जवाहरलाल नेहरू का भारत : आजादी, लोकतंत्र और विश्वबंधुत्व का सफर

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पंडित जवाहरलाल नेहरु भारत के स्वतंत्रता संग्राम के ऐसे प्रखर नायक थे जिन्होंने न केवल आजादी की लड़ाई में निर्णायक भूमिका निभाई, बल्कि स्वतंत्र भारत की लोकतांत्रिक नींव, औद्योगिक आधार और वैश्विक पहचान को भी मजबूत किया। विश्वशांति, गुटनिरपेक्षता और मानवाधिकारों के प्रति उनकी प्रतिबद्धता ने उन्हें अंतरराष्ट्रीय पटल पर विशिष्ट स्थान दिलाया।


14 नवंबर : 137 वीं नेहरू जयंती

अरविंद जयतिलक

पंडित जवाहरलाल नेहरु आजादी के उन महानायकों में से है जिन्होंने न केवल भारत को स्वतंत्र कराने में शानदार भूमिका निभायी बल्कि विश्व भर में भारत की प्रतिष्ठा को भी स्थापित किया। सोलह वर्षों तक निरंतर प्रधानमंत्री पद पर रहते हुए उन्होंने नव-अर्जित स्वतंत्रता को सुगठित किया और देश को सुदृढ़ औद्योगिक अधिष्ठान पर खड़ा किया। पिता मोतीलाल की इच्छा थी कि उनका इकलौता बेटा ऊंची से ऊंची शिक्षा ग्रहण करे और परिवार की परंपरा को आगे बढ़ाए। इसके लिए उन्होंने नेहरु को विलायत भेजा। लेकिन देश की आजादी को लेकर उनके अंदर जो आग पैदा हुई वह इंग्लैंड के वायुमंडल में बुझी नहीं। बल्कि और अधिक प्रज्जवलित हुई। वहां पढ़ते हुए उन्होंने उन देशों के इतिहास को पढ़ा जो अपनी पराधीनता की बेड़ियों को काटकर स्वतंत्र हो गए थे। बैरिस्टरी की परीक्षा उत्तीर्ण करके 1912 में जब वह स्वदेश लौटे तो वकालत शुरु की। लेकिन उनका मन वकालत के बजाए गुलामी की जंजीरों में जकड़ी भारत माता को मुक्त कराने के लिए छटपटाने लगा। देश को आजाद कराने के लिए उनका झुकाव राजनीति की ओर हो गया।

1915 में उन्होंने एक सार्वजनिक सभा में भाषण दिया। यह सभा इलाहाबाद में प्रेस का मुंह बंद करने के खिलाफ आयोजित की गयी थी। पं. नेहरु ने अपने इस भाषण से जता दिया कि उनके दिल में स्वतंत्रता प्राप्त करने की कितनी उत्कट आकांक्षा छिपी हुई है। गांधी जी से उनकी मुलाकात 1916 में लखनऊ कांग्रेस के अधिवेशन के दौरान हुई। कांग्रेस पार्टी के प्रति उनकी अनुरक्ति 1919 में प्रथम विश्वयुद्ध के उपरांत हुआ। जालियावाला बाग हत्याकांड की जांच में वे देशबंधु चितरंजन दास और महात्मा गांधी के सहयोगी रहे।

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1921 में जब कांग्रेस के कुछ नेताओं को कुछ प्रांतों में गैर कानूनी घोषित किया गया तो वे पहली बार जेल गये। जेल से छुटने के बाद वे कांग्रेस की गतिविधियों में सक्रिय हो गए। 1924 में कांग्रेस के महामंत्री बने। 1929 में जब उन्होंने कांग्रेस अध्यक्ष का पद ग्रहण किया तो रावी के तट पर प्रस्ताव पारित किया जो भारतीय इतिहास की एक महत्वपूर्ण घटना साबित हुई। उन्होंने कहा कि ‘‘हम भारत के प्रजाजन अन्य राष्ट्रों की भांति अपना जन्मसिद्ध अधिकार मानते हैं कि हम स्वतंत्र होकर ही रहें, अपने परिश्रम का फल स्वयं भोगें, हमें जीवन निर्वाह के लिए आवश्यक सुविधाएं प्राप्त हो, जिसमें हमें भी विकास का पूरा अवसर मिले।‘‘

15 अगस्त, 1947 को देश आजाद हुआ और वे देश के प्रधानमंत्री बने। लेकिन उनके मन को चैन नहीं था। वे आजादी को सिर्फ लड़ाई का एक पड़ाव ही मानें, आखिरी मंजिल तक पहुंचना तो बाकी था। वह देश को उस मुकाम पर खड़ा देखना चाहते थे जहां हर भारतवासी सुखी और समृद्धि से सराबोर हो। उन्होंने प्रधानमंत्री का पद सिर्फ इसलिए स्वीकार किया कि उन्हें भारतवासियों का सपना पूरा करना था।

