पानी को जनआंदोलन बनाना होगा, तभी किसान समृद्ध और भारत जल सुरक्षित बनेगा

नागपुर जल संवाद-2026 में पद्म भूषण अनिल प्रकाश जोशी, नितिन गडकरी और नाना पाटेकर ने रखा जल, समाज और भविष्य का विजन

नागपुर 18 मई। विदर्भ को किसान आत्महत्या मुक्त बनाने, जल संकट के स्थायी समाधान खोजने और जल संरक्षण को जनभागीदारी से जोड़ने के उद्देश्य से नागपुर में आयोजित दो दिवसीय ‘जल संवाद-2026’ और ‘जल क्रांति परिषद’ देश के जल विमर्श का महत्वपूर्ण मंच बनकर उभरा। पूर्ति सिंचन समृद्धि जल कल्याणकारी संस्था के रजत जयंती वर्ष पर आयोजित इस राष्ट्रीय सम्मेलन में केंद्रीय मंत्री नितिन गडकरी, पानी फाउंडेशन के अध्‍यक्ष, अभिनेता एवं सामाजिक कार्यकर्ता नाना पाटेकर, पद्म भूषण सम्मानित पर्यावरणविद् अनिल प्रकाश जोशी सहित देशभर के जल विशेषज्ञ, सामाजिक कार्यकर्ता, वैज्ञानिक और पर्यावरण पत्रकार एक मंच पर जुटे। इस अवसर पर पद्मश्री जलयोद्धा उमाशंकर पांडेय, पद्मश्री चैतराम पंवार, वैज्ञानिक डॉ रवि गालकाटे सहित कई सामाजिक एवं जल क्षेत्र से जुडे कार्यकर्ता उपस्थित रहे।

देश के 17 राज्यों से आए 50 से अधिक जल विशेषज्ञों, मैदानी कार्यकर्ताओं और जल पत्रकारिता से जुड़े प्रतिनिधियों एवं सैकड़ों पंचायतों के प्रतिनिधियों की मौजूदगी ने इस आयोजन को राष्ट्रीय स्वरूप प्रदान किया। कार्यक्रम का मुख्य उद्देश्य जल संरक्षण को केवल सरकारी परियोजना न मानकर सामाजिक आंदोलन के रूप में स्थापित करना और विदर्भ सहित देश के जल संकटग्रस्त क्षेत्रों के लिए टिकाऊ मॉडल विकसित करना रहा।

नागपुर में आयोजित ‘जलसंवाद-2026’ और ‘जलक्रांति परिषद’ के मंच से अभिनेता और सामाजिक कार्यकर्ता नाना पाटेकर ने युवाओं, शिक्षकों और सामाजिक संस्थाओं को समाज के लिए समर्पित होकर काम करने का संदेश दिया। अपने सहज, भावनात्मक और बेबाक अंदाज़ में नाना ने कहा कि जीवन की असली कमाई पैसा नहीं, बल्कि लोगों का विश्वास और उनके चेहरे पर दिखाई देने वाली मुस्कान है।

नाना पाटेकर ने कहा, “जब भी किसी संस्था के लिए, किसी गांव के लिए या किसी जरूरतमंद के लिए कुछ करने का मौका मिलता है, मुझे सबसे ज्यादा आनंद वहीं मिलता है। पैसा जरूरी है, लेकिन केवल पैसा ही जीवन का लक्ष्य नहीं हो सकता। लगातार अच्छा काम करना, लोगों के जीवन में बदलाव लाना और समाज को कुछ लौटाना यही असली सफलता है।”

नाना पाटेकर ने अपने संबोधन में ग्रामीण भारत, शिक्षा और सामाजिक जिम्मेदारी पर विशेष जोर दिया। उन्होंने कहा कि आज गांवों में रहने वाले बच्चों के भीतर अपार प्रतिभा है, लेकिन उन्हें सही दिशा, अवसर और संसाधनों की जरूरत है। उन्होंने शिक्षकों और सामाजिक संगठनों से अपील करते हुए कहा कि यदि समाज का हर सक्षम व्यक्ति एक बच्चे का हाथ थाम ले, तो पूरे देश की तस्वीर बदल सकती है।

अपने अनुभव साझा करते हुए उन्होंने कहा कि उन्होंने जीवन में संघर्ष बहुत करीब से देखा है और यही संघर्ष उन्हें समाज के लिए काम करने की प्रेरणा देता है। उन्होंने कहा कि गांवों के बच्चे आज अंग्रेजी बोल रहे हैं, बड़े सपने देख रहे हैं और दुनिया से कदम मिलाकर चलना चाहते हैं, लेकिन उन्हें मंच देने की जिम्मेदारी समाज की है।

