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‘मेरा रंग जमघट’ में फौजिया ने दास्तानगोई से उठाए स्त्री जीवन के सवाल

‘मेरा रंग जमघट’ में फौजिया ने दास्तानगोई से उठाए स्त्री जीवन के सवाल
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नई पीढ़ी की आकांक्षाओं, अभिव्यक्ति की आजादी और सामाजिक बदलाव के सवालों के बीच स्त्री की आवाज और उसके संघर्षों ने भी प्रमुखता से जगह बनाई। नई दिल्ली के इंडिया इंटरनेशनल सेंटर में मेरा रंग फाउंडेशन के दसवें वार्षिकोत्सव ‘बदलाव की आहट : नई पीढ़ी, नए सवाल’ में राजनीति, पत्रकारिता और कला से जुड़े वक्ताओं ने युवाओं की भूमिका, महिलाओं के सामने चुनौतियों और प्रतिरोध के नए रूपों पर विचार रखे।


ओ अच्छी लड़कियों / तुम थक नहीं गई क्या अच्छे होने की सलीब ढोते ढोते / सुनो, उतार दो अपने सर से अच्छे होने का बोझ / लहराओ न आसमान तक अपना आँचल / हँसो इतनी तेज़ कि धरती का कोना कोना / उस हँसी में भीग जाये। कवियित्री प्रतिभा कटियार की इन पंक्तियों के साथ फौजिया ने कई स्त्री पक्षीय कविताओं को दास्तानगोई के दौरान पेश की। उन्होंने स्त्री के अनुभवों, संघर्षों और सामाजिक विडंबनाओं को कविता और दास्तानगोई के जरिए सामने रखते हुए मेरा रंग फाउंडेशन के दसवें वार्षिकोत्सव में अपनी विशेष प्रस्तुति दी। नईदिल्‍ली के इंडिया इंटरनेशनल सेंटर में आयोजित कार्यक्रम ‘बदलाव की आहट : नई पीढ़ी, नए सवाल’ की अंतिम प्रस्तुति में फौजिया ने कई स्त्रीवादी कविताओं का पाठ किया। उन्होंने इन कविताओं के माध्यम से स्त्रियों की सामाजिक स्थिति, उनके सामने मौजूद बंदिशों और अपनी बात कहने की कोशिशों का उल्लेख किया।

फौजिया ने नई पीढ़ी, अभिव्यक्ति और सामाजिक बदलाव की बहस को स्त्री के अनुभव और उसकी आवाज के सवाल को कविताओं के माध्यम से जोड़ते हुए कार्यक्रम का समापन किया।

फौजिया के दास्तानगो बनने के पीछे संघर्षभरी कहानी है। उन्हें महिला होने के नाते काफी विरोध झेलना पड़ा। यह जगजाहिर है कि पुरुषों के एकाधिकार में जब किसी महिला का दखल होता है, तो विरोध होना लाजिमी है। भारत की पहली महिला दास्तानगो फौजिया के साथ भी यही हुआ। फौजिया ने अपने दास्तानगोई के शौक को जब प्रोफेशन में बदला तो कई लोगों को यह बात हजम नहीं हुई। लेकिन इरादों की पक्की फौजिया ने हार नहीं मानी। उन्होंने अपने अंदाज में दास्तानगोई शुरू की

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फौजिया को सबसे ज्यादा विरोध तब झेलना पड़ा, जब मुस्लिम महिला होकर उन्होंने रामायण, महाभारत की गाथा सुनाना शुरू किया। कई लोगों को उनका ऐसा करना पसंद नहीं आया। लेकिन फौजिया का मानना है कि कला जाति-धर्म को नहीं मानती। वे अपनी कला के माध्यम से अपने अंदाज में सामाजिक मुद्दे उठाती आ रही हैं। महिला विषयों पर दास्तानगोई करती हैं। लोगों को उनका यह अंदाज पसंद आता है।

मेरा रंग उत्सव के पहले दौर में लोक गायिका और राजनीतिक सामाजिक व्यंग्य के लिए चर्चित नेहा सिंह राठौर सबसे अलग हट कर अपने विचार जाहिर कर एकाएक सभी का ध्यान अपनी ओर खींचने में कामयाब रही।

