विचार शख्सियत

नेहरू के पुण्य स्मरण के बहाने ‘भारतीयता’ की खोज !

नेहरू के पुण्य स्मरण के बहाने ‘भारतीयता’ की खोज !

क्या आज का भारत उस ‘भारतीयता’ से दूर होता जा रहा है जिसकी कल्पना पंडित जवाहरलाल नेहरू ने ‘डिस्कवरी ऑफ इंडिया’ में की थी? बदलते राजनीतिक-सामाजिक माहौल, धार्मिक पहचान के बढ़ते आग्रह और नागरिक स्वतंत्रताओं पर उठते सवालों के बीच...

लेखक की फोटो

क्या आज का भारत उस ‘भारतीयता’ से दूर होता जा रहा है जिसकी कल्पना पंडित जवाहरलाल नेहरू ने ‘डिस्कवरी ऑफ इंडिया’ में की थी? बदलते राजनीतिक-सामाजिक माहौल, धार्मिक पहचान के बढ़ते आग्रह और नागरिक स्वतंत्रताओं पर उठते सवालों के बीच यह बहस तेज हो गई है कि क्या ‘नए भारत’ के निर्माण के लिए एक नई भारतीयता गढ़ी जा रही है। हाल के वर्षों की घटनाएँ संकेत देती हैं कि देश अपनी मूल पहचान को लेकर गहरे वैचारिक द्वंद्व से गुजर रहा है।


शायद यही सही समय है पूछे जाने का कि देश के प्रथम प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू ने आज़ादी के पहले अहमदनगर क़िले के कारावास के दौरान अपनी महान रचना ‘डिस्कवरी ऑफ़ इंडिया’ के ज़रिए जिस प्राचीन ‘भारत’ और ‘भारतीयता’ की खोज की थी वह क्या अब अप्रासंगिक और ग़ैर-ज़रूरी हो गई है ? सत्तारूढ़ बीजेपी और संघ  के सपनों के ‘नए भारत’ के निर्माण के लिए क्या किसी नई भारतीयता की तलाश या फिर उसका आविष्कार आवश्यक हो गया है ?

कोई तो कारण अवश्य ही रहा होगा कि नेहरू को आधुनिक भारत का निर्माता कहा जाता है ! सवाल खड़े किए जा रहे हैं कि जिस ‘भारतीयता’ से नेहरू ने देश का साक्षात्कार कराया था वह तात्कालिक परिस्थितियों की देन थी। वे स्थितियाँ अब प्रासंगिक नहीं रहीं हैं। उक्त ‘धर्मसंकट’ एक ऐसे समय उपस्थित हुआ है जब ‘भारतीयता’ की अलग-अलग व्याख्याओं पर बुद्धिजीवियों और धर्मगुरुओं के बीच चल रहे संघर्षों के बीच नागरिक अपने प्राणों की रक्षा के लिए रास्ते तलाश रहे हैं !

See also  बच्चों की हंसी में ही बसता है भारत का भविष्य

असली ‘भारतीयता’ क्या है उसे समझाने की हाल के सालों की पहली असफल कोशिश कोई सात साल पहले एक ऑनलाइन फ़ूड डिलीवरी कंपनी ने की थी। उस कोशिश के अंतिम परिणाम इंडिकेटर थे कि 2026 में ‘भारतीयता’ अपने किस स्वरूप में प्रकट होने वाली है ! वे तमाम लोग जो इस समय जो चल रहा है को लेकर चिंतित हैं उन्होंने भी उन इंडिकेटरों को पढ़ने से इनकार कर दिया था।

ऑनलाइन फ़ूड डिलीवरी कंपनी ने अपने एक ग्राहक के ऑर्डर को उसकी केवल इस आपत्ति पर निरस्त कर उसे रिफ़ंड देने से इंकार कर दिया था कि डिलीवरी बॉय ग़ैर-हिन्दू है। न सिर्फ़ इतना ही ! कंपनी के संस्थापक ने इस तरह का ट्वीट करके कट्टरपंथियों के बीच हल्ला मचा दिया था कि :’ खाने का कोई धर्म नहीं होता ! ख़ाना ख़ुद एक धर्म है ! ‘भारतीयता’ के विचार और अपने ग्राहकों और सहयोगियों की विविधता पर हमें गर्व है !’