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नाना ने कहा कि आज जरूरत इस बात की नहीं है कि हम कितनी संपत्ति जोड़ रहे हैं, बल्कि इस बात की है कि हम अपने जीवन से कितने लोगों का जीवन बेहतर बना पा रहे हैं। उन्होंने युवाओं से मेहनत, अनुशासन और संवेदनशीलता को जीवन का आधार बनाने का आह्वान किया।

अपने संबोधन में उन्होंने यह भी कहा कि जल संरक्षण केवल सरकार या किसी एक संस्था का काम नहीं है, बल्कि यह सामाजिक आंदोलन बनना चाहिए। गांव, किसान, पानी और आने वाली पीढ़ियों का भविष्य एक-दूसरे से जुड़ा हुआ है। अगर पानी बचा रहेगा, तभी खेती बचेगी, गांव बचेंगे और देश मजबूत बनेगा।

जल संवर्धन बने जनआंदोलन, तभी समृद्ध होगा किसान- केंद्रीय मंत्री गडकरी का आह्वान

कार्यक्रम की अध्यक्षता करते हुए केंद्रीय मंत्री नितिन गडकरी ने कहा कि पानी अनेक समस्याओं का समाधान है और यदि जल संरक्षण को जनभागीदारी के साथ लागू किया जाए तो विदर्भ को किसान आत्महत्या मुक्त बनाया जा सकता है।

उन्होंने कहा कि जल संवर्धन के लिए बहुस्तरीय, वैज्ञानिक और सामुदायिक प्रयासों की आवश्यकता है। उन्होंने विशेष रूप से वर्धा जिले के तामसवाड़ा जल संरक्षण मॉडल का उल्लेख करते हुए कहा कि यह मॉडल साबित करता है कि यदि स्थानीय समाज, विज्ञान और इच्छाशक्ति साथ आ जाए तो सूखा प्रभावित क्षेत्र भी समृद्धि का केंद्र बन सकते हैं।

गडकरी ने कहा कि जिस तरह सड़कों ने देश को जोड़ा है, उसी तरह पानी भी समाज, कृषि और अर्थव्यवस्था को जोड़ने की शक्ति रखता है। जरूरत इस बात की है कि जल संरक्षण सरकारी फाइलों से निकलकर गांव-गांव की सामुदायिक जिम्मेदारी बने। उन्‍होंने कहा कि पानी अनेक समस्‍याओं का समाधान है और इससे विदर्श को किसान आत्‍महत्‍या मुक्‍त बनाया जा सकता है।

प्रकृति को समझे बिना पानी को समझना संभव नहीं— पद्म भूषण अनिल प्रकाश जोशी का आह्वान

कार्यक्रम के पहले दिन देश के प्रख्यात पर्यावरणविद् और पद्म भूषण सम्मानित जल विशेषज्ञ अनिल प्रकाश जोशी ने जल संरक्षण के वैज्ञानिक और पारिस्थितिक पक्ष पर गहन विचार रखते हुए कहा कि भारत में पानी की चर्चा तो बहुत होती है, लेकिन पानी को समझने की कोशिश बहुत कम दिखाई देती है। इस मौके पर पदमश्री उमाशंकर पांडे, पद्मश्री सेठपाल सिंह, संजय कश्‍यप, संचालक, सेंटर फार वाटर पीस, स्‍वेडेविनो नात्‍सो, कोहिमा विशेष रूप से उपस्थित थे।/  

उन्‍होंने जल संरक्षण को केवल सरकारी योजनाओं या बुनियादी ढांचे का विषय मानने की सोच पर सवाल उठाते हुए कहा कि पानी का संकट संसाधनों की कमी से अधिक समझ की कमी का संकट बन चुका है। उन्होंने स्पष्ट कहा कि जब तक समाज पानी को केवल उपभोग की वस्तु मानता रहेगा और उसके वैज्ञानिक, सामाजिक तथा पारिस्थितिक स्वरूप को नहीं समझेगा, तब तक जल संकट का स्थायी समाधान संभव नहीं है। कार्यक्रम की अध्‍यक्षता केंद्रीय मंत्री नितिन गडकरी ने की।

