जल संरक्षण से कल सुरक्षित होगा

राज कुमार सिन्हा

देश का 70 फीसदी भूजल स्रोत सूख चुके हैं और पुनर्भरण की दर 10 फीसदी से भी कम रह गई है। चेन्नई, बेंगलुरु जैसे शहर पानी की कमी को लेकर खबरों की सुर्खियों में है। इसलिए पीने योग्य पानी सभी को उपलब्ध करवाने और इसे संरक्षि‌त करने कानून बनाया गया। परन्तु सभी कानूनी प्रावधानों के बाबजूद जल स्रोत की दशा इस रिपोर्ट से उजागर हो जाता है। 

22 मार्च : विश्व जल दिवस

गर्मी की आहट शुरू होते ही पीने के पानी का संकट शुरू हो जाता है। प्रशासनिक अमला भी लोगों को पानी की दिक्कत न हो इसके लिए प्रयास करना शुरू कर देता है। परन्तु पानी बचाने से लेकर उसके संरक्षण की बात अक्सर सरकार और समाज के बीच से गायब ही रहता है। पृथ्वी पर 97 प्रतिशत भाग पानी है जिसमें से केवल 2.5 प्रतिशत से लेकर 2.75 प्रतिशत पानी पीने योग्य है।

भारत पहली बार 2011 में पानी की कमी वाले देशों की सूची में शामिल हुआ था। यूनिसेफ द्वारा 18 मार्च 2021 की जारी रपट के अनुसार भारत में 9.14 बच्चे गंभीर जल संकट का सामना कर रहे हैं। अनुमान है कि 2030 तक देश की लगभग 40 फीसदी आबादी के सामने पानी का संकट होगा।

वर्ल्ड रिसोर्सेज इंस्टीट्यूट (डबल्यू आर आई) द्वारा जारी रिपोर्ट के अनुसार यदि जल प्रबंधन से जुड़ी नीतियों में सुधार नहीं किया गया तो इसके चलते आने वाले 27 वर्षों में भारत, चीन और मध्य एशिया को उसके जीडीपी के 7 से 12 प्रतिशत के बराबर का नुकसान हो सकता है। देश का 70 फीसदी भूजल स्रोत सूख चुके हैं और पुनर्भरण की दर 10 फीसदी से भी कम रह गई है। चेन्नई, बेंगलुरु जैसे शहर पानी की कमी को लेकर खबरों की सुर्खियों में है। इसलिए पीने योग्य पानी सभी को उपलब्ध करवाने और इसे संरक्षि‌त करने कानून बनाया गया।

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संविधान के भाग (9) में तिहतरवें संशोधन के अनुच्छेद 243(छ) में आर्थिक विकास एवं सामाजिक न्याय के लिए योजना बनाने की शक्ति पंचायत को दिया गया है। जो ग्यारहवीं अनुसूची में लिस्टेड है। 11 नबंर पर पेयजल व्यवस्था का उल्लेख किया गया है। महिलाओं के विरुद्ध भेदभाव उन्मूलन अधिनियम 1979 के अनुच्छेद 14(2)(एच) में महिलाओं के लिए पानी प्रावधानों का उल्लेख करता है। बाल अधिकार अधिनियम 1989 के अनुच्छेद 24(2)(सी) में स्वच्छ स्रोत से सुरक्षित पेयजल प्राप्त करना बच्चों का अधिकार  है। जल(प्रदूषण, नियंत्रण एवं रोकथाम) अधिनियम 1974 भारत में जल प्रदूषण रोकने हेतु महत्वपूर्ण कानून है। नदियों और धाराओं में अपशिष्टों के विसर्जन को रोकने हेतु दो प्रकार की नियामक विधियों की वयवस्था करता है। (1) केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (2) राज्य प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड। 2024 में इस कानून में संशोधन किया गया है। मूल अधिनियम में जल प्रदूषण के उल्लंघनों के लिए जुर्माने के साथ- साथ डेढ साल से 6 साल तक की जेल की सजा का भी प्रावधान था। जबकि नए विधेयक में अधिकांश उल्लंघनों के लिए कारावास के प्रावधान को हटाने का प्रस्ताव है और इसकी जगह 10,000 रुपये से 15 लाख तक जुर्माना लगाया गया है।

