अंतरराष्ट्रीय वैश्विक पर्यावरण

जलवायु कार्यकर्ताओं की बढ़ती गिरफ़्तारियाँ और लोकतांत्रिक संकट

जलवायु कार्यकर्ताओं की बढ़ती गिरफ़्तारियाँ और लोकतांत्रिक संकट

क्या शांतिपूर्ण प्रदर्शन करना अपराध है? लंदन। हाल ही में प्रकाशित पत्रिका द इकोलाजिस्‍ट एवं ग्रीनपीस की एक संयुक्त रिपोर्ट ने ब्रिटेन में जलवायु और सामाजिक कार्यकर्ताओं के विरुद्ध हो रही गिरफ़्तारियों और पुलिस कार्रवाई पर गंभीर सवाल खड़े किए...

क्या शांतिपूर्ण प्रदर्शन करना अपराध है?

लंदन। हाल ही में प्रकाशित पत्रिका द इकोलाजिस्‍ट एवं ग्रीनपीस की एक संयुक्त रिपोर्ट ने ब्रिटेन में जलवायु और सामाजिक कार्यकर्ताओं के विरुद्ध हो रही गिरफ़्तारियों और पुलिस कार्रवाई पर गंभीर सवाल खड़े किए हैं। रिपोर्ट के अनुसार, प्रदर्शनकारियों को जानबूझकर ऐसे अपराधों में गिरफ़्तार किया जा रहा है जिनमें बाद में कोई मुकदमा तक दर्ज नहीं होता। इससे न केवल उनकी नागरिक स्वतंत्रता का हनन हो रहा है, बल्कि लोकतंत्र के भीतर विरोध के संवैधानिक अधिकार पर भी संकट मंडरा रहा है।

प्रदर्शनों पर बढ़ती सख्ती और गिरफ़्तारियों के आंकड़े

ग्रीनपीस द्वारा जुटाए गए आँकड़ों के अनुसार, पिछले 6 वर्षों में लंदन में सार्वजनिक उपद्रव (public nuisance) की साजिश के आरोप में 638 लोगों को गिरफ़्तार किया गया, लेकिन केवल 18 मामलों में ही आरोप तय हुए — यानी महज़ तीन प्रतिशत। जबकि 2012 से 2018 तक ऐसे मामलों में 67 गिरफ़्तारियाँ हुई थीं और 8 लोगों पर आरोप तय हुए थे (लगभग 12%)। इससे साफ है कि हाल के वर्षों में गिरफ़्तारियाँ लगभग दस गुना बढ़ी हैं, लेकिन मुकदमे नहीं।

ग्रीनपीस यूके की सह-कार्यकारी निदेशक अरीबा हमीद ने कहा, “जब पुलिस जानबूझकर ऐसे लोगों को गिरफ़्तार करती है जिन पर आरोप लगाने का कोई इरादा नहीं होता, तो यह पुलिस शक्तियों का दुरुपयोग है और लोकतंत्र पर सीधा हमला भी।” उन्होंने इसे सरकार की ‘असहज आवाज़ों’ को दबाने की रणनीति बताया।

लंदन के अभिनेता और फिलिस्तीन समर्थक कार्यकर्ता खालिद अब्दल्ला ने साझा किया कि कैसे एक शांतिपूर्ण प्रदर्शन में भाग लेने के बाद छह महीने तक उन्हें मुकदमे की आशंका में जीना पड़ा, जब तक पुलिस ने कार्रवाई नहीं करने की पुष्टि नहीं की। वे कहते हैं, “मैंने कभी नहीं सोचा था कि ब्रिटेन में मुझे पहली बार प्रदर्शन के कारण जांच का सामना करना पड़ेगा।”

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2019 में Extinction Rebellion और Fridays for Future जैसे आंदोलनों के ज़रिये जब हज़ारों लोग जलवायु संकट को लेकर सड़कों पर उतरे, तब से पुलिस कार्रवाई में तेज़ी आई। इसके बाद सरकार ने कई नए कानून पारित किए जो प्रदर्शनों को नियंत्रित करने के लिए पुलिस को और अधिक शक्तियाँ देते हैं — इनमें Police, Crime, Sentencing and Courts Act 2022 प्रमुख है।

