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दुनिया के बढ़ते संकटों के बीच गांधी की राह ही दिखाएगी रास्ता

दुनिया के बढ़ते संकटों के बीच गांधी की राह ही दिखाएगी रास्ता

भागलपुर में तीन दिनों तक गांधी पर हुआ अंतरराष्ट्रीय मंथन

चरखा घूमता है तो सिर्फ सूत नहीं बनता। वह मनुष्य और श्रम के बीच एक रिश्ता भी बनाता है। खादी केवल शरीर ढकने का कपड़ा नहीं है। वह इस सवाल को भी सामने लाती है कि हम क्या पहनते हैं, किसके श्रम से पहनते हैं और हमारे विकास का लाभ किस तक पहुंचता है। गांधी के लिए स्वावलंबन केवल आर्थिक शब्द नहीं था। उसमें मनुष्य की गरिमा, समाज की आत्मनिर्भरता और शांति की बुनियाद छिपी थी। शायद इसी वजह से आज भी दुनिया के अलग-अलग हिस्सों में गांधी के चरखे और खादी की चर्चा केवल इतिहास के संदर्भ में नहीं होती।

भागलपुर में तीन दिनों तक गांधी पर हुआ अंतरराष्ट्रीय मंथन इसी पुराने लेकिन बेचैन कर देने वाले सवाल को नए संदर्भ में सामने लाता है—जब दुनिया युद्ध, हिंसा, जलवायु संकट, असमानता और अविश्वास से घिरी हो, तब शांति का रास्ता कहां से निकलेगा?

तिलका मांझी भागलपुर विश्वविद्यालय के गांधी विचार विभाग में आयोजित अंतरराष्ट्रीय सेमिनार का विषय था—‘ज्ञान, कौशल और परंपरा : गांधी-दृष्टि का समकालीन परिप्रेक्ष्य’। विषय जितना अकादमिक था, उसके भीतर छिपे सवाल उतने ही समकालीन। क्या ज्ञान केवल डिग्री का नाम है? क्या कौशल केवल रोजगार पाने का साधन है? क्या परंपरा केवल अतीत की स्मृति है? और क्या गांधी केवल जयंती पर माल्यार्पित की जाने वाली तस्वीर हैं?

तीन दिनों के संवाद ने इन सवालों को एक-दूसरे से जोड़ने की कोशिश की।

सेमिनार के दूसरे दिन ‘चरखा, खादी एवं कौशल विकास’ सत्र में गांधीवादी चिंतक पी.वी. राजगोपाल ने अपने बीज वक्तव्य में गांधी की उस दृष्टि को सामने रखा, जिसमें चरखा, खादी, कौशल और स्वावलंबन अलग-अलग विषय नहीं रह जाते। उन्होंने कहा कि दुनिया के विभिन्न देशों में लोग गांधी के इन विचारों में रुचि ले रहे हैं। गांधी का चिंतन आज की वैश्विक समस्याओं और मनुष्य के भीतर पैदा हो रहे संकटों के बीच भी मार्गदर्शन दे सकता है।

यह बात सुनने में सरल लग सकती है, लेकिन इसके भीतर हमारे समय के विकास मॉडल पर एक गंभीर सवाल छिपा है। यदि विकास का अर्थ केवल अधिक उत्पादन, अधिक उपभोग और अधिक संसाधनों पर अधिकार हो, तो क्या वह मनुष्य को वास्तव में अधिक सुरक्षित और शांत बनाता है? अगर विकास की दौड़ में स्थानीय श्रम, स्थानीय अर्थव्यवस्था, प्रकृति और मनुष्य की गरिमा पीछे छूट जाए, तो उस विकास की कीमत कौन चुकाता है?

गांधी का चरखा इसीलिए आज भी एक राजनीतिक या आर्थिक प्रतीक से अधिक एक नैतिक प्रश्न है।राजगोपाल के विचारों की खासियत यही थी कि उन्होंने गांधी को किसी संग्रहालय में रखी वस्तु की तरह नहीं देखा। चरखे से खादी और खादी से कौशल विकास की यात्रा को उन्होंने मनुष्य की आत्मनिर्भरता से जोड़ा। आत्मनिर्भरता का अर्थ केवल अपने लिए उत्पादन करना नहीं, बल्कि अपनी जरूरतों, श्रम और जीवन के प्रति जिम्मेदारी विकसित करना भी है। यही जिम्मेदारी आगे चलकर सामाजिक शांति का आधार बन सकती है।शांति पर बात करते समय हम अक्सर युद्ध और हथियारों की ओर देखते हैं। गांधी की दृष्टि हमें हिंसा के दूसरे चेहरों को देखने के लिए मजबूर करती है—गरीबी, शोषण, अपमान, भेदभाव, बेरोजगारी, प्रकृति का विनाश और संसाधनों का असमान बंटवारा भी हिंसा के रूप हैं। यदि इन कारणों को अनदेखा करके केवल युद्ध समाप्त करने की बात की जाए तो शांति अधूरी रह जाएगी।