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अनिल प्रकाश जोशी ने अपने संबोधन में कहा कि भारत में पानी की चर्चा तो बहुत होती है, लेकिन पानी को समझने की कोशिश बहुत कम दिखाई देती है। उन्होंने कहा कि समाज अक्सर जल संकट, सूखा, भूजल स्तर में गिरावट और नदियों के सूखने पर चिंता व्यक्त करता है, लेकिन पानी के पीछे काम कर रही प्राकृतिक प्रक्रियाओं, जलचक्र, भूजल पुनर्भरण और पारिस्थितिकी तंत्र को समझने का गंभीर प्रयास नहीं करता। उन्होंने जोर देकर कहा कि “प्रकृति को समझना, पानी को समझने का सबसे सरल और प्रभावी मार्ग है।”

जोशी ने कहा कि जिस प्रकार सड़कें, राजमार्ग और परिवहन तंत्र विभिन्न शहरों और समुदायों को जोड़ते हैं, उसी प्रकार नदियां, जलधाराएं और भूजल प्रणालियां समाज, कृषि, जंगल और जैव विविधता को एक-दूसरे से जोड़ती हैं। यदि इन प्राकृतिक जल तंत्रों को क्षति पहुंचती है तो उसका प्रभाव केवल पानी की उपलब्धता पर नहीं, बल्कि पूरे सामाजिक और आर्थिक ढांचे पर पड़ता है।

उन्होंने चिंता व्यक्त करते हुए कहा कि देश के अनेक हिस्सों में लोग धीरे-धीरे अपनी स्थानीय जल प्रणालियों से कटते जा रहे हैं। गांवों के कुएं, तालाब, छोटी नदियां और पारंपरिक जलस्रोत केवल संसाधन नहीं थे, बल्कि सामुदायिक जीवन और प्रकृति के साथ संबंध का आधार थे। आधुनिक विकास के बीच इनसे दूरी बढ़ने का परिणाम भूजल संकट, पर्यावरणीय क्षरण और सामाजिक असंतुलन के रूप में सामने आ रहा है।

पद्म भूषण अनिल प्रकाश जोशी ने कहा कि जल संरक्षण केवल इंजीनियरिंग प्रोजेक्ट्स या बड़े बांधों का विषय नहीं है, बल्कि यह विज्ञान, समुदाय और प्रकृति के बीच संतुलन का विषय है। उन्होंने कहा कि जल संरक्षण की हर योजना में स्थानीय समुदायों की भागीदारी, पारंपरिक ज्ञान और वैज्ञानिक दृष्टिकोण का समन्वय होना चाहिए।

उन्होंने युवाओं को जल साक्षरता से जोड़ने की आवश्यकता पर विशेष बल देते हुए कहा कि स्कूल स्तर से ही बच्चों को पानी, नदियों, जंगलों और जलवायु के संबंध को समझाया जाना चाहिए। यदि नई पीढ़ी प्रकृति और जल के बीच संबंध को समझेगी, तभी भविष्य का भारत जल सुरक्षित बन सकेगा।

अपने संबोधन में उन्होंने यह भी कहा कि भारत में कई जल समृद्ध क्षेत्र भी पर्यावरणीय क्षरण की चपेट में हैं, क्योंकि वहां जल प्रबंधन को केवल उपयोग के नजरिए से देखा गया, संरक्षण के नजरिए से नहीं। उन्होंने चेताया कि यदि जल को पारिस्थितिकी से अलग करके देखा गया, तो आने वाले वर्षों में जल संकट और गहराएगा।

इसके पूर्व कोहिमा नागालैंड की जल एवं पर्यावरण विशेषज्ञ स्‍वेडेविनो ने पारंपरिक ज्ञान और आधुनिक विज्ञान के समन्‍वय की आवश्‍यकता बताई। के. के. छत्रधारा ने अल नीनो के प्रभाव को कम करने के लिए प्रयासों की आवश्‍यकता पर बल दिया। पद्मश्री सेठपालसिंह ने अत्‍यंत कम पानी में सिंघाडा खेती की तकनीक पर प्रकाश डाला। पद्मश्री उमाशंकर पांडेय ने भूमिस्‍तर, मिटटी की गुणवत्‍ता बनाए रखने और मीठे पानी को समुद्र में बहने से रोकने के महत्‍व पर अपने विचार रखे।

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देशभर के जल योद्धाओं का सम्मान

कुमार सिद्धार्थ को सम्‍मानित करते केंद्रीय मंत्री श्री गडकरी
रामबाबू तिवारी को सम्‍मानित करते केंद्रीय मंत्री श्री गडकरी

