राजनीति

‘मनरेगा’ को मारकर आया ‘जी राम जी’

बीस साल पहले जिस संसद ने रोजगार की मांग आधारित गारंटी के जिस अनूठे कानून को सर्वसम्मति से पारित किया था, उसी संसद ने अभी पिछले हफ्ते उसी कानून को खारिज कर नए ‘वीबी – जी राम जी’ कानून को…

विचार : भाषा की भद्द पीटने वाले चुनाव  

क्या भाषा की बरबादी में राजनीतिक नेतृत्व, खासकर सत्तानशीन नेतृत्व की भी कोई भूमिका होती है? आपस के बहस-मुबाहिसों से लगाकर चुनावी सभाओं तक में जिस अदा से जैसी भाषा का उपयोग किया जाता है वह उसे लगातार गर्त में…

बिहार चुनाव : जाति का वर्चस्व बनाम विकास और ‘पावरलेस’ की राजनीति’

बिहार, जिसे भारतीय लोकतंत्र की प्रयोगशाला कहा गया है, आज फिर एक निर्णायक मोड़ पर खड़ा है। ऐतिहासिक राजनीतिक चेतना और आंदोलनों की भूमि होने के बावजूद, यहां चुनावी परिदृश्य अब भी जाति, वर्चस्व, बूथ प्रबंधन और पैसों के प्रभाव…

‘बदलो बिहार अभियान’ के तहत सामाजिक न्याय और विकास पर चर्चा

विकास के सतत और समावेशी मॉडल पर जोर : तुषार गांधी समेत नामी कार्यकर्ता शामिल हाजीपुर, 31 अक्टूबर। बिहार के हाजीपुर में आज सामाजिक न्याय, राज्य के विकास और जनता के बुनियादी मुद्दों पर एक महत्वपूर्ण चर्चा का आयोजन किया…

संसाधन : लूटने को ललचाता लद्दाख

कुछ दिन पहले तक केन्द्र की भाजपा सरकार के लाडले माने जाने वाले सोनम वांगचुक और उनके संगी-साथी अचानक देशद्रोही, विदेशी पूंजी पर पलने वाले और हिंसा भडकाने वाले कैसे और क्यों हो गए? ध्यान से देखें तो सरकारों का…

भरत सिंह कुंदनपुर : पंचायती राज मंत्री से पंच बन गांव की सेवा करने वाले नेता का जाना

राजस्थान की राजनीति में भरत सिंह कुंदनपुर का नाम उस विरले नेता के रूप में लिया जाएगा, जिसने मंत्री पद की शोहरत छोड़ गांव की गलियों को चुना। पंच बनकर उन्होंने साबित किया कि राजनीति का अर्थ सत्ता नहीं, समाज…

सौ साल का ‘आरएसएस’

ठीक एक शताब्दी पहले, 1925 के दशहरे के इन्हीं दिनों में ‘राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ’ की स्थापना हुई थी। उसके कर्ता-धर्ताओं की नजर में गैर-राजनीतिक, सांस्कृतिक संगठन माना जाने वाला यह अ-पंजीकृत जमावडा अपने जन्म से ही विवादास्पद रहा है। क्या…

कितने कारगर हैं लोकतंत्र, मार्क्सवाद और धर्म ?

उम्र के नौ दशक से अधिक वर्ष पार कर चुके पत्रकार, कॉमरेड एलएस हरदेनिया ने अपने इस लेख में विचार, खासकर अनूठे विचारों की जरूरत और मौजूदा समय की कमजोरियों पर उंगली रखी है। वे पूछते हैं कि बीसवीं, इक्कीसवीं…

सार्वजनिक संस्थानों में नौकरियों की आउटसोर्सिंग शोषण का जरिया नहीं बन सकती : सुप्रीम कोर्ट

राज कुमार सिन्हा  बिहार में विधानसभा चुनाव से पहले संविदाकर्मियों का मुद्दा गर्मा गया है। कुछ दिन पहले पटना में  संविदा कर्मचारी राजस्व एवं भूमि सुधार विभाग में अपनी नौकरी पक्की करने और बकाया वेतन की मांग को लेकर, लगभग…

भारतीय अर्थव्यवस्था : जादूगर का अर्थशास्त्र

‘नमस्ते ट्रंप,’ ‘अबकी बार, ट्रंप सरकार’ और ‘माई फ्रेंड डोनॉल्ड’ की गलबहियों से छिटककर ‘लाल आंखें’ दिखाने वाले चीन और रूस की चापलूसी आखिर उसी अर्थ-नीति की देन है जो हमारे आम, गरीब-गुरबों को आए दिन रुलाती रहती है। क्या…