मिट्टी का मोल : सचेत और जिम्मेदार बनाने की कला

बीहू आनंद

कहा जाता है कि दक्षिण एशिया में जीवन के आमफहम काम धरती पर बैठकर या उससे जुडकर ही साधे जाते हैं और नतीजे में इन इलाकों के समाजों में धीरज, सहनशक्ति और संयम सहज मौजूद रहता है। सच हो कि नहीं, यह मान्यता मानव जीवन में मिट्टी की अहमियत जरूर बताती है। मिट्टी के उपकारों पर बीहू आनंद का लेख।

जब हम पर्यावरण की बात करते हैं तो मिट्टी को नज़रअंदाज नहीं कर सकते। मिट्टी जन्म से लेकर मृत्यु तक की हमारी यात्रा में हमेशा मौजूद होती है और अंततः हमारे साथ ही धरती में वापस मिल जाती है। मिट्टी के बर्तन विशेषकर मानव इतिहास का अभिन्न अंग रहे हैं। आधुनिक सामग्रियों जैसे धातु, कांच या प्लास्टिक के अविष्कार से बहुत पहले लोग सामान के संग्रह, खाना बनाने और पानी लाने के लिए मिट्टी के बर्तनों पर निर्भर थे। ऐसा करने के पीछे सिर्फ उपयोगिता का भाव नहीं था, बल्कि धरती और जीवन को बचाए रखने से अभिन्न रूप से जुड़ा हुआ था।

समय के साथ-साथ मिट्टी के बर्तनों को बनाना एक कला के रूप में विकसित हुआ क्योंकि विभिन्न क्षेत्रों में इन बर्तनों को बनाने की अनूठी शैलियां, तकनीकें और परंपराएं विकसित हो रही थीं। सिंधु घाटी सभ्यता की टेराकोटा से बनाई गई छोटी मूर्तियों से लेकर प्राचीन यूनान और चीन की सघन काम वाली कुम्हारी कला तक, मिट्टी हमेशा ही लोगों के लिए अभिव्यक्ति और पहचान का एक माध्यम रही है।

हालांकि, वह संतुलन जिसने सदियों तक इस कला को जीवित रखा अब खतरे में है। पृथ्वी,जल,अग्नि, वायु और आकाश इन पांच मौलिक तत्वों में से एक मिट्टी है जो इंसानी गतिविधियों के कारण कमज़ोर और बहुत कम गुणवत्ता की होती जा रही है। जिस तरह इन पांच तत्वों में से किसी में भी असंतुलन पैदा होने से प्रकृति पर असर पड़ता है, मिट्टी की कमी और उसमें बढ़ रहे प्रदूषण के कारण कुम्हारों और पर्यावरण दोनों के लिए ही गंभीर परिणाम हो रहे हैं।

आज के समय में कुम्हार अच्छी गुणवत्ता वाली मिट्टी की उपलब्धता घटने की चुनौती का सामना कर रहे हैं। पारंपरिक रूप से कुम्हारी के काम के लिए उपयोग में लाई जाने वाली चिकनी मिट्टी नदी तटों से लाई जाती थी जहां सदियों से चल रही प्राकृतिक प्रक्रियाओं के चलते नदी तटों पर जमा हुई मिट्टी सही गुणवत्ता वाली बन जाती थी। हालांकि, यह स्त्रोत अब जंगलों के कटने, शहरीकरण और प्रदूषण के कारण खत्म हो रहा है। जंगल कट जाते हैं तो मिट्टी के पोषक तत्व और नमी खत्म होने लगती है जिसकी वजह से चिकनी मिट्टी के बनने पर भी फर्क पड़ता है। नदियों के वे तट इमारतों आदि के निर्माण की वजह से बर्बाद हो रहे हैं जिन पर कभी ढेर सारी चिकनी मिट्टी मिल जाया करती थी। इससे कुम्हारी का काम करने वाले शिल्पकारों के लिए कच्चा माल पाना और भी मुश्किल होता जा रहा है।

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दूसरी प्रमुख समस्या औद्योगिक प्रदूषण की है। नदियों में उड़ेले जाने वाले रासायनिक कचरे से मिट्टी खराब होती है और यह मिट्टी कुम्हारी के काम के लिए उपयुक्त नहीं रह जाती। जलवायु में हो रहे बदलाव के चलते नदियां सिकुड़ रही हैं और उनसे बहुत सारा पानी खींच लेने के कारण स्थिति और भी खराब हो गई है। परिणामस्वरूप, कुम्हारों को या तो अच्छी मिट्टी के लिए दूर जाना होता है या फिर ऊंची कीमतों पर खरीदना पड़ता है। इससे मिट्टी से बनी वस्तुओं की लागतें बढ़ जाती हैं और कुम्हारी का काम कम फायदे वाला हो जाता है।

इन चुनौतियों के कारण कई पारंपरिक कुम्हार अपना शिल्प छोड़ने लगे हैं। कुछ तो बंगाल आदि जगहों से लाए गए बर्तनों को ही बेचते हैं क्योंकि वहां अभी भी गंगा से अच्छी गुणवत्ता की चिकनी मिट्टी मिल जाती है। कुछ अन्य लोगों ने मिट्टी की जगह एक मानव निर्मित विकल्प, ‘प्लास्टर ऑफ पेरिस’ (पीओपी) का प्रयोग करना शुरू कर दिया है क्योंकि वह सस्ता है और उस पर काम करना आसान भी है। हालांकि, ‘पीओपी’ पर्यावरणीय दृष्टि से अच्छा विकल्प नहीं है। यह पानी में आसानी से नहीं घुलता और प्रदूषण करता है, जबकि प्राकृतिक रूप से उपलब्ध चिकनी मिट्टी धरती में आसानी से घुलमिल जाती है।