पर्यावरण संरक्षण अधिनियम 1986 में भी जल गुणवत्ता सबंधी नियम शामिल है। मध्यप्रदेश पेयजल परीक्षण अधिनियम 1986 भी काफी महत्वपूर्ण है। ग्राम स्तर की जैव विविधता समिति को केन्द्रीय जैव विविधता अधिनियम 2002 की धारा(41) और मध्यप्रदेश जैव विविधता नियम 2004 के नियम (23) अनुसार अपने अधिकारिता क्षेत्र में पारिस्थितिकीय तंत्र को बनाये रखना है,जिसमें नदी संरक्षण सम्मलित है।         

वन अधिकार कानून 2006 की धारा (5)(ख) कहता है कि “यह सुनिश्चित करना कि लगा हुआ जलागम क्षेत्र,जल स्रोत और अन्य पारिस्थितिकीय संवदेनशील क्षेत्र पर्याप्त रूप से संरक्षित हैं।” मध्यप्रदेश पंचायत उपबंध (अनुसूचित क्षेत्रों पर विस्तार) पेसा नियम -2022 की कंडिका 12(1)(ख) में भी उल्लेख किया गया है कि “ग्राम के क्षेत्र के भीतर स्थित प्राकृतिक संसाधनों को, जिसके अंतर्गत भूमि, जल तथा वन सम्मिलित हैं, उसकी परम्परा के अनुसार और संविधान के उपबंधों के अनुरूप और तत्समय प्रवृत अन्य सुसंगत विधियों का सम्यक् ध्यान रखते हुए, प्रबंधित करना” जैसे मजबूत प्रावधान भी हैं। परन्तु सभी कानूनी प्रावधानों के बाबजूद जल स्रोत की दशा इस रिपोर्ट से उजागर हो जाता है। 

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स्टेट ऑफ एनवायरमेंट रिपोर्ट 2023 के मुताबिक, देश की कुल 603 नदियों में से 279 यानी 46 फीसद नदियाँ प्रदूषित हैं। राज्यों में महाराष्ट्र में सर्वाधिक 55 नदियाँ तथा मध्यप्रदेश में 19 नदियाँ प्रदूषित हैं। इसलिए नदियों का प्रशासकीय प्रबंधन की जगह पर्यावरणीय प्रबंधन की दृष्टि से निगरानी तंत्र विकसित करना चाहिए। जिसमें पारिस्थितिकीय तंत्र, जलवायू परिवर्तन और जैव विविधता की समझ रखने वाले विशेषज्ञ को शामिल किया जाना आवश्यक है। मंडला की आदिवासी गोंड रानी दुर्गावती ने जबलपुर शहर में 52 तालाबों का निर्माण कराया गया था, परन्तु अवैध निर्माण और शहरीकरण के कारण अब गिनती के ही, आधे-अधूरे तालाब बचे हैं।

मध्यप्रदेश की ग्रामीण आबादी हैंडपंप पर निर्भर है। अप्रैल 2023 के आंकड़े अनुसार प्रदेश में पांच लाख 64 हजार 290 हैंडपंप थे। जिसमें में से 14 हजार 191 हैंडपंप पानी नहीं दे रहा था। पेयजल के स्रोतों में कमी के निम्न कारण है जैसे प्रति व्यक्ति पानी की खपत में बढोत्तरी,भूजल में गिरावट, प्राकृतिक स्रोतों का जल प्रदुषित होना, परम्परागत जल स्रोतों में कमी आना अंधाधुंध पेङों की कटाई, मृदा अपरदन आदि प्रमुख है।

ऐसे में सरकार और समाज को मिलकर जमीनी स्तर पर ठोस प्रयास करने होंगे। जैसे जल स्रोतों को चिन्हित करना और उसके संरक्षण, प्रबंधन के लिये ग्राम सभा में चर्चा कर इसकी जिम्मेदारी गांव समिति को देना। गांव की नदी, नाले के पास शौच रोकने तथा उसके दुष्परिणाम पर ग्राम सभा में चर्चा और गांव स्तर की निगरानी समिति का गठन करना। गांव समुदाय के पारम्परिक जल संरक्षण, प्रबंधन और नियंत्रण के तरीके के लिए गांव स्तर की अध्ययन दल का गठन करना। पास के नदी नाले के पानी को बरसात बाद रोकने हेतु  बोरी बंधान या अन्य उपाय करना। वर्षा जल को रोकने वाला गांव के आसपास जल संचय व्‍यवस्था कायम करना। सूख चुकी सभी नदियों, जोहङों, झील, तालाबों और अन्य जल निकाय को पुनर्जीवित करना जल संकट का स्थाई निवारण हो सकता है।

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