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गांधी को किसी विचार के खांचे में बांधना उनके व्यापक चिंतन को छोटा करना है: अनिल त्रिवेदी

गांधी को किसी विचार के खांचे में बांधना उनके व्यापक चिंतन को छोटा करना है: अनिल त्रिवेदी

गांधी सत्य, अहिंसा, सादगी, शांति और सद्भाव के साथ मनुष्य को मनुष्य से जोड़ने वाली चेतना हैं

इंदौर, 27 सितंबर । ‘’गांधी को केवल एक व्यक्ति, विचारधारा या किसी एक राजनीतिक खांचे में रखकर नहीं समझा जा सकता। गांधी सत्य, अहिंसा, सादगी, शांति, सद्भाव और मनुष्य को मनुष्य से जोड़ने वाली उस चेतना का नाम हैं, जो जीवन के हर क्षेत्र को प्रभावित करती है। गांधी इस देश के ताने-बाने की तरह हैं। उन्होंने अलग-अलग और बिखरे हुए रेशों को एक सूत्र में पिरोकर मनुष्यों को एक-दूसरे से जोड़ने का काम किया।‘’

यह बात प्रसिद्ध गांधीवादी चिंतक, सामाजिक कार्यकर्ता एवं अभिभाषक अनिल त्रिवेदी ने सेवा सुरभि द्वारा गांधी जयंती के निमित्त आयोजित व्याख्यान ‘गांधी नहीं तो भारत नहीं’  में कही। उन्होंने कहा कि गांधी को समझने के लिए केवल उनके बारे में बहस करना पर्याप्त नहीं है, बल्कि यह देखना जरूरी है कि गांधी हमारे अपने जीवन में कहां मौजूद हैं। गांधी का अर्थ सत्य है, अहिंसा है, सादगी है, शांति है, सद्भाव और मेल-जोल है।

कार्यक्रम की शुरुआत दीप प्रज्वलन से हुई। दीप प्रज्वलन वीरेंद्र गोयल, संस्कृति मंत्रालय से जुड़े भरत शर्मा, अभ्यास मंडल के अध्यक्ष रामेश्वर गुप्ता सहित अन्य व्‍यक्तियों ने किया। इसके बाद प्रख्यात गायिका माधवी चांदोलीकर के शिष्यवृंदों ने 7-8 गांधी भजनों की प्रस्तुति दी। भक्ति संगीत के कलाकारों का स्वागत गोविंद मंगल, कमल कलवानी, मोहित सेठ, श्रीमती कारिया, रवि गुप्ता, भारती मंडोले ने किया।

इस अवसर पर अनिल त्रिवेदी के जीवन के 75 वर्ष पूर्ण होने पर सेवा सुरभि ने अभिनंदन भी किया गया। श्री त्रिवेदी को सम्‍मान में दुपट्टा और प्रशस्ति पत्र भेंट किया। पद्मश्री भालू मोढ़े, अशोक बड़जात्या, सेवा सुरभि के ओम नरेडा और कुमार सिद्धार्थ ने उन्हें सम्मान पत्र भेंट किया। सम्‍मान पत्र का वाचन संजय पटेल ने किया।

19 वर्ष की उम्र में इंग्लैंड गए गांधी

त्रिवेदी ने गांधी के जीवन की शुरुआत उनके किशोर और युवा जीवन के संदर्भ से की। उन्होंने कहा कि 19 वर्ष की उम्र में मोहनदास करमचंद गांधी उस समय के हिंदुस्तान से जहाज में बैठकर बैरिस्टर बनने के लिए इंग्लैंड गए। उस समय समुद्र पार जाकर पढ़ने की कल्पना भी सामान्य नहीं थी और समाज तथा परिवार की ओर से अनेक तरह के नियंत्रण थे। इसके बावजूद गांधी इंग्लैंड गए, पढ़े और बैरिस्टर बने।

उन्होंने कहा कि गांधी केवल बैरिस्टर बनने तक सीमित नहीं रहे। उनके भीतर भी अपने समय के युवाओं जैसी बेचैनी और हलचल थी। वे वेजिटेरियन सोसाइटी से जुड़े और लगातार अपने जीवन तथा विचारों के प्रयोग करते रहे।

दक्षिण अफ्रीका में हुआ ‘महात्मा गांधी’ का जन्म

त्रिवेदी ने कहा कि गांधी दक्षिण अफ्रीका किसी महान राजनीतिक उद्देश्य से नहीं, बल्कि आजीविका के लिए एक मुकदमा लड़ने गए थे। वहां उन्होंने देखा कि चमड़ी के रंग के आधार पर मनुष्य के साथ भेदभाव किया जा रहा है।

उन्होंने कहा कि गांधी का जन्म भले ही 2 अक्टूबर 1869 को पोरबंदर में हुआ हो, लेकिन महात्मा गांधी का जन्म उस समय हुआ जब दक्षिण अफ्रीका में बैरिस्टर एम.के. गांधी को फर्स्ट क्लास का टिकट होने के बावजूद रंग के आधार पर रेल से बाहर निकालकर प्लेटफॉर्म पर फेंक दिया गया।

त्रिवेदी के अनुसार इस घटना का अर्थ केवल यह नहीं था कि गांधी के साथ अन्याय हुआ। उस अपमान ने उनके भीतर यह भाव पैदा किया कि अपमान को स्वीकार नहीं करना है और अधिकार के लिए लड़ना है।

गांधी इस देश के ताने-बाने की तरह

त्रिवेदी ने कहा कि ‘सत्य के प्रयोग’ गांधी के जीवन का ताना-बाना है और गांधी स्वयं इस देश के ताने-बाने हैं। ताना-बाना उस प्रक्रिया का नाम है, जिसमें अलग-अलग और बिखरे हुए रेशों को एक सूत्र में पिरोकर एक साथ बुना जाता है। कबीर का संदर्भ देते हुए उन्होंने कहा कि कबीर जुलाहे थे, गांधी जुलाहे नहीं थे, लेकिन गांधी ने मनुष्यों को एक-दूसरे में गूंथने और उनके बीच के भेद मिटाने का काम किया।

उन्होंने कहा कि गांधी केवल सत्य की बात नहीं करते। उन्होंने सत्य के साथ अहिंसा को जोड़ा। सत्य और अहिंसा को अलग-अलग करके गांधी को नहीं समझा जा सकता। सत्य और अहिंसा का यह मेल ही गांधी के विचार को समझने का आधार है।

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‘सत्य ही ईश्वर है’ को जीवन से जