राजनीति समसामयिक

विचार : भाषा की भद्द पीटने वाले चुनाव  

विचार : भाषा की भद्द पीटने वाले चुनाव  

क्या भाषा की बरबादी में राजनीतिक नेतृत्व, खासकर सत्तानशीन नेतृत्व की भी कोई भूमिका होती है? आपस के बहस-मुबाहिसों से लगाकर चुनावी सभाओं तक में जिस अदा से जैसी भाषा का उपयोग किया जाता है वह उसे लगातार गर्त में...

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क्या भाषा की बरबादी में राजनीतिक नेतृत्व, खासकर सत्तानशीन नेतृत्व की भी कोई भूमिका होती है? आपस के बहस-मुबाहिसों से लगाकर चुनावी सभाओं तक में जिस अदा से जैसी भाषा का उपयोग किया जाता है वह उसे लगातार गर्त में ढ़केलने में कामयाब दिखाई देते हैं। क्या होता है, भाषा की बदहाली का नतीजा?


इस कालखंड के बारे में एक बात एकदम पक्की है कि इसे नैतिकता, शुचिता, सार्वजनिक जीवन में शिष्टाचार के पतन, वायदों और घोषणाओं के प्रति निर्लज्जता की सारी हदें पार करने वाली बेशर्मी के कालखंड के रूप में जाना जाएगा। जिस निर्लज्ज दीदादिलेरी के साथ सत्ता शीर्ष पर बैठे लोग झूठे वादे और निराधार दावे कर रहे हैं वह चौंकाने वाला है। प्रधानमंत्री जैसे जिम्मेदार पद पर बैठे व्यक्ति तक ने ‘हम 5, हमारे 125,’ ‘पचास करोड़ की गर्लफ्रेंड’ से लेकर ‘कांग्रेस की विधवा’ जैसी बातों से आरम्भ करके उसे ‘मारब सिक्सर से छह गोली छाती में’ तक पहुंचाया। यह शीर्ष की निम्नता थी, नीचे के कुनबे में यह और कितने नीचे तक पहुंची इसे जानने के लिए गिरिराज सिंह और हिमंता विश्वसरमा के बोल देखे-सुने जा सकते हैं।

ऐसा रातोंरात नहीं हुआ है। इसकी शुरुआत पूंजीवादी समाज के दिखावटी शिष्टाचार को गहरे में दफनाने से हुयी है। भारत की सामाजिक-राजनीतिक विरासत के प्रतीक, स्वतन्त्रता संग्राम के नायकों के बारे में ऊलजलूल बातों से शुरू हुआ सिलसिला उनके बारे में गढ़े गए झूठों के अभद्र और अश्लील हमलों तक पहुंच गया है। भाषा का यह क्षरण चौंकाने वाला है। इस अमर्यादित, अशिष्ट भाषा को सड़क-छाप कहना, इसे कम करके देखना होगा। यह समाज को अराजक और उसमें रहने वालों को वहशी बनाने की महापरियोजना का एक हिस्सा भर है। भाषा और वर्तनी सिर्फ संवाद या संचार का माध्यम भर नहीं होतीं।

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हमारे समय के बड़े भाषा विज्ञानी नोम चोम्स्की मीडिया और राजनीतिक प्रचार में इस्तेमाल की जाने वाली भाषा का विश्लेषण करते हुए ठीक ही बताते हैं कि ‘सत्ता में बैठे लोग जनमत को अपने अनुकूल ढालने, अपनी आमतौर से अस्वीकार्य विचारधारा को जनता के गले उतारने और उसे फैलाने के साथ-साथ सामाजिक गैर-बराबरी को मजबूत करने के लिए भाषा का उपयोग एक औजार के रूप में करते हैं।’ चोम्स्की भाषा की सार्वभौमिकता पर जोर देते हुए उसे शक्ति के खेल का एक हिस्सा बताते हैं। वे बताते हैं कि मीडिया और प्रचार किस तरह भाषा का उपयोग करके लोगों की धारणाओं को नियंत्रित करते हैं, ‘सहमति का उत्पादन’ (‘मैन्युफेक्चरिंग कंसेंट’) करते हैं।

गरज यह कि इस तरह से जनता को उन बातों के लिए राजी किया जाता है जो दरअसल खुद उसके ही खिलाफ होती हैं। इन दिनों यह होता हुआ देखा जा सकता है। इस तरह से भाषा वैचारिक प्रभुत्व कायम करने का एक माध्यम बन जाती है, जहाँ हुक्मरानों के जनविरोधी, समाज विरोधी विचार स्वाभाविक, सहज और सामान्य विचारों के रूप में प्रस्तुत किए जाने लगते हैं, नियति और अपरिहार्य बताये जाते हैं, वहीँ जनहितैषी, वैकल्पिक विचारों को हाशिये पर धकेल दिया जाता है। इस तरह वर्ग-विभाजित समाज में भाषा वर्चस्व और नियंत्रण का एक सूक्ष्म, लेकिन शक्तिशाली जरिया बन जाती है। नवउदार दौर में भाषा ने इस तरह की भूमिका पूरे प्राणपण से निबाही है। शब्दों को नए और एकदम उलट अर्थ दे दिए गए हैं। दिखने-सुनने में आकर्षक, किन्तु ऐसे शब्द गढ़े गए हैं जिनमें भूख को तप और मृत्यु को मोक्ष के रूप में महिमामंडित कर दिया जाता है।

