राजनीति शख्सियत

भरत सिंह कुंदनपुर : पंचायती राज मंत्री से पंच बन गांव की सेवा करने वाले नेता का जाना

भरत सिंह कुंदनपुर : पंचायती राज मंत्री से पंच बन गांव की सेवा करने वाले नेता का जाना

राजस्थान की राजनीति में भरत सिंह कुंदनपुर का नाम उस विरले नेता के रूप में लिया जाएगा, जिसने मंत्री पद की शोहरत छोड़ गांव की गलियों को चुना। पंच बनकर उन्होंने साबित किया कि राजनीति का अर्थ सत्ता नहीं, समाज...

अमरपाल सिंह वर्मा

राजस्थान की राजनीति में भरत सिंह कुंदनपुर का नाम उस विरले नेता के रूप में लिया जाएगा, जिसने मंत्री पद की शोहरत छोड़ गांव की गलियों को चुना। पंच बनकर उन्होंने साबित किया कि राजनीति का अर्थ सत्ता नहीं, समाज की सेवा है। उनके जाने से जनहित की एक सशक्त आवाज मौन हो गई।

स्‍मृति शेष

राजस्थान की राजनीति में भरत सिंह कुंदनपुर का नाम उस पीढ़ी के नेताओं में लिया जाएगा जिन्होंने सत्ता को साधन नहीं बल्कि सेवा का माध्यम माना। राज्य के पंचायती राज मंत्री रहते हुए उन्होंने ग्रामीण विकास की योजनाओं को आम आदमी तक पहुंचाया, पंचायतों को नवाचार के लिए प्रेरित किया लेकिन उनके व्यक्तित्व की असली झलक तब दिखी जब इस पंचायती राज मंत्री रहे नेता ने अपने गांव लौटकर पंच का चुनाव लड़ा और जीत कर गांव के विकास में योगदान देने लगे।

भरत सिंह ने राजनीति की शुरुआत सरपंच बनकर की थी। वह अपने गांव में तीन बार सरपंच चुने गए। इसके बाद पंचायत समिति प्रधान बने। चार बार विधायक और राजस्थान सरकार मे मंत्री रहने के बाद वर्ष 2014 में उन्होंने पंचायत चुनाव में पंच पद के लिए नामांकन दाखिल किया तो राजनीतिक हलकों में हलचल मच गई। लोग हैरान थे कि जो व्यक्ति राज्य स्तरीय नीतियां बनाता था, वह अब गांव की चौपाल में बैठने जा रहा है। लेकिन भरत सिंह ने मुस्कराते हुए कहा था कि मंत्री रहते हुए जो काम न करा सका, वे काम अब बतौर पंच कराऊंगा। उनका यह बयान सिर्फ विनम्रता नहीं, लोकतंत्र की असली भावना का प्रतीक था। भरत सिंह ने यह दिखाया कि राजनीति का असली उद्देश्य पद पाना नहीं बल्कि समाज को दिशा देना है। जब उन्होंने पुन: पंच बनने का फैसला किया, तो कई लोगों ने इसे ‘पद का पतन’ कहा लेकिन उन्होंने इसे सेवा का अवसर माना। वे कहा करते थे कि जो काम ऊपर से नहीं हो सके, वे नीचे से जरूर हो सकते हैं। यही उनके राजनीतिक दर्शन की सबसे बड़ी सीख थी।

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75 साल की उम्र में बीती रात को कांग्रेस के इस बड़े नेता ने दुनिया को अलविदा कह दिया मगर वह न केवल मतदाताओं के दिलों में रहेंगे बल्कि ईमानदारी और सादगी से राजनीति करने के इच्छुक लोगों को भी प्रेरणा देते रहेंगे। उनका समूचा जीवन कुछ ऐसा ही था। उन्होंने हमेशा सही को सही और गलत को गलत कहा। सदैव भ्रष्टाचार और अन्याय के खिलाफ आवाज बुलंद की। वह अपनी ही पार्टी की सरकार के मंत्री पर भ्रष्टाचार के आरोप लगाने से नहीं चूके। विभिन्न मुद्दों पर अपनी सरकार विरोध में उन्होंने सिर मुंडवा लिया था। हमेशा जल, जंगल और जमीन के संरक्षण की बात करते रहे। उन्होंने जीवन भर पंचायती राज के सशक्तीकरण की वकालत की। विधानसभा में हमेशा जनहित के मुद्दों को उठाते रहे। इसी वजह से उन्हें वर्ष 2007 में सर्वश्रेष्ठ विधायक का पुरस्कार मिला। उनकी ईमानदारी को विपक्ष के नेता भी स्वीकार करते थे।


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एक ओर जहां नेता कुर्सी से चिपके रहते हैं, वहीं दूसरी ओर भरत सिंह ने 2018-23 के दौरान विधायक रहते हुए आगामी चुनाव नहीं लडऩे की घोषणा कर राज्य की राजनीति में एक नई परंपरा स्थापित की। उनका यह निर्णय सत्ता के मोह से मुक्ति का प्रतीक था। आज के दौर में जहां नेता ऊंचे पदों की चाह में जनता से दूर होते जा रहे हैं, वहीं उन्होंने अपने जीवन का संध्या काल गांव की गलियों में बिताने का निश्चय किया। उनका मानना था कि असली राजनीति पंचायत से शुरू होती है क्योंकि यहीं से जनता के जीवन में बदलाव आता है। जब वह मंत्री रहने के बाद पंच बने तो उन्होंने कहा था कि पंच बनना सिरफिरेपन जैसा है पर अगर गांव का भला करना है तो थोड़ा सिरफिरा होना ही पड़ेगा। यह कथन उनकी निडर सोच को दर्शाता है।

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भरत सिंह की पत्नी गांव की सरपंच थीं। दोनों ने मिलकर पंचायत चलाने की अनूठी मिसाल पेश की। उनका कहना था कि विधानसभा में काम बोलने का होता है लेकिन गांव में काम सुनने का। उनकी मान्यता थी कि योजनाएं तभी सफल होंगी जब उनका असर जमीनी स्तर तक पहुंचे। यही कारण था कि वह पंच बनकर वे उन्हीं नीतियों को जमीन पर उतारने में जुट गए जिनका कभी मसौदा उन्होंने मंत्री रहते हुए तैयार किया था।

15 साल पहले जब मैं नागौर में राजस्थान पत्रिका में सेवारत था तो मुझे भरत सिंह से मिलने और बात करने का मौका मिला। उन्होंने कहा था कि पढ़े-लिखे और अनुभवी लोगों को गांव की राजनीति में आना चाहिए ताकि पंचायतें मजबूत बनें। वह इस बात से आहत थे कि योजनाओं का लाभ पात्र लोगों को पूरी तरह नहीं मिल पाता। भ्रष्टाचार गांवों के विकास में बड़ी समस्या है।

भरत सिंह का दुनिया से जाना केवल एक व्यक्ति की मृत्यु नहीं बल्कि उस विचार की क्षति है जो राजनीति को सेवा का पर्याय मानता था। उन्होंने लोकतंत्र को ऊपर से नीचे तक जिया। उनका जीवन यह बताता है कि पद छोटा हो या बड़ा पर अगर नीयत साफ हो तो हर जगह बदलाव संभव है। सिंह के मंत्री से पंच बनने की यह यात्रा न केवल साहसिक थी बल्कि यह भी दिखाती है कि सच्चा जननेता वही है जो भीड़ से अलग चलने का साहस रखता हो। सिंह ने यह सिखाया कि लोकतंत्र की असली ताकत संसद या सचिवालय में नहीं, गांव की चौपाल में बसती है। पंचायती राज के इस कर्मयोगी ने सादगी, विनम्रता और सेवा भाव से अपनी राजनीति को गांव की उस धरती से जोड़ा, जहां से लोकतंत्र की जड़ें शुरू होती हैं। (सप्रेस)

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