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जयप्रकाश नारायण का बिगुल और अधूरा रह गया सम्पूर्ण क्रांति का सपना

जयप्रकाश नारायण का बिगुल और अधूरा रह गया सम्पूर्ण क्रांति का सपना

11 अक्‍टूबर : जयप्रकाश नारायण जयंती

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जयप्रकाश नारायण की संपूर्ण क्रांति का सपना केवल सत्ता परिवर्तन नहीं, बल्कि राजनीति में नैतिकता, सामाजिक न्याय और लोकतंत्र में जनभागीदारी सुनिश्चित करना था। उनकी जयंती पर यह सवाल प्रासंगिक है कि क्या आज का लोकतंत्र जनता को वास्तविक शक्ति दे पा रहा है? जेपी की विरासत इसी आत्ममंथन की मांग करती है।


“जयप्रकाश का बिगुल बजा तो जाग उठी तरुणाई है, तिलक लगाने तुम्हें जवानों, क्रांति द्वार पर आई है।”

ये पंक्तियाँ केवल किसी आंदोलन का गीत नहीं थीं। वे उस दौर की बेचैनी की आवाज थीं, जब आजादी के बाद की पीढ़ी के सामने यह सवाल खड़ा हो रहा था कि लोकतंत्र का अर्थ आखिर क्या है? क्या लोकतंत्र केवल चुनाव जीतने और सरकार बनाने का नाम है, या ऐसी व्यवस्था भी है जिसमें भ्रष्टाचार के खिलाफ आवाज उठाई जा सके, सत्ता से सवाल पूछा जा सके और आम नागरिक अपने भविष्य का फैसला करने में भागीदार हो?

जयप्रकाश नारायण का नाम इसी सवाल के साथ जुड़ता है। उनकी जन्‍मतिथि केवल एक महान नेता को याद करने का अवसर नहीं है। यह लोकतंत्र को आईना दिखाने का दिन भी है। यह पूछने का दिन है कि जिस सम्पूर्ण क्रांति का बिगुल जेपी ने बजाया था, उसके कितने स्वर आज हमारे सार्वजनिक जीवन में बचे हैं?

जेपी की पूरी राजनीतिक यात्रा सत्ता पाने की यात्रा नहीं थी। स्वतंत्रता आंदोलन में उन्होंने अंग्रेजी शासन के खिलाफ संघर्ष किया, जेल गए और भूमिगत आंदोलन में सक्रिय रहे। लेकिन आजादी के बाद उन्होंने राजनीति को सत्ता हासिल करने का माध्यम भर नहीं माना। समाजवाद से गांधी तक और गांधी से लोकशक्ति तक उनकी यात्रा उन्हें धीरे-धीरे सत्ता के केंद्र से समाज के केंद्र की ओर ले गई।

विनोबा भावे के भूदान आंदोलन से जुड़कर उन्होंने समझा कि समाज में परिवर्तन केवल कानून और सरकार के जरिए नहीं आता। जमीन, संसाधन, सामाजिक संबंध और मनुष्य की चेतना में बदलाव भी जरूरी है। यही विचार आगे चलकर सम्पूर्ण क्रांति की व्यापक अवधारणा में दिखाई दिया।

सत्तर का दशक आते-आते देश में महंगाई, बेरोजगारी, भ्रष्टाचार और शासन की अक्षमता के खिलाफ असंतोष बढ़ रहा था। बिहार के छात्र आंदोलन ने जेपी से नेतृत्व संभालने का आग्रह किया। उम्र और स्वास्थ्य दोनों सक्रिय राजनीति की सामान्य कसौटियों के अनुकूल नहीं थे, लेकिन उन्होंने युवाओं की पुकार सुनी। एक बुजुर्ग समाजवादी और गांधीवादी विचारक फिर से तरुणाई के बीच खड़ा हुआ।

यहीं से सम्पूर्ण क्रांति का बिगुल बजा।लेकिन सम्पूर्ण क्रांति का अर्थ सरकार बदलना भर नहीं था। जेपी राजनीतिक क्रांति के साथ सामाजिक, आर्थिक, शैक्षणिक, सांस्कृतिक और नैतिक परिवर्तन की बात कर रहे थे। वे ऐसी राजनीति चाहते थे जिसमें नागरिक केवल पांच साल में एक बार मतदान करने वाला व्यक्ति न हो, बल्कि रोजमर्रा के शासन में अपनी आवाज रखने वाला नागरिक हो।

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उनकी चिंता का केंद्र यही था कि अगर सत्ता बदल जाए लेकिन भ्रष्टाचार बना रहे, सरकार बदल जाए लेकिन प्रशासन जनता के प्रति जवाबदेह न बने, चुनाव होते रहें लेकिन सामाजिक और आर्थिक असमानता कायम रहे, तो इसे वास्तविक परिवर्तन कैसे कहा जाएगा?

यहीं जेपी का सबसे बड़ा सवाल आज भी हमारे सामने खड़ा होता है—क्या हमने सम्पूर्ण क्रांति को केवल सत्ता परिवर्तन तक सीमित कर दिया है?

जेपी लोकतंत्र को केवल चुनावी व्यवस्था नहीं मानते थे। चुनाव लोकतंत्र की अनिवार्य शर्त हैं, लेकिन लोकतंत्र का पूरा अर्थ नहीं। स्वतंत्र प्रेस, संस्थाओं की स्वायत्तता, नागरिक अधिकार, असहमति का सम्मान, सत्ता की जवाबदेही और जनता की सक्रिय भागीदारी लोकतंत्र की आत्मा हैं।

1975 के आपातकाल में जब नागरिक स्वतंत्रताएँ सीमित हुईं, प्रेस पर सेंसरशिप लगी और विपक्षी नेताओं को गिरफ्तार किया गया, तब जेपी ने लोकतांत्रिक अधिकारों की रक्षा के लिए आवाज उठाई। स्वास्थ्य कमजोर था, लेकिन लोकतंत्र के प्रति प्रतिबद्धता कमजोर नहीं हुई।

उनका संघर्ष हमें याद दिलाता है कि लोकतंत्र की असली परीक्षा तब होती है, जब सत्ता से असहमति पैदा होती है। सत्ता के पक्ष में बोलना आसान हो सकता है, लेकिन सत्ता से सवाल पूछने का अधिकार बचाए रखना लोकतंत्र की कठिन जिम्मेदारी है।

आपातकाल के बाद 1977 में सत्ता परिवर्तन हुआ। जनता ने पहली बार केंद्र में लंबे समय से शासन कर रही कांग्रेस को सत्ता से बाहर किया। लेकिन जनता पार्टी के भीतर के अंतर्विरोध और नेतृत्व संघर्ष ने यह भी दिखा दिया कि सत्ता परिवर्तन अपने आप में व्यवस्था परिवर्तन की गारंटी नहीं है।

जेपी व्यवस्था बदलना चाहते थे; राजनीति कई बार केवल सत्ता बदलने तक सीमित रह गई। यही सम्पूर्ण क्रांति की सबसे बड़ी अधूरी कहानी है।

जेपी का सपना विकेंद्रीकृत लोकतंत्र का था। वे ग्राम स्वराज की बात करते थे। चाहते थे कि निर्णय लेने की शक्ति नीचे तक पहुँचे। गाँव सरकारी योजनाओं के लाभार्थी भर न रहें, बल्कि अपने विकास की दिशा तय करने वाले नागरिक समुदाय बनें।

आज पंचायतों और स्थानीय संस्थाओं का विस्तार हुआ है, लेकिन सवाल बना हुआ है कि वास्तविक निर्णय लेने की शक्ति कितनी नीचे पहुँची है? क्या ग्रामसभा सचमुच गाँव के भविष्य पर निर्णायक प्रभाव डालती है? क्या गरीब, किसान, मजदूर, महिला और वंचित नागरिक स्थानीय सत्ता में बराबर की आवाज रखते हैं?