नेहा ने जेन-ज़ी की प्रचलित छवि पर सवाल उठाते हुए कहा कि नई पीढ़ी का अर्थ केवल वह युवा नहीं है जो ढीले-ढाले कपड़े पहनता है, संगीत सुनता है और बहुत ‘कूल’ दिखाई देता है। उन्होंने कहा कि इस परिभाषा में उन युवाओं को भी शामिल किया जाना चाहिए जो छोटे शहरों और कस्बों से आते हैं और अपनी आजीविका के लिए अलग-अलग तरह के काम करते हुए संघर्ष कर रहे हैं।

 कार्यक्रम में राजनीति, पत्रकारिता, डिजिटल मीडिया और सामाजिक-सांस्कृतिक क्षेत्र से जुड़े वक्ताओं ने इस सवाल पर चर्चा की कि नई पीढ़ी भारतीय समाज, राजनीति और मीडिया को किस तरह देख रही है और आने वाले समय में उसकी भूमिका क्या हो सकती है।

चर्चा में न्यूज़लॉन्ड्री हिंदी के मैनेजिंग एडिटर और वरिष्ठ पत्रकार अतुल चौरसिया, स्वतंत्र पत्रकार और यूट्यूबर श्याम मीरा सिंह,  समाजवादी पार्टी की राष्ट्रीय प्रवक्ता नेहा यादव, राष्ट्रीय जनता दल की राष्ट्रीय प्रवक्ता प्रियंका भारती और कांग्रेस के राष्ट्रीय सचिव शाहनवाज़ आलम शामिल हुए।

कार्यक्रम का संचालन वरिष्ठ पत्रकार अतुल चौरसिया ने किया। बातचीत की शुरुआत करते हुए उन्होंने सवाल उठाया कि नई पीढ़ी राजनीति, मीडिया, समाज और रचनात्मक दुनिया में किस तरह बदलाव ला रही है और इन बदलावों से भविष्य की क्या दिशा बन रही है। राजनीतिक दलों से जुड़े युवा वक्ताओं से उन्होंने यह सवाल भी किया कि आखिर क्या वजह है कि राजनीतिक पार्टियां बड़ी संख्या में युवाओं को अपने साथ जोड़ पाने में मुश्किल महसूस कर रही हैं।

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चर्चा में भाग ले रही समाजवादी पार्टी की राष्ट्रीय प्रवक्ता नेहा यादव ने सार्वजनिक जीवन में सक्रिय महिलाओं के सामने आने वाली चुनौतियों का जिक्र करते हुए कहा कि महिलाओं को चुप कराने का सबसे आसान तरीका उनके चरित्र पर सवाल खड़ा करना बना दिया गया है। राजनीतिक और सार्वजनिक जीवन में सक्रिय महिलाओं को असहमति या वैचारिक आलोचना से अधिक कई बार व्यक्तिगत और चरित्र से जुड़े हमलों का सामना करना पड़ता है।

लोक गायिका नेहासिंह राठौर ने भी इस बात से सहमति जताते हुए कहा कि हमारे समाज की संरचना ऐसी है कि वह मुखर स्त्री को आसानी से स्वीकार नहीं करती। उन्होंने स्त्रियों की स्वतंत्र अभिव्यक्ति और सत्ता तथा समाज से सवाल पूछने के रास्ते में आने वाली चुनौतियों पर अपनी बात रखी।

आरजेडी की राष्ट्रीय प्रवक्ता प्रियंका भारती ने सोशल मीडिया और राजनीतिक जीवन में मिलने वाली ट्रोलिंग और अपशब्दों पर खुलकर बात की। उन्होंने कहा, “अगर आपको गालियां पड़ रही हैं, इसका मतलब है कि आप सही कर रहे हैं। जिस दिन गालियां पड़नी बंद हो जाएंगी, हम समझेंगे कि शायद हमारी धार कमजोर पड़ रही है।”

