गांधी दर्शन और विचार शख्सियत

डॉ. एस.एन.सुब्बराव ‘भाईजी’ : सेवा, सद्भाव और अहिंसा के पथिक

डॉ. एस.एन.सुब्बराव ‘भाईजी’ : सेवा, सद्भाव और अहिंसा के पथिक
पारस प्रताप सिंह ‘पुरुषार्थ’

कुछ व्यक्तित्व जीवन से विदा होकर भी हमारी स्मृतियों, विचारों और कर्मों में जीवित रहते हैं। डॉ. एस. एन. सुब्बाराव ‘भाईजी’ ऐसे ही गांधीवादी थे, जिन्होंने अपना जीवन प्रेम, अहिंसा, युवा चेतना और समाज के वंचित तबकों की सेवा के लिए समर्पित किया। उनकी पांचवीं पुण्यतिथि पर उन्हें याद करना उन मानवीय मूल्यों और जीवन-दृष्टि को फिर से महसूस करना है, जिनकी आज भी उतनी ही जरूरत है।


डॉ. एस.एन.सुब्बराव  : पाँचवीं पुण्यतिथि

कुछ व्यक्तित्व ऐसे होते हैं, जिनसे हमारी मुलाकातें भले ही बहुत कम हों, लेकिन उनका जीवन हमारे भीतर हमेशा के लिए बस जाता है। वे हमारे साथ नहीं होते, फिर भी किसी निर्णय के समय, सेवा के किसी कार्य में, युवाओं के बीच खड़े होते हुए या समाज के अंतिम व्यक्ति की पीड़ा देखते हुए उनकी याद हमारे भीतर एक आवाज बनकर सुनाई देती है।

मेरे लिए परम श्रद्धेय डॉ. एस. एन. सुब्बराव जी हम सबके प्रिय ‘भाईजी’ ऐसे ही व्यक्तित्व थे।

मैंने महात्मा गांधी को नहीं देखा, लेकिन भाईजी को देखकर और उनके जीवन को समझकर हमेशा यह अनुभूति हुई कि गांधी के विचारों को अपने आचरण में उतारकर जीने वाला व्यक्ति कैसा होता होगा। 27 अक्टूबर को उनकी पाँचवीं पुण्यतिथि पर उनकी स्मृतियाँ फिर मन में जीवंत हो उठी हैं।

वर्ष 2019 में जलपुरुष डॉ. राजेंद्र सिंह जी, जिन्हें मैं बापू जी कहकर बुलाता हूं, के माध्यम से मेरा भाईजी से पहला परियच हुआ था, जुड़ाव तो 2018 से हो गया था। उसी वर्ष पहली बार उनसे बातचीत करने का अवसर भी मिला। इतना विशाल व्यक्तित्व, लेकिन व्यवहार में उतनी ही सरलता। देश के प्रति उनका प्रेम, युवाओं के प्रति उनका विश्वास और हर व्यक्ति को अपनापन देने की अनन्य प्रतिमा, जहां तक सब प्रेममय।

उम्र के आखरी पड़ाव पर भी जब वे ताल बजाते हुए गीत गाते थे, तो युवाओं में एक नई ऊर्जा दौड़ जाती थी। उनका गायन केवल मनोरंजन नहीं था; उसमें देशभक्ति थी, भाईचारा था, अहिंसा का संदेश था और युवाओं को राष्ट्र निर्माण के लिए खड़ा कर देने की शक्ति थी। मैं मन ही मन उन्हें अपना प्रेरणास्रोत मान चुका था। मैं उन्हें आदर से ‘गुरुजी’ कहकर ही संबोधित करता था। मेरे मन में हमेशा एक इच्छा रहती थी कि मुझे उनके साथ अधिक समय बिताने का अवसर मिले। मैं उनके पास बैठूं, उन्हें सुनूं और उनके जीवन से सीखूं। जलपुरुष जी के निजी सचिव के तौर पर काम करने के कारण उनका प्रत्यक्ष सान्निध्य मुझे कम मिल पाया।