आजादी मिलने के तुरंत बाद ही उन्होंने देश में पहली एशियाई कांफ्रेंस बुलाई और उसमें साफ-साफ कहा कि ‘‘हमारा मकसद है कि दुनिया में अमन और तरक्की हो, लेकिन यह तभी हो सकता है जब सब मुल्क आजाद हों और इंसानों की सब जगह सुरक्षा हो और आगे बढ़ने का मौका मिले।‘‘ नेहरु के विश्वव्यापी विचारों से अफ्रीका में आजादी की लहर दौड़ने लगी। उनकी प्रेरणा से कांगों, कीनिया, नाइजीरिया, ट्यूनीसिया, घाना, लीबिया, सूडान और मोरक्को इत्यादि देश स्वतंत्र हुए।

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पं. नेहरु स्वतंत्रता, लोकतंत्र और मानव अधिकारों के प्रबल पक्षधर थे। जब 1936 में मुसोलिनी और 1938 में हिटलर ने उन्हें बुलाया तो वे मिलने से साफ इंकार कर दिया। लोकतंत्र के पक्के समर्थक पं. नेहरु लोकतंत्र विरोधी किसी भी तानाशाह से मिलना गवारा नहीं समझे। पंडित नेहरु जब इंग्लैंड गए तो उनकी मुलाकात ब्रिटेन के पूर्व प्रधानमंत्री चर्चिल से हुई। पिछली बातों को याद करते हुए चर्चिल ने उनसे पूछा कि आपने अंग्रेजों के शासन में कितने वर्ष जेल में बिताए। नेहरु का जवाब था कि 10 वर्ष। चर्चिल ने पुनः सवाल किया कि तब तो अपने साथ किए गए व्यवहार के प्रति आपको हमसे घृणा करनी चाहिए। पंडित नेहरु ने तपाक से उत्तर देते हुए कहा कि बात ऐसी नहीं है। हमने ऐसे नेता के नेतृत्व में काम किया है जिसने हमें दो बातें सिखायी। एक, किसी से डरो मत और दूसरी किसी से घृणा मत करो। हम उस समय आपसे नहीं डरते थे इसलिए अब घृणा भी नहीं करते। नेहरु का जवाब सुनकर चर्चिल दंग रह गए।

नेहरु का समूचा जीवन मानवता की सेवा की अविस्मरणीय कहानी है। उनके लिए परिवार, समाज अथवा देश की सीमाएं महत्व नहीं रखती थी। अपने बचपन के दिनों की याद करते हुए उन्होंने अपनी आत्मकथा में लिखा है कि मेरा दिल राष्ट्रीय भावनाओं से भरा रहता था। मैं यूरोप के पंजे से एशिया और हिंदुस्तान को आजाद करने के भावों में डूबा रहता था। मैं बहादुरी के बड़े-बड़े मंसूबे बांधा करता था कि कैसे हाथ में तलवार लेकर हिंदुस्तान को आजाद करने के लिए लडूंगा।

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पंडित नेहरु के अंदर गजब का आत्मबल था। 1938 में जब स्पेन में गृहयुद्ध चल रहा था और बरसीलोना पर बमवर्षा हो रही थी तब भी वह स्पेन गये। 1939 में वह चीन गये जब वहां भयंकर बमबारी हो रही थी। 1954 में उन्होंने पंचशील और सहअस्तित्व का नारा बुलंद किया क्योंकि वे सारी दुनिया को प्रेम और भाईचारा के धागे में पिरोना चाहते थे।

1955 के बांडुंग सम्मेलन में भी उन्होंने पंचशील की भावना का आदर करने का सुझाव दिया। पंडित नेहरु ने भारत को तत्कालीन विश्व की दो महान शक्तियों का पिछलग्गू न बनाकर तटस्थता की नीति का पालन किया। उन्होंने निर्गूटता और पंचशील जैसे सिद्धांतों का पालन कर विश्व बंधुत्व एवं विश्वशांति को एक सूत्र दिया। मार्शल टिटो और अब्दुल गमाल नासिर के साथ मिलकर एशिया और अफ्रीका में उपनिवेशवाद के खात्मे के लिए एक गुटनिरपेक्ष आंदोलन की जमीन तैयार की। इसके अलावा उन्होंने कोरियाई युद्ध का अंत करने, स्वेज नहर विवाद सुलझाने और कांगो समझौते को मूर्तरुप देने जैसे अन्य अंतर्राष्ट्रीय समस्याओं के समाधान की दिशा में शानदार पहल की। पश्चिम जर्मनी, लाओस और आस्ट्रिया से जुड़े विवादित मुद्दों को हल करने की दिशा में भी वैश्विक शक्तियों के साथ खड़े रहे। उन्होंने भारत की आर्थिक समृद्धि के लिए पंचवर्षीय योजनाएं बनायी। वे अच्छी तरह जानते थे कि किसानों और कृषि को मजबूत किए बिना देश तरक्की की राह पर आगे नहीं बढ़ सकता।

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