सम्पूर्ण क्रांति का एक महत्वपूर्ण पक्ष सामाजिक न्याय भी था। जेपी समझते थे कि राजनीतिक लोकतंत्र तब तक अधूरा रहेगा, जब तक सामाजिक और आर्थिक असमानता बनी रहेगी। संविधान ने नागरिकों को समान राजनीतिक अधिकार दिए, लेकिन अवसरों की असमानता आज भी लोकतंत्र की गहराई को चुनौती देती है।

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आर्थिक विकास के आंकड़े महत्वपूर्ण हैं, लेकिन उनके साथ यह देखना भी जरूरी है कि विकास का लाभ किस तक पहुँच रहा है। किसान की आय, मजदूर की मजदूरी, युवाओं का रोजगार, बच्चों की शिक्षा और गरीब की गरिमा भी विकास के पैमाने का हिस्सा होने चाहिए।

शिक्षा के बारे में भी जेपी का दृष्टिकोण व्यापक था। शिक्षा केवल डिग्री हासिल करने का साधन नहीं, बल्कि व्यक्ति को समाज के प्रति जिम्मेदार बनाने का माध्यम होनी चाहिए। आज जब शिक्षा रोजगार और बाजार की जरूरतों के बीच सीमित होती जा रही है, तब जेपी की यह सोच और महत्वपूर्ण हो जाती है।

यहीं पत्रकारिता की भूमिका भी सामने आती है। जेपी के दौर में पत्रकारिता के सामने सत्ता से सवाल पूछने की चुनौती थी। आज भी लोकतंत्र को ऐसी पत्रकारिता चाहिए जो न सत्ता की चापलूसी करे, न विपक्ष की अंधभक्ति। पत्रकार का पहला पक्ष नागरिक होना चाहिए।

इसीलिए जेपी की विरासत को किसी राजनीतिक दल की निजी संपत्ति नहीं बनाया जा सकता। वे समाजवादी थे, गांधीवादी थे, स्वतंत्रता सेनानी थे, लोकनायक थे; लेकिन इन पहचानों से ऊपर वे लोकतांत्रिक चेतना के प्रतिनिधि थे।

उनकी सबसे बड़ी देन शायद यही थी कि उन्होंने जनता को यह विश्वास दिलाया कि सत्ता अंतिम सत्य नहीं है। जनता उससे बड़ी है। सरकार जनता के लिए है और जनता को सरकार से सवाल पूछने का पूरा अधिकार है।

आज जब विपक्ष सड़कों पर उतरकर सरकार से सवाल पूछ रहा है और धरना-प्रदर्शन लोकतांत्रिक असहमति की जगह तलाश रहे हैं, तब जेपी का दौर बहुत दूर का इतिहास नहीं लगता। लेकिन विपक्ष का सड़क पर उतरना अपने आप में लोकतंत्र की सफलता का प्रमाण नहीं है। उसकी सार्थकता इस बात से तय होगी कि वह किन सवालों को लेकर जनता के बीच जाता है। क्या वह नागरिक अधिकारों और जनसरोकारों की आवाज बनता है? क्या सत्ता से जवाबदेही मांगते हुए अपने भीतर भी जवाबदेही स्वीकार करता है? क्या उसका संघर्ष केवल सरकार बदलने तक सीमित है या व्यवस्था को अधिक पारदर्शी, न्यायपूर्ण और सहभागी बनाने की कोई व्यापक दृष्टि भी उसके पास है?

जेपी की राजनीति का यही कठिन सबक था—सत्ता का विरोध करना पर्याप्त नहीं है। राजनीति को भी आत्मालोचना के लिए तैयार रहना चाहिए।

1974 की तरुणाई सरकार बदलने के लिए ही नहीं उठी थी। उसके भीतर व्यवस्था को अधिक जवाबदेह, समाज को अधिक न्यायपूर्ण और राजनीति को अधिक नैतिक बनाने की आकांक्षा थी। इसलिए आज अगर विपक्ष सड़क पर है तो जेपी की कसौटी पर उससे भी यही पूछा जाना चाहिए—क्या उसका आंदोलन सत्ता परिवर्तन से आगे व्यवस्था परिवर्तन का सपना देखता है?

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यही वह सवाल है, जहाँ सम्पूर्ण क्रांति का सपना आज भी अधूरा दिखाई देता है।

सम्पूर्ण क्रांति को आज बंदूक या हिंसा के अर्थ में नहीं, लोकतांत्रिक चेतना के विस्तार के रूप में समझने की जरूरत है। आज की सम्पूर्ण क्रांति का अर्थ हो सकता है—भ्रष्टाचार के विरुद्ध पारदर्शिता, सत्ता के केंद्रीकरण के विरुद्ध विकेंद्रीकरण, सामाजिक विभाजन के विरुद्ध बराबरी, भय के विरुद्ध नागरिक स्वतंत्रता, राजनीतिक निष्क्रियता के विरुद्ध जनभागीदारी और राजनीति में नैतिकता की पुनर्स्थापना।

इसलिए जेपी की पुण्यतिथि पर उन्हें श्रद्धांजलि केवल माल्यार्पण से नहीं होगी। श्रद्धांजलि तब होगी, जब कोई युवा भ्रष्टाचार के खिलाफ आवाज उठाएगा, कोई पत्रकार सत्ता से कठिन सवाल पूछेगा, कोई किसान अपने अधिकार के लिए संगठित होगा, कोई मजदूर सम्मान की मांग करेगा और कोई नागरिक अन्याय के सामने चुप रहने से इनकार करेगा।

कविता की पंक्तियाँ फिर याद आती हैं—

“आओ कृषक, श्रमिक, नागरिको, इंकलाब का नारा दो, कविजन, शिक्षक, बुद्धिजीवियो, अनुभव भरा सहारा दो।”

यह आह्वान आज भी उतना ही जरूरी है। क्योंकि सम्पूर्ण क्रांति कोई एक दिन में पूरी होने वाली घटना नहीं थी। वह समाज को लगातार बदलने की प्रक्रिया थी। सत्ता बदल सकती है, सरकारें बदल सकती हैं, राजनीतिक गठबंधन बदल सकते हैं, पीढ़ियाँ बदल सकती हैं; लेकिन समाज को अधिक न्यायपूर्ण, राजनीति को अधिक नैतिक और लोकतंत्र को अधिक सहभागी बनाने की जरूरत कभी खत्म नहीं होती।

जेपी की मशाल किसी स्मारक में रखने के लिए नहीं थी। वह अंधेरे में रास्ता दिखाने के लिए थी।

इसलिए जेपी की जन्‍मतिथि पर उन्हें याद करना इतिहास की ओर लौटना नहीं, वर्तमान से सवाल करना है। लोकतंत्र में जनता की जगह कहाँ है? सत्ता कितनी जवाबदेह है? विपक्ष कितना जिम्मेदार है? पत्रकारिता कितनी स्वतंत्र है? गाँव का नागरिक अपने फैसलों में कितना सहभागी है? और वह सम्पूर्ण क्रांति, जिसका बिगुल बिहार की धरती से बजा था, आखिर किस मोड़ पर अधूरा रह गया?

इन सवालों के जवाब किसी एक दल, सरकार या नेता के पास नहीं हैं। इनका जवाब समाज को मिलकर तलाशना होगा।

जयप्रकाश का बिगुल किसी एक व्यक्ति की आवाज नहीं था। वह जनता को उसकी शक्ति का अहसास कराने वाली आवाज थी। उसकी सबसे बड़ी ताकत यही थी कि उसने सत्ता से पहले समाज को बदलने की बात की थी।

इसलिए जेपी को सच्ची श्रद्धांजलि माल्यार्पण नहीं, सवाल पूछने की हिम्मत है।

जब तक सवाल जीवित हैं, जेपी भी जीवित हैं। और जब तक लोकतंत्र को अंधेरे से बचाने की जरूरत है, उस मशाल की जरूरत भी बनी रहेगी।

लेखक का परिचय

कुमार कृष्णन

कुमार कृष्णन स्‍वतंत्र पत्रकार है।

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