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भागलपुर के इस सेमिनार में गांधी की प्रासंगिकता का प्रश्न इसी व्यापक अर्थ में सामने आया।

उद्घाटन सत्र में अखिल भारतीय गांधी अध्ययन समिति के अध्यक्ष प्रो. सुधीर जेना ने सेमिनार का उद्घाटन किया। विश्वविद्यालय की कार्यवाहक कुलपति प्रो. रंजना दुबे ने अध्यक्षता की। विभागाध्यक्ष डॉ. अमित रंजन सिंह ने अतिथियों का स्वागत किया। शुरुआत राष्ट्रगीत, राष्ट्रगान और सामूहिक ‘रघुपति राघव राजा राम’ से हुई। लेकिन असली परीक्षा इसके बाद शुरू हुई—क्या समारोह में गाया गया गांधी का नाम विचार में भी उतरेगा?

विषय की भूमिका रखते हुए डॉ. उमेश प्रसाद नीरज ने इसी ओर संकेत किया कि सवाल केवल यह पूछने का नहीं है कि गांधी आज प्रासंगिक हैं या नहीं। जरूरी यह समझना है कि वर्तमान समस्याओं के समाधान के लिए गांधी की कौन-सी दृष्टि अपनाई जा सकती है। युद्ध के उन्माद और जलवायु परिवर्तन के बीच दुनिया के सामने यह सवाल और कठिन हो गया है।

प्रो. हितेंद्र पटेल ने मानवता के लिए गांधी के विचारों के महत्व पर चर्चा की। नेपाल के पवन थापा मगर ने भी गांधी की प्रासंगिकता को रेखांकित किया। मुख्य अतिथि प्रो. कृष्ण कुमार सिंह ने गांधी के कथनी और करनी के बीच की दूरी को उनके जीवन के संदर्भ में सामने रखा। गांधी की विशेषता यह थी कि उन्होंने जिस नैतिकता की बात की, उसे अपने जीवन में प्रयोग के रूप में उतारने की कोशिश भी की।

यहीं गांधी आज के सार्वजनिक जीवन के लिए असुविधाजनक हो जाते हैं। क्योंकि गांधी को पढ़ना आसान है, गांधी की कसौटी पर स्वयं को रखना कठिन।

प्रो. विजय कुमार ने शिक्षा व्यवस्था के सवाल को इसी नैतिक जिम्मेदारी से जोड़ा। उनका कहना था कि यदि अंत:करण किसी बड़ी समस्या की ओर संकेत करता है तो उसे बदलने की जिम्मेदारी भी स्वीकार करनी चाहिए। प्रो. दीपु महतो ने कहा कि गांधी असाधारण थे, लेकिन उनके विचारों को जीवन में उतारने वाला व्यक्ति भी अपने स्तर पर महान बनने की दिशा में बढ़ सकता है। कुलपति प्रो. रंजना दुबे ने सांस्कृतिक परंपराओं और नैतिक मूल्यों को बचाने की आवश्यकता पर जोर दिया।

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इस तरह उद्घाटन सत्र गांधी की मूर्ति से गांधी के मनुष्य तक पहुंचने की कोशिश करता दिखाई दिया।

इसके बाद तीन दिनों में छह तकनीकी सत्रों सहित विभिन्न सत्रों में ज्ञान, कौशल, परंपरा, साहित्य, संस्कृति, समाज और सामाजिक संगठनों पर विमर्श हुआ। 450 से अधिक शोधपत्र प्राप्त हुए और दूसरे दिन सौ से अधिक शोधपत्रों की प्रस्तुति तथा चर्चा हुई। ‘गांधी स्मृति : समसामयिक परिप्रेक्ष्य’ नाम से शोधपत्रों का संकलन भी प्रकाशित कर प्रतिभागियों को दिया गया।

‘सत्य के साथ मेरे प्रयोग’ विषयक सत्र में महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय के डॉ. मिथिलेश तिवारी ने गांधी की आत्मकथा के उस पक्ष को सामने रखा जिसमें गांधी अपनी उपलब्धियों के साथ अपनी कमजोरियों को भी स्वीकार करते हैं। यही ईमानदारी उनकी आत्मकथा को अलग बनाती है। आज जब सार्वजनिक जीवन में छवि बचाने की चिंता कई बार सत्य से बड़ी हो जाती है, गांधी की यह स्वीकारोक्ति अपने आप में एक सवाल बन जाती है।

सामाजिक संगठनों की भूमिका, उनकी चुनौतियों और संभावनाओं पर भी गंभीर चर्चा हुई। सर्वोदय की परंपरा और सर्व सेवा संघ के राजघाट केंद्र के महत्व पर हुए सत्र में सामाजिक परिवर्तन की उस परंपरा को याद किया गया जिसमें संस्था का अर्थ केवल कार्यालय या संगठन नहीं, बल्कि समाज के बीच सक्रिय नैतिक हस्तक्षेप था।

सेमिनार के ज्ञान-संश्लेषण सत्र में चर्चा और व्यापक हुई। राजगोपाल के साथ देवघर के रंजन भाई, बिहार सर्वोदय मंडल के अध्यक्ष चंद्रभूषण जी, जगन्नाथ मिश्र आर्थिक प्रबंधन संस्थान के प्यारे लाल जी, पूर्व जीएफ दिल्ली निदेशक सुरेंद्र भाई, प्राचार्य जितेंद्र जी, भागलपुर के रंगकर्मी और सामाजिक कार्यकर्ता उदय भाई तथा परिवार विकास जमुई के भाबा नंद जी, डा रविशंकर कुमार चौधरी सहित अनेक लोगों ने वैश्विक परिस्थितियों और गांधी के विचारों पर संवाद किया।

संयुक्त राष्ट्र की भूमिका और विश्व शांति की वर्तमान व्यवस्था की सीमाओं पर भी चर्चा हुई। सवाल यह था कि जब संस्थागत व्यवस्थाएं युद्ध और हिंसा को रोकने में बार-बार चुनौती का सामना करती हैं, तब क्या केवल संस्थाओं पर निर्भर रहना पर्याप्त है? गांधी का रास्ता शायद यहां से व्यक्ति और समाज की नैतिक जिम्मेदारी की ओर जाता है।

सत्य, अहिंसा, शांति, स्वावलंबन और मानवीयता गांधी के लिए अलग-अलग खानों में रखे हुए सिद्धांत नहीं थे। वे एक-दूसरे से जुड़े हुए थे। इसी वजह से चरखा और विश्व शांति का संबंध पहली नजर में जितना असामान्य लगता है, गांधी की दृष्टि में उतना ही स्वाभाविक है।

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जिस समाज में श्रम का सम्मान नहीं, वहां समानता कमजोर होगी। जहां स्थानीय अर्थव्यवस्था नष्ट होती है, वहां निर्भरता बढ़ेगी। जहां प्रकृति को केवल संसाधन माना जाएगा, वहां पर्यावरणीय संकट बढ़ेगा। और जहां मनुष्य को केवल उपभोक्ता समझा जाएगा, वहां उसकी नैतिक स्वतंत्रता भी कमजोर होगी। गांधी का स्वावलंबन इन सभी प्रश्नों को एक साथ देखने का आग्रह करता है।

गांधी जयंती की पूर्व संध्या पर आयोजित दीप यज्ञ में एक हजार से अधिक मिट्टी के दीप जलाए गए। दृश्य सुंदर था, लेकिन गांधी को समझने की चुनौती सुंदर दृश्यों से आगे है। दीप जलाना आसान है; अपने भीतर और समाज में हिंसा के अंधेरे को पहचानना कठिन।

तीन दिनों का यह मंथन इसी कठिन सवाल के साथ समाप्त हुआ। अंतिम दिन गांधी जयंती समारोह और विभाग के पूर्व विद्यार्थियों का मिलन हुआ। गांधी विचार विभाग के पूर्ववर्ती छात्र मनोज सिन्हा और सुनील कुमार अग्रवाल के अनुसार -स्मृति और वर्तमान का यह मिलन अपने आप में महत्वपूर्ण था।

लेकिन गांधी को याद करने का सबसे ईमानदार तरीका शायद यही होगा कि हम उनके विचारों को अपने समय के कठघरे में खड़ा करें। क्या हमारी शिक्षा मनुष्य को जिम्मेदार बना रही है? क्या हमारा विकास स्थानीय श्रम और प्रकृति का सम्मान करता है? क्या हमारी अर्थव्यवस्था स्वावलंबन बढ़ाती है या निर्भरता? क्या हमारी राजनीति और सार्वजनिक संस्थाएं संवाद को जगह दे रही हैं? और क्या शांति को हम केवल सीमा पर बंदूकें शांत होने के रूप में देखते हैं?

भागलपुर के तीन दिनों के विमर्श का महत्व इन सवालों में है। गांधी की प्रासंगिकता का प्रमाण किसी समारोह में उनके नाम का उच्चारण नहीं, बल्कि इन प्रश्नों से मुठभेड़ है।

अशांत दुनिया में शांति का रास्ता शायद किसी एक संस्था, किसी एक नीति या किसी एक भाषण से नहीं निकलेगा। वह मनुष्य के जीवन में सत्य, समाज में अहिंसा, अर्थव्यवस्था में स्वावलंबन, शिक्षा में नैतिकता और विकास में मानवीयता के मेल से बनेगा।

चरखा इसी मेल का छोटा-सा प्रतीक है। वह धीरे घूमता है, लेकिन उसका सवाल बहुत दूर तक जाता है—हम किस तरह की दुनिया बनाना चाहते हैं?

भागलपुर में तीन दिनों तक गांधी पर मंथन हुआ। असली परीक्षा अब शुरू होती है—क्या यह मंथन सभागार से निकलकर समाज तक जाएगा?

लेखक का परिचय

कुमार कृष्णन

कुमार कृष्णन स्‍वतंत्र पत्रकार है।

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