उन्होंने कहा कि उनके लिए अपमानजनक संबोधनों से डरने के बजाय उन्हें अपने ढंग से परिभाषित करना प्रतिरोध का एक तरीका है। प्रियंका ने कहा कि अगर उन्हें ‘शूर्पणखा’ कहा जाता है तो वे उसे ऐसी साहसी स्त्री के प्रतीक के रूप में देखती हैं जो अपनी इच्छाओं और सेक्सुअलिटी को स्वीकार करती है। इसी तरह अगर बाबा साहेब भीमराव आंबेडकर के नाम को जोड़कर उन्हें अपशब्द कहे जाते हैं तो वे आंबेडकर की वैचारिक विरासत को गर्व के साथ स्वीकार करती हैं।

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स्वतंत्र पत्रकार और यूट्यूबर श्याम मीरा सिंह ने कहा कि आज का युवा अपनी अभिव्यक्ति के लिए अपना स्पेस तलाश रहा है और आंदोलनों को भी इसके एक महत्वपूर्ण हिस्से के रूप में देखा जाना चाहिए। चर्चा में डिजिटल माध्यमों के उभार, परंपरागत मीडिया से अलग स्वतंत्र अभिव्यक्ति के नए मंचों और युवा पीढ़ी के सामाजिक-राजनीतिक सवालों पर भी बातचीत हुई।

कांग्रेस के राष्ट्रीय सचिव शाहनवाज़ आलम ने राजनीति और युवा भागीदारी से जुड़े सवालों पर अपनी बात रखी। पत्रकारिता और लेखन की पृष्ठभूमि से सक्रिय राजनीति में आए आलम ने लोकतंत्र, प्रतिनिधित्व और राजनीतिक दलों में नई पीढ़ी की भूमिका के संदर्भ में चर्चा में हिस्सा लिया।

कार्यक्रम की शुरुआत में मेरा रंग फाउंडेशन की संस्थापक एवं मैनेजिंग ट्रस्टी शालिनी श्रीनेत ने संस्था के दस वर्षों के सफर को याद किया। उन्होंने बताया कि मेरा रंग की शुरुआत 2016 में सोशल मीडिया पर एक छोटे से प्रयास के रूप में हुई थी, जिसका उद्देश्य खास तौर पर महिलाओं और नई पीढ़ी को अपनी बात रखने के लिए एक मंच उपलब्ध कराना था। बीते दस वर्षों में संस्था ने महिला अधिकार, घरेलू हिंसा, लैंगिक समानता, मीडिया, साहित्य, राजनीति और सामाजिक सरोकारों से जुड़े विषयों पर संवाद और जागरूकता के कार्यक्रम किए हैं।

मुख्य संवाद से पहले ‘द त्रिपाठी सिस्टर्स’ – आयुषी त्रिपाठी और टियारा त्रिपाठी ने स्त्री शक्ति पर केंद्रित एक संक्षिप्त ओडिसी नृत्य प्रस्तुति दी। शास्त्रीय नृत्य से लंबे समय से जुड़ी दोनों कलाकारों की प्रस्तुति ने कार्यक्रम के मूल विषय को कला और नृत्य की अभिव्यक्ति से जोड़ा।

इस अवसर पर महिला अधिकारों और जेंडर जस्टिस के क्षेत्र में सक्रिय अधिवक्ता और सामाजिक कार्यकर्ता ज्योति गोयल को ‘रंग साहस’ सम्मान प्रदान किया गया। ज्योति गोयल लंबे समय से घरेलू हिंसा, महिला अधिकार, कानूनी जागरूकता और लैंगिक न्याय से जुड़े मुद्दों पर काम करती रही हैं। उन्हें यह सम्मान हिंदी के कवि-कथाकार अरुण आदित्य ने प्रदान किया।

लेखक का परिचय

प्रसून लतांत

प्रसून लतांत वरिष्ठ पत्रकार हैं। पिछले तीन दशक से देश के विभिन्न हिस्सों में रचनात्मक कार्यों के जरिये ग्रामीण और शहरी क्षेत्र के लोगों के बीच सक्रिय हैं। गांधावादी संस्थाओं से निकट जुडाव होने से वे विभिन्न संस्थाओं और आंदोलनों की गतिविधियों में लगातार जुड़े हैं।

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