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जब वे जयपुर के अस्पताल में भर्ती थे, तब उन्हें देखने जाने का अवसर मिला। मुझे क्या पता था कि वह मेरी उनसे अंतिम मुलाकात बन जाएगी। एक ऐसा समय जब एक ओर नई पाठशाला, दूसरी ओर जीवन की अंतिम सांसें। उनके जीवन के अंतिम दिनों से जुड़ी एक घटना मेरे जीवन की सबसे भावुक स्मृतियों में से एक है। तारीख थी 26 अक्टूबर 2021। जलपुरुष जी के साथ गुजरात से राजस्थान की ओर जल साक्षरता यात्रा में आगे बढ़ रहे थे। हमारे साथ  सेवानिवृत्त बैंक प्रबंधक राजेंद्र यादव, कर्नाटक के किसान नेता दयानंद और मैं था वहां डॉ. एस. एन. सुब्बराव शिक्षा संस्कार शाला भादावेरी, पंचायत मोरस, जिला सिरोही, राजस्थान। मुख्य मार्ग से गांव तक पहुंचना ही अपने आप में वहां के जीवन की कठिनाइयों को समझने के लिए पर्याप्त था। कच्ची पगडंडी से चलते हुए हमें एक नदी पार करनी पड़ी। नदी पर कोई पुल नहीं था। बताया गया कि बरसात के दिनों में ग्रामीणों को नदी तैरकर पार करनी पड़ती है। मुख्य मार्ग से करीब डेढ़ किलोमीटर पैदल चलने के बाद हम उस आदिवासी बस्ती में पहुंचे।

वह दृश्य आज भी मेरी आंखों में जीवंत है। लकड़ी और स्थानीय संसाधनों से बनी छोटी-छोटी झोपड़ियां। कोई पक्का मकान नहीं। न सड़क, न बिजली और न बच्चों के लिए स्कूल। बस्ती की सबसे बड़ी झोपड़ी में लगभग 25 बच्चे अपने माता-पिता के साथ हमारा इंतजार कर रहे थे। बच्चे और ग्रामीण अपनी परंपरागत वेशभूषा में थे। अभाव उनके कपड़ों में दिखाई दे रहा था, लेकिन चेहरे पर जो सहज मुस्कान थी, वह किसी संपन्नता से कम नहीं थी। जब हम पहुंचे तो उनकी आंखों में एक अलग चमक थी। वे हमें आशा से देख रहे थे और हम उनकी आंखों में अपने देश के उस भारत को देख रहे थे, जहां आज भी विकास की रोशनी पूरी तरह नहीं पहुंच सकी है।

लेकिन उस दिन उस छोटी-सी आदिवासी बस्ती में इतिहास लिखा जा रहा था।उस गांव की पहली पाठशाला शुरू हो रही थी। गांव की पहली पीढ़ी चली थी पढ़ने भाईजी से प्रेरित होकर सेवानिवृत्त बैंक प्रबंधक राजेंद्र यादव ने अपने जीवन का आराम छोड़कर इन बच्चों की शिक्षा के लिए स्वयं को समर्पित कर दिया था। वे चाहते तो नौकरी से सेवानिवृत्त होने के बाद आराम का जीवन जी सकते थे। लेकिन उन्होंने दूसरा रास्ता चुना सेवा का रास्ता। यही तो भाई जी की शक्ति थी। अपने संसाधनों से उन्होंने उस दुर्गम आदिवासी क्षेत्र में पाठशाला प्रारंभ कराई।

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वहीं मुझे पहली बार और गहराई से समझ आया कि संसाधनों की वास्तविक आवश्यकता कहां है। वहां जाकर समझ आया कि भाईजी का काम कितना विशाल था। वहां समझ आया कि मानवता से बड़ा कोई धर्म नहीं। वहां समझ आया कि पैसे और खुशी का रिश्ता उतना सीधा नहीं है, जितना हम शहरों में बैठकर मान लेते हैं। वहां समझ आया कि प्रकृति मनुष्य के जीवन का कितना अभिन्न हिस्सा है। और वहां यह भी समझ आया कि जिस अन्न के एक दाने को हम कभी-कभी सहजता से व्यर्थ कर देते हैं, किसी दूसरे व्यक्ति के लिए वही एक दाना कितना मूल्यवान हो सकता है।

उस दिन एक अद्भुत और पीड़ादायक संयोग घट रहा था। राजस्थान की उस दूरस्थ आदिवासी बस्ती में भाईजी की प्रेरणा से बच्चों की शिक्षा का एक छोटा-सा दीपक जलाया जा रहा था और दूसरी ओर हमारे प्रिय भाईजी अपने जीवन की अंतिम सांसों की ओर बढ़ रहे थे। 26 अक्टूबर को उनकी प्रेरणा से पाठशाला शुरू हुई और अगले ही दिन, 27 अक्टूबर 2021 को भाईजी इस संसार से विदा हो गए।

समाचार मिला तो विश्वास करना कठिन था। जिस व्यक्ति ने अपना पूरा जीवन युवाओं में आशा जगाने, प्रेम बांटने और अहिंसा का संदेश देने में लगा दिया था, वह शरीर से हमारे बीच नहीं रहा था। डॉ. राजेंद्र सिंह जी के साथ हम सिरोही से महात्मा गांधी सेवा आश्रम, जौरा ग्वालियर की ओर रवाना हुए।