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इस दौर में यह गिरावट भयानक गति के साथ हुयी और लगातार जारी है। एक समय था जब पूंजीवादी लोकतंत्र, उसमें भी संसदीय लोकतंत्र, कम-से-कम अपने वर्ग के विरोधियों के प्रति एक दायरे में रहता था। एक-दूसरे के प्रति दिखावे के लिए ही सही, संयमित और सभ्रांत वर्तनी के लिए जाना जाता था। राजनीतिक विपक्ष विरोधी होता था, दुश्मन नहीं। कहे-लिखे की जांच और उसकी प्रामाणिकता का उत्तरदायित्व हुआ करता था। असत्य को ज्यादा दिनों तक तथ्य बनाकर प्रस्तुत नहीं किया जा सकता था, मगर जैसे-जैसे पांवों के नीचे से जमीन खिसकती गयी वैसे-वैसे सिर्फ भाषा ही पतित नहीं हुई, प्रस्तुति भी विकृत होती गयी। इसे बाकायदा नथुने फुलाकर, कर्कश और चीख-चिल्लाकर, भुजाएं फड़काते हुए, अश्लीलता की हदें लांघते हुए, भद्दे और भौंडे इशारे करके उपयोग करना आम बात है।

यह किसी व्यक्ति तक महदूद विकार नहीं है, यह विचार का व्यवहार है। भाषाविद कहते हैं कि  भाषा हमारा परिचय होती है, बोलने वालों के चरित्र और विकास का प्रतिबिंब होती है। भाषा किसी संस्कृति का रोडमैप भी होती है जो यह बताती है कि इसके लोग कहाँ से आते और कहाँ जाना चाहते हैं। इस हिसाब से मौजूदा निजाम भाषा को वापस एक ऐसे दौर में पहुंचाना चाहता है जहां उसका उपयोग स्त्रियों और दलितों की गरिमा और मनुष्यता को छीनने के हथियार की तरह किया जाता है। जहां राज करने वालों की भाषा को देवत्व प्रदान कर बाकियों के लिए उसके इस्तेमाल पर रोक लगा दी जाती है। साहित्य और नाटकों तक में उनके हिस्से आये संवाद उन्हीं भाषाओं में लिखे जाते हैं जिन्हें हीन माना जाता था। यह अलग बात है कि ऐसा करने वाले भूल गए कि अंततः यह उन्हें भी नहीं बख्शेगा ; लौट-फिरकर उन्हीं पर आयेगा।

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मौजूदा दौर में भाषा का सर्वाधिक अवमूल्यन हुआ है। किसी भी दिन, किसी भी विषय पर, कोई भी कथन देखें, उसमें आक्रामक बड़बोलापन और खोखलापन एक साथ दिखाई देता है। भाषा में छल-कपट और सतहीपन आया है और वह अपनी ताकत खो बैठी है। इसकी एवज में उसने जिस शक्ति को पाया है वह नकारात्मक है। भाषा दोधारी तलवार की तरह होती है। माना यह जाता है कि हम भाषा का इस्तेमाल कर रहे हैँ, मगर अक्सर भाषा भी हमारा इस्तेमाल करती है। समाज की परम्पराओं और विरासतों के साथ खिलवाड़ अपनों को भी नहीं छोड़ता। आंच आग भड़काने वालों को भी अपनी चपेट में लेती है। इस सबके चलते पूरे समाज की भाषा में, फिलहाल अपरिवर्तनीय दिखता जो परिवर्तन हो रहा है उसकी भरपाई और दुरुस्ती में कितना वक़्त लगेगा?

लोकतंत्र में जिस ‘हम’ का होना पहली शर्त हुआ करती थी, वह व्यक्ति के अहम में रूपांतरित होते-होते ‘मै’ ‘मैं’ के आत्मालाप में प्रतिष्ठित हो चुका है। यह सिर्फ सत्तारूढों का ही नहीं,  ज्यादातर विपक्ष का लहजा बन चुका है। यह सिर्फ व्याकरण का मसला नहीं है – यह आचरण का मामला है जो संसदीय लोकतंत्र में उस व्यक्ति-केन्द्रिकता को स्थापित करता है जिसमें तानाशाही और अधिनायकत्व के खतरे निहित हैं। यह सब अनायास नहीं है, बल्कि सोचे-समझे तरीके से तैयार किया गया रोडमैप है। यह लोगों के लिए खुद को बदलने की बजाय अपने अनुकूल लोग तैयार करने की कोशिश का हिस्सा है। समाज को सामाजिकता के सहज गुण से वंचित करने की परियोजना है। इसलिए इसे महज कुछ व्यक्तियों का मुखालाप मानकर अनदेखा नहीं किया जा सकता। इसे सहेजने और बचाने का काम भी किसी और के जिम्मे नहीं छोड़ा जा सकता। (सप्रेस)

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