इस अवसर पर 40 से अधिक जल विशेषज्ञों, पर्यावरण कार्यकर्ताओं और जल पत्रकारिता से जुड़े व्‍यक्तियों का शाल, प्रतीक चिन्ह और सम्मान पत्र देकर अभिनंदन किया गया। उनमें पद्मश्री चैैतराम पंवार, पद्मश्री उमाशंकर पांडेय, पत्रकार विवेक मिश्रा (डाउन टू अर्थ), कुमार सिद्धार्थ (सप्रेस, पर्यावरण विकास, इंदौर), रामबाबू तिवारी (मंगल भूमि ट्रस्‍ट, बांदा), केसर सिंह (पीपुल वाटर फोरम), संजय सज्‍जन सिंह( निरंजन फल्‍गु मिशन), डॉ. मयूर जोशी ( उदगम चेरिटेबल ट्रस्‍ट, गांधीनगर), के, वेंकट भानुप्रकाश (वाटर लिटरेसी फाउंडेशन, चैन्‍नई), सगन्‍ना आई टोटेगेर, संजय कश्‍यप (अध्‍यक्ष, सेंटर फार वाटर पीस, गाजियाबाद), नवीनचंद मसागी (वाटर लिटरेसी फाउंडेशन), पृथ्‍वीराज नायक(तेलंगाना), सजल श्रीवास्‍तव, निमल राघवन (बाउन्‍नस बैक डेल्‍टा), डॉ उमर सैफ ( वाटर पीस इंस्‍टीटयूट), स्‍वेदिनो नास्‍तो ( नागालैंड), केशबो कृषण छत्रधर (आसाम), रामवीर तंवर (सेव अर्थ), सेठपाल सिंह, डॉ.संपदा प्रकाश पायल( गढ़चिरौली), पिनाकी दासगुप्‍ता, डॉ अवधेश प्रताप सिंह, नंदलाल सिंह (नेचर विलेज,जमुई), डॉ निखलेश सिंह, आरती कुमार (शोधार्थी), मानस रंजन मिश्र (उड़ीसा जल बिरादरी), एस विश्‍वनाथन (बायो मी पर्यावरण ट्रस्‍ट), पंकज मालवीय (पानी रे पानी) आदि सहित अनेक जल योद्धा शामिल रहे।

तामसवाड़ा मॉडल बना आकर्षण का केंद्र

कार्यक्रम में वर्धा जिले के तामसवाड़ा जल संरक्षण मॉडल की विशेष प्रस्तुति दी गई, जिसे राष्ट्रीय स्तर पर पहचान मिल चुकी है। कभी जल संकट, फसल नुकसान और कृषि संकट से जूझने वाला यह क्षेत्र आज वैज्ञानिक जल प्रबंधन और सामुदायिक भागीदारी के कारण जल समृद्धि का उदाहरण बन चुका है। इस मॉडल को केंद्रीय जल शक्ति मंत्रालय और केंद्रीय भूजल बोर्ड द्वारा तामसवाड़ा पैटर्न’ के रूप में पहचान मिल चुकी है।

नागपुर जल संवाद कार्यक्रम के सूत्रधार, संयोजक सचिन कुलकर्णी, जो वाशिम में जल संरक्षण के क्षेत्र में कार्य कर रहे है, ने कहा कि पानी संरक्षण के लिए देशभर से मैदानी स्‍तर पर कार्य करने वाली संस्‍थाओं और व्‍यक्तियों को चयनित कर आमंत्रित किया गया। इसी सभी साथियों का एक नेटवर्क बन सके और पानी संरक्षण के लिए आगे जनांदोलन बनाया जा सके। इसी श्रृंखला में अगला जल संवाद गुजरात में आयेाजित किया जाएगा। साथ ही एक माह के भीतर नागपुर घोषणा पत्र के लिए आए तमाम सुझावों, प्रस्‍तावों को संकलित कर राष्‍ट्रीय स्‍तर पर संबंधित एजेंसियों के साथ विमर्श किया जाएगा।

इस मौके पर चार अलग-अलग पुस्‍तकों जल पर्व, जलक्रांति, कृषि कल्‍याण, कॉरिडार्स आफ वाटर सिक्‍यूरिटी का विमोचन नाना पाटेकर, नितीन गडकरी एवं महाराष्‍ट्र के प्रमुख मंत्रियों ने संयुक्‍त रूप से किया।

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