बात सिर्फ मटीरियल के बदल जाने की नहीं है, बल्कि एक प्राचीन परंपरा के धीरे-धीरे गायब होने की है। प्रकृति के कामों में हलकी सी भी खलल से सदियों से चली आ रही सांस्कृतिक विरासत के मिटने के साथ ही आजीविकाएं खत्म हो सकती हैं। कुम्हारी कला के विलुप्त होने का मतलब मनुष्यों के धरती से गहरे जुड़ाव को खो देना होगा।

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भोपाल की ख्यात पॉटर और वरिष्ठ शिल्पकार शम्पा शाह इस विचार को बहुत सुंदरता से यह कहकर अभिव्यक्त करती हैं कि “मिट्टी आपको धैर्य और ध्यान देना सिखाती है। मिट्टी का इस्तेमाल आपको विनम्र और जमीन से जुड़ा हुआ होना बनाता है। मिट्टी के बर्तन नाज़ुक होते हैं और उनको बरतने से आप सचेत बनते हैं। इस तरह आप सिर्फ मिट्टी के बर्तनों को रखने और बरतने को लेकर ही सचेत नहीं होते, बल्कि अपने आसपास की हर चीज के बारे में सचेत होते हैं, जिम्मेदार होते हैं।”

इस वक्तव्य में एक गहरा सच है। मिट्टी के बर्तनों और अन्य चीजों को बरतने में सावधानी की ज़रुरत होती है। आप उनके साथ लापरवाह नहीं हो सकते क्योंकि वे ज़रा सी असावधानी से टूट सकते हैं। जब आपके पास मिट्टी के बर्तन होते हैं तो आप स्वाभाविक रूप से बहुत ज़िम्मेदारीपूर्ण ढंग से उनका उपयोग करते हैं। आप इस बात को सुनिश्चित करते हैं कि ऐसे बर्तन को तुरंत ही बहुत ऊंचे तापमान पर नहीं रखा जाय क्योंकि तापमान में अचानक हुए बदलाव से उस बर्तन में दरारें आ सकती हैं। आप बहुत देर तक इसे बिना धुला नहीं छोड़ सकते क्योंकि बहुत देर तक भीगा रहने से यह कमज़ोर हो सकता है। प्लास्टिक और धातु के बने बर्तनों के मुकाबले मिट्टी के बर्तनों पर तुरंत ध्यान देना होता है क्योंकि उन्हें प्लास्टिक और धातु के बर्तनों की तरह घंटो छोडा नहीं जा सकता।

यह जागरूकता या सावधान रहने की आदत जीवन के अन्य पहलुओं पर भी धीरे-धीरे असर डालती है। आप शुरुआत छोटी चीजों से करते हैं, जैसे चीनी मिट्टी के बर्तनों को सावधानी के साथ बरतना और इसी के साथ आप अपने आसपास के माहौल के प्रति भी सचेत होने लगते हैं। इस तरह सचेत रहना जो एक साधारण से बर्तन के साथ शुरू होता है, आपकी जीवनशैली में उतर जाता है और आपको प्रकृति और पर्यावरण के प्रति अधिक जागरूक बना देता है। इसके अलावा यह आपको याद दिलाता है कि आप भी मिट्टी के बर्तन की तरह ही पांच तत्वों से बने हैं और अंत में उसी की तरह ही पृथ्वी में विघटित होकर मिल जायेंगे। जैसे कबीर कहते हैं, ‘यह तन काचा कुंभ है, लिए फिरे थे साथ, थपका लगा फूटी गया, कछु न आया हाथ।’

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कुम्हारी की कला को जीवित रखना सिर्फ किसी कला को सुरक्षित रखना ही नहीं है, बल्कि जीवन जीने के एक तरीके को संरक्षित करना है। कुम्हारी हमें धैर्य, ज़िम्मेदारी और पृथ्वी के साथ हमारे गहरे जुड़ाव की याद दिलाती है। अगर हम यह शिल्प खो देंगे तो हमारे हाथ से सिर्फ एक प्राचीन कौशल ही नहीं निकल जाएगा, बल्कि हम प्रकृति के साथ मधुर संबंध बनाकर जीने का दर्शन भी खो देंगे।

एक ऐसी दुनिया जो लगातार तेज गति वाली होती जा रही है और प्रकृति से कटती जा रही है उसमें चिकनी मिट्टी हमें अपनी गति को धीमी करना, सचेत होना और परवाह करना सिखाती है। यह पाठ सादगी, जीवन और प्रकृति को बनाए रखने और अपने आसपास की दुनिया के प्रति  आदर रखने का पाठ है। कुम्हारी का भविष्य केवल कुम्हारी करने वाले शिल्पकारों पर ही निर्भर नहीं है, बल्कि इस बात पर भी निर्भर है कि हम कैसी जीवनशैली अपनाते हैं। मिट्टी को अपनी रोजमर्रा की जिंदगी में अपनाकर हम सचेत और पर्यावरण चेतना रखने वाली दुनिया की ओर एक छोटा, पर सार्थक कदम बढ़ा सकते हैं। (सप्रेस)

सुश्री बीहू आनंद पिछले चार वर्षों से मिट्टी और शिल्प की दुनिया से गहराई से जुड़ी हैं, जहाँ पॉटरी के नए आयामों को समझने और तलाशने का काम कर रही हैं ।

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