के बाँध खड़े किए गए और वर्षा जल को जमीन के भीतर संचित किया गया। इस प्रक्रिया में पानी को वाष्पित होने से बचाकर धरती के भीतर ‘संग्रहित’ किया गया, जिसे वे असली “रिज़र्व बैंक” कहते हैं। धीरे-धीरे यह संचित जल धरती से बाहर आया और अरवरी नदी फिर से बहने लगी। यह घटना केवल एक नदी का पुनर्जीवन नहीं थी, बल्कि यह इस बात का प्रमाण थी कि प्रकृति के साथ सामंजस्य स्थापित कर असंभव को भी संभव बनाया जा सकता है।

See also  जल की उपलब्धता और शुद्धता का संकट

राजेंद्र सिंह के लिए जल-संरक्षण केवल तकनीकी प्रक्रिया नहीं है। यह प्रकृति, संस्कृति और आध्यात्म का संगम है। वे मानते हैं कि पहाड़, नदियाँ और बादल एक-दूसरे से गहराई से जुड़े हैं, और भारतीय समाज सदियों से इस ज्ञान को अपने जीवन में जीता आया है। लेकिन आधुनिक शिक्षा व्यवस्था ने इस पारंपरिक ज्ञान को पीछे छोड़ दिया है। उनके अनुसार, ज्ञान हमें विनम्र और प्रकृति से जुड़ा बनाता है, जबकि सीमित शिक्षा हमें अहंकारी बना सकती है।

आज देशभर में रिवरफ्रंट विकास परियोजनाएँ तेजी से बढ़ रही हैं, लेकिन वे इसे विकास नहीं मानते। उनके अनुसार, इन परियोजनाओं ने नदियों को दीवारों में बाँधकर उनके प्राकृतिक स्वरूप को खत्म कर दिया है। “सौंदर्यीकरण” और “रिवर रीजुवनेशन” जैसे शब्दों के पीछे वे आर्थिक स्वार्थ देखते हैं। उनका मानना है कि यह नदियों को जीवंत धारा से हटाकर कृत्रिम नालों में बदल देता है।

वे न्याय व्यवस्था पर भी सवाल उठाते हैं, लेकिन उनका विश्वास लोगों की सामूहिक शक्ति में अटूट है। उनका कहना है कि जब संस्थाएँ कमजोर पड़ती हैं, तब जनता को आगे आना पड़ता है। अरावली क्षेत्र में हुए जनआंदोलन इसका उदाहरण हैं, जहाँ लोगों ने अपने पर्यावरण और अधिकारों की रक्षा के लिए एकजुट होकर आवाज उठाई। उनके लिए यह केवल विरोध नहीं, बल्कि सत्य के लिए संघर्ष-सत्याग्रह है।

चंबल क्षेत्र में उनका काम एक अलग ही कहानी कहता है। जहाँ कभी डकैतों का आतंक था, वहाँ उन्होंने बदलाव की शुरुआत उनकी पत्नियों से की। जल-संरक्षण और खेती के माध्यम से जब जीवन में स्थिरता आई, तो धीरे-धीरे पुरुषों ने हथियार छोड़ दिए। यह परिवर्तन किसी दबाव से नहीं, बल्कि जीवन की गरिमा और आवश्यकताओं की पूर्ति से आया।

See also  ओडिशा की नदियों पर संकट गहराया, राज्यस्तरीय सम्मेलन में उठी नदी नीति और श्वेत पत्र की मांग

इस पूरे काम में महिलाओं की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण रही है। वे मानते हैं कि महिलाएँ जल और जीवन के संबंध को गहराई से समझती हैं। जब उन्हें संसाधनों पर अधिकार मिला, तो समाज में सकारात्मक बदलाव स्वतः आने लगा। उनके अनुसार, भारतीय परंपरा में नीर (जल), नारी (महिला) और नदी को एक समान महत्व दिया गया है, क्योंकि ये तीनों जीवन देने वाली शक्तियाँ हैं।

राजेंद्र सिंह और उनके साथियों ने अब तक 23 नदियों को पुनर्जीवित किया है और लगभग 17,000 से अधिक गाँवों में जल-संरक्षण का कार्य किया है। राजस्थान के अलावा कई अन्य राज्यों में भी उनके प्रयासों का प्रभाव देखा गया है। वे स्पष्ट रूप से कहते हैं कि जल-संरक्षण के लिए कोई एक मॉडल नहीं हो सकता, क्योंकि हर क्षेत्र की भौगोलिक और सांस्कृतिक परिस्थितियाँ अलग होती हैं। लेकिन एक साझा दृष्टि जरूर हो सकती है-लोगों की भागीदारी पर आधारित, विकेंद्रीकृत जल प्रबंधन।

उनकी विकास की अवधारणा “सनातन विकास” है ऐसा विकास जो न विस्थापन लाए, न भ्रम और न ही विनाश। यह प्रकृति और मानव के बीच संतुलन स्थापित करने का प्रयास है। उनका संदेश सरल है, लेकिन गहराकृ“चरैवेति चरैवेति”, यानी चलते रहो, निरंतर आगे बढ़ते रहो। यही जीवन है, यही विकास है, और यही वह मार्ग है जिससे हम अपनी नदियों, प्रकृति और अंततः अपने अस्तित्व को बचा सकते हैं।

Table of Contents

नीले धुएँ की धरती : ‘ग्रेट स्मोकी माउंटेन्स’

समाज और सरकार चाहे तो पर्यावरण को पुनर्जीवित किया जा सकता है। इसका एक बेहतरीन उदाहरण अमरीका के टेनेसी और नार्थ कैरोलीना राज्यों की सीमाओं से लगा ‘ग्रेट स्मोकी माउंटेन्स’ है। करीब सौ साल पहले कानून बनाकर प्रकृति को उसके

Read More »

पर्यावरण संरक्षण : केवल पौधारोपण नहीं, जीवनशैली में बदलाव भी जरूरी

विश्व पर्यावरण दिवस केवल पौधे लगाने का संदेश नहीं देता, बल्कि प्रकृति के प्रति जिम्मेदार जीवनशैली अपनाने का आह्वान करता है। जल संरक्षण, प्लास्टिक का कम उपयोग, प्रदूषण नियंत्रण, जैविक खेती और प्राकृतिक संसाधनों के संतुलित उपभोग जैसे छोटे-छोटे प्रयास

Read More »

World Environment Day : पर्यावरण संरक्षण पर टिका है भविष्य

पर्यावरण संरक्षण और संतुलन का प्रश्न आज पूरी मानवता के सामने सबसे बड़ी चुनौती बनकर उभरा है। बढ़ते प्रदूषण, जलवायु परिवर्तन, वनों की कटाई और प्राकृतिक संसाधनों के अंधाधुंध दोहन ने पृथ्वी के पारिस्थितिक संतुलन को गंभीर रूप से प्रभावित

Read More »