कानूनी फर्म में पार्टनर राज चड्ढा बताते हैं कि पहले प्रदर्शनकारियों को सड़क अवरुद्ध करने के आरोप में गिरफ़्तार किया जाता था, पर अब उन्हें ‘सार्वजनिक उपद्रव की साजिश’ जैसे कठोर और गहरे कानूनी प्रावधानों के तहत पकड़ा जाता है। यह पुलिस को यह अधिकार देता है कि वे प्रदर्शनकारियों को महीनों हिरासत या जमानत पर रखें, और अंततः मामूली आरोप लगाकर मामला रफा-दफा कर दें।

Plan B नामक एक पर्यावरणीय विधिक संस्था के निदेशक टिम क्रॉसलैंड के अनुसार, “यह केवल गिरफ़्तारी नहीं है — यह एक रणनीति है जिससे प्रदर्शनकारियों को डराया जाता है और पुलिस को तलाशी और जब्ती के अधिकार मिल जाते हैं।” इस प्रकार पुलिस फोन, लैपटॉप जब्त कर सकती है और प्रदर्शनकारियों के घरों पर रेड तक कर सकती है।

विरोध का अधिकार और जागरूकता अभियान

इस रिपोर्ट के प्रकाशन के साथ ही ग्रीनपीस, एमनेस्टी इंटरनेशनल, फ्रेंड्स ऑफ द अर्थ और लिबर्टी जैसी संस्थाओं ने मिलकर एक राष्ट्रव्यापी जागरूकता अभियान शुरू किया है। इसके तहत डिजिटल होर्डिंग्स और आभासी पोस्टर के माध्यम से यह संदेश दिया जा रहा है कि “मैं यहाँ अंदर प्रदर्शन कर रहा हूँ ताकि बाहर गिरफ़्तार न किया जा सके।”

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ये होर्डिंग्स लंदन, मैनचेस्टर और बर्मिंघम जैसे बड़े शहरों के प्रमुख शॉपिंग क्षेत्रों में लगाए गए हैं। इन वर्चुअल पोस्टरों में जलवायु, विकलांग अधिकार, नस्लवाद, एनएचएस बचाओ और गाज़ा जैसे विषयों पर प्रदर्शन कर रहे लोग दिखाए गए हैं।

रिपोर्ट में स्पष्ट रूप से यह बात सामने आती है कि लोकतंत्र में असहमति के अधिकार को दबाया जा रहा है। प्रदर्शनकारियों को राजनैतिक रूप से असुविधाजनक मानकर गिरफ़्तार किया जाना इस बात का संकेत है कि सरकार और पुलिस संस्थान मिलकर सिविल सोसायटी को कमज़ोर करने की कोशिश कर रहे हैं।

अभी संसद में विचाराधीन Crime and Policing Bill में भी ऐसे प्रावधान हैं जो भविष्य में प्रदर्शनों पर और अंकुश लगाने का मार्ग प्रशस्त कर सकते हैं। पर्यावरण और मानवाधिकार संस्थाएं सरकार से अपील कर रही हैं कि इन प्रावधानों को हटाया जाए और 2022 के बाद पास किए गए विरोध-निरोधक कानूनों को वापस लिया जाए।

हालाँकि यह रिपोर्ट ब्रिटेन के संदर्भ में है, लेकिन इसकी गूंज वैश्विक स्तर पर महसूस की जा सकती है। भारत, अमेरिका, फ्रांस, जर्मनी जैसे देशों में भी विरोध प्रदर्शनों पर सख्ती, गिरफ़्तारियाँ और ‘राष्ट्रीय सुरक्षा’ के नाम पर दमन अब आम होता जा रहा है। ऐसे में यह ज़रूरी है कि नागरिक समाज सतर्क रहे, डेटा-आधारित निगरानी करता रहे और संविधान प्रदत्त अधिकारों की रक्षा के लिए निरंतर आवाज़ उठाता रहे।

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