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जेपी आंदोलन से पर्यावरण संघर्षों तक सक्रिय रहीं अनुराधा सिंह का निधन

जेपी आंदोलन से पर्यावरण संघर्षों तक सक्रिय रहीं अनुराधा सिंह का निधन

सादगी, समर्पण और प्रकृति से गहरे जुड़ाव की मिसाल थीं भोपाल, 19 अप्रैल। विख्यात सर्वोदय नेता, विचारक और चिंतक आचार्य राममूर्ति जी की पुत्री, पर्यावरण शिक्षण और सजीव खेती से जुड़ी अनुराधा सिंह ( 80 वर्ष) का आज सुबह निधन...

सादगी, समर्पण और प्रकृति से गहरे जुड़ाव की मिसाल थीं

भोपाल, 19 अप्रैल। विख्यात सर्वोदय नेता, विचारक और चिंतक आचार्य राममूर्ति जी की पुत्री, पर्यावरण शिक्षण और सजीव खेती से जुड़ी अनुराधा सिंह ( 80 वर्ष) का आज सुबह निधन हो गया। उनके निधन से सर्वोदय आंदोलन और सामाजिक-पर्यावरणीय संघर्षों से जुड़ी एक महत्वपूर्ण कड़ी टूट गई है। पिछले लगभग डेढ़ दशक से वे भोपाल में अपने पुत्र अमन के साथ रह रही थीं, जहाँ भी उनका जुड़ाव सामाजिक और वैचारिक गतिविधियों से बना रहा।

अनुराधा सिंह, आचार्य राममूर्ति की पुत्री होने के साथ-साथ स्वयं भी एक सजग और प्रतिबद्ध सामाजिक कार्यकर्ता थीं। वे श्यामबहादुर नम्र, जो सर्वोदय, पर्यावरण और सजीव खेती के क्षेत्र में चर्चित नाम रहे, की सहधर्मिणी थीं। परिवार में सामाजिक और बौद्धिक परंपरा को आगे बढ़ाते हुए उनके पुत्र अनुराग सिंह डाक्यूमेंट्री फिल्म निर्माण से जुड़े हैं, जबकि अमन नम्र पत्रकारिता के क्षेत्र में सक्रिय हैं।

जेपी आंदोलन से लेकर पर्यावरण संघर्षों तक सक्रिय भूमिका

अनुराधा सिंह की उपस्थिति से जेपी आंदोलन के दौर से लेकर 1990 के दशक तक के रचनात्मक और जनआंदोलनों की स्मृतियां जीवंत हो उठती थीं। जल, जंगल और बड़े बांधों के विरोध में चलने वाले आंदोलनों में उनकी सक्रियता और संवेदनशील भागीदारी रही।

उनका जीवन उस पीढ़ी का प्रतिनिधित्व करता था जिसने विकास, पर्यावरण और समाज के सवालों को गहराई से समझते हुए जनपक्षधर दृष्टि के साथ काम किया।

श्रम निकेतन संस्थान, जमुड़ी (अनूपपुर) की स्थापना जब स्वर्गीय श्यामबहादुर नम्र जी ने दशकों पहले की थी, तब वहाँ घने जंगलों के अलावा कुछ भी नहीं था। ऐसी जगह, जहाँ न सड़क थी, न बिजली, न पानी और न ही चिकित्सा जैसी बुनियादी सुविधाएँ—वहाँ दो छोटे बच्चों के साथ जाकर बसना किसी भी सामान्य व्यक्ति के लिए कठिन निर्णय होता।

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लेकिन यह कोई मजबूरी नहीं थी। अनुराधा सिंह एक सशक्त और स्वतंत्र व्यक्तित्व की धनी थीं। उन्होंने यह जीवन अपने पति और उनके विचारों के प्रति गहरे विश्वास, परिवार के प्रति अटूट स्नेह और प्रकृति के प्रति अपने आगाध प्रेम के कारण चुना।

जमुड़ी में संघर्ष और सृजन का जीवन

जमुड़ी में उन्होंने नम्र जी के साथ मिलकर न केवल जीवन बिताया, बल्कि सामाजिक परिवर्तन के कार्यों में सक्रिय भूमिका निभाई। उनके सान्निध्य में सम्पूर्ण साक्षरता मिशन, ‘अपना स्कूल’ और पंचायत प्रशिक्षण जैसे महत्वपूर्ण कार्य संचालित हुए, जिनका क्षेत्रीय समाज पर गहरा प्रभाव पड़ा।

सादगी और संतुलन का अद्भुत व्यक्तित्व

पिछले 35 वर्षों के अनुभवों को साझा करते हुए सहयोगियों का कहना है कि उन्होंने अनुराधा सिंह को कभी गुस्से में, चिड़चिड़ाते या किसी की निंदा करते नहीं देखा। उनका स्वभाव अत्यंत शांत, संतुलित और सहज था।

वे एक साथ कई भूमिकाओं में आदर्श थीं—मां, बेटी, पत्नी, बहन, मित्र और राष्ट्रसेविका। उनके जीवन में सादगी केवल व्यवहार में नहीं, बल्कि विचारों और आचरण में भी स्पष्ट झलकती थी।

एक पीढ़ी का अवसान, एक सेतु का टूटना

उनके निधन के बाद सहयोगियों और करीबियों के बीच यह भावना गहराई से व्यक्त हो रही है कि उनके साथ समाजसेवा, प्राकृतिक खेती, संस्कारों और परंपराओं का एक महत्वपूर्ण अध्याय जैसे समाप्त हो गया है। उनके होने से न केवल एक आंदोलनकारी दौर जीवित महसूस होता था, बल्कि स्व. श्यामबहादुर नम्र की उपस्थिति भी जैसे उनके माध्यम से बनी रहती थी। उनके जाने के साथ ही वह पीढ़ी, जो नई और पुरानी पीढ़ियों के बीच एक सेतु का काम करती थी, धीरे-धीरे विदा होती दिख रही है।

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उनका जीवन आने वाली पीढ़ियों के लिए एक प्रेरणा और मानक के रूप में याद किया जाएगा। अनुराधा सिंह के निधन से सर्वोदय आंदोलन और पर्यावरणीय सरोकारों से जुड़े क्षेत्र में गहरी क्षति हुई है। उनके विचार, जीवन दृष्टि और कार्य लंबे समय तक लोगों को प्रेरित करते रहेंगे।

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