ग्वालियर स्थित आश्रम में उस दिन भारी जनसैलाब था। देशभर से भाईजी को प्रेम करने और उनसे प्रेरणा लेने वाले लोग पहुंचे थे। अनेक वरिष्ठ सामाजिक कार्यकर्ता, गांधीवादी और सार्वजनिक जीवन से जुड़े लोग उनकी अंतिम यात्रा के साक्षी बने। मैं भी भीड़ के बीच खड़ा था, लेकिन भीतर एक गहरा सन्नाटा था। बार-बार यही विचार मन में आ रहा थाकि इतना बड़ा व्यक्तित्व और इतनी सरल जिंदगी! जिस मनुष्य ने अपना जीवन अपने लिए नहीं, देश और युवाओं के लिए जिया, आज उसकी अंतिम यात्रा में खड़े होने का अवसर मिला है।

मेरी आंखें नम थीं। मुझे उनके अंतिम संस्कार में अपनी श्रद्धा अर्पित करने का अवसर मिला। वह क्षण मेरे लिए केवल किसी महान व्यक्ति की अंतिम विदाई नहीं था; वह अपने एक प्रेरणास्रोत, अपने गुरु को विदा करने का क्षण था।

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अगले दिन उनकी अस्थियां हाथ में आईं तो आंखें छलक पड़ीं। कुछ दिनों बाद एक और ऐसा क्षण आया, जिसे शब्दों में बांधना आज भी कठिन है। भाईजी की अस्थियों का पहला एक कलश मुझे सौंपा गया। वरिष्ठ गांधीवादी पी. वी. राजगोपाल, स्व. रनसिंह परमार, जिल हरिश ने अपने हाथों से वह कलश मुझे दिया। लाल कपड़े में बंधा वह अस्थि कलश जब मेरे हाथों में आया तो आंखों से आंसू निकल पड़े। जिन्हें जीवन में प्रेरणास्रोत माना, आज उनकी अस्थियों को अपने हाथों में लेकर उनके विसर्जन की जिम्मेदारी मिली है। इसे मैं अपने जीवन का सौभाग्य मानता हूं।

डॉ. राजेंद्र सिंहजी के मन में भी भाईजी के प्रति अत्यंत गहरा आदर और प्रेम था। मैंने उनके भीतर भाईजी के प्रति जो श्रद्धा देखी, वह सामान्य संबंधों से कहीं ऊपर थी। भाईजी उनके लिए शांति, सद्भाव और अहिंसा की जीवंत प्रतिमूर्ति थे। भाईजी आज भी मेरे साथ हैं आज भाईजी शरीर से हमारे बीच नहीं हैं, लेकिन जब मैं युवाओं के बीच काम करता हूं, उनकी याद आती है। जब किसी आदिवासी बस्ती में बच्चों को पढ़ते देखता हूं, भाईजी याद आते हैं। जब समाज के अंतिम व्यक्ति तक शिक्षा, सम्मान और अवसर पहुंचाने की बात होती है, भाईजी याद आते हैं। जब हिंसा, द्वेष और वैमनस्य की खबरें सुनता हूं, तब और भी अधिक लगता है कि आज देश को एस. एन. सुब्बराव जैसे व्यक्तित्वों के विचारों की कितनी आवश्यकता है।

उन्होंने हमें सिखाया कि युवाओं को केवल भाषण देकर नहीं, बल्कि प्रेम और विश्वास देकर राष्ट्र निर्माण से जोड़ा जा सकता है। उन्होंने सिखाया कि देशसेवा किसी पद की मोहताज नहीं होती। उन्होंने सिखाया कि अहिंसा कमजोरी नहीं, बल्कि मनुष्य की सबसे बड़ी शक्ति है। और उन्होंने अपने जीवन से बताया कि स्वयं के लिए जीया गया जीवन समाप्त हो जाता है, लेकिन समाज के लिए जीया गया जीवन स्मृतियों और विचारों में अमर हो जाता है।

भाईजी चले गए, लेकिन वह दीपक आज भी जल रहा है। उनकी स्मृतियां मेरे जीवन की अमूल्य धरोहर हैं। उनका जीवन मुझे सदैव युवाओं, वंचितों और आदिवासी समाज के बीच सेवा करने तथा प्रेम, शांति और अहिंसा के मार्ग पर चलने की प्रेरणा देता रहेगा।

लेखक का परिचय

पारस प्रताप सिंह ‘पुरुषार्थ’

पारस प्रताप सिंह ‘पुरुषार्थ’ तरूण भारत संघ, अलवर से जुड़े है। वे पानी वाले बाबा के नाम से ख्‍यात डॉ. राजेंद्र सिंह के निजी सचिव के तौर पर काम करते है।

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