फ़ूड डिलीवरी वाले मामले में जब ‘डिलीवरी बॉय’ को बदलने की माँग करने वाले व्यक्ति की पहचान सार्वजनिक हो गई तो उसने भी साफ़-साफ़ कह दिया कि कंपनी को उसकी व्यक्तिगत पसंद के प्रति सहमति व्यक्त करना चाहिए थी।’अगर आपको किसी दुकान से लाल रंग की क़मीज़ चाहिए तो वही मिलनी चाहिए ,काली नहीं ! मेरी अपनी भी धार्मिक स्वतंत्रता है ! मुझे भी अपनी धार्मिक स्वतंत्रता की अभिव्यक्ति और आज़ादी का अधिकार है।’

बताया गया था कि उक्त विवाद के बाद ग्राहक के ट्विटर अकाउंट पर फ़ॉलोवर्स की संख्या में कई गुना वृद्धि हो गई।कुछ धार्मिक और राजनीतिक संगठन भी उसके पक्ष में खड़े हो गए। ग्राहक के समर्थकों ने इस स्वदेशी फ़ूड डिलीवरी कंपनी के ख़िलाफ़ उसकी प्रतिद्वंद्वी ‘विदेशी’ फ़ूड डिलीवरी कंपनी को अपना समर्थन देना प्रारंभ कर दिया।

See also  जवाहरलाल नेहरू का भारत : आजादी, लोकतंत्र और विश्वबंधुत्व का सफर

बहुत मुमकिन है देश ने तब महसूस नहीं किया हो और हक़ीक़त रही हो कि नेहरू द्वारा प्रतिपादित ‘भारतीयता’ के अंतर्वस्त्र 27 मई 1964 के दिन उनके निधन के बाद से ही तार-तार होना शुरू हो गए थे और अब इतने सालों के बाद हम अपने आपको अंदर और बाहर से अलग-अलग दिखाई पड़ते परेशान हो रहे हैं।

हम शायद स्वीकारने के लिये तैयार नहीं होंगे कि अपने होने या अपनी असली पहचान को लेकर इस समय किसी अंधेरी सुरंग से गुज़र रहे हैं। हमें जानकारी नहीं है कि हमारे आगे कौन चल रहा है और पीछे कितने लोग हैं !   अंधेरों में भी हमने नक़ाबें पहन रखी हैं। हम अपनी यात्राएँ भी बदले हुए नामों से कर रहे हैं। इतिहास जब बदला जाने लगता है तो नागरिक भी अपने नाम,ठिकाने और धारणाएँ बदल लेते हैं। सत्ताएँ तब ‘भारतीयता’ के मूल की खोज बंद करके उन व्यक्तियों की सूचियाँ बनाने में जुट जाती है जिन्हें वह ‘भारतीय’ नागरिक मानती है। डिलीवरी बॉय ने तब जो कहा था आज भी उतना ही सच है कि :’मेरे साथ ऐसा पहले भी हो चुका है । हम ग़रीब लोग हैं ! ऐसी चीजें सहन करना पड़ेगी।’

जुड़ें - हमारे व्हाट्सएप चैनल से

सप्रेस मीडिया - नवीनतम आलेख, रिपोर्ट, समाचार अपडेट सीधे अपने व्हाट्सएप पर प्राप्त करें।

व्हाट्सएप ग्रुप से जुड़ें →

निष्पक्ष पत्रकारिता का समर्थन करें

आज के दौर में निष्पक्ष, स्वतंत्र और जन-सरोकार की पत्रकारिता को जीवित रखना बड़ी चुनौती है। विज्ञापनदाताओं और कॉर्पोरेट के दबाव से मुक्त होकर आप तक सही और सटीक खबरें पहुंचाना हमारा मुख्य उद्देश्य है। हमारी स्वतंत्रता को बनाए रखने के लिए आपके आर्थिक सहयोग की आवश्यकता है। आपकी दी हुई छोटी-सी सहयोग राशि हमें सच्ची पत्रकारिता करते रहने का संबल देगी।

सहयोग राशि →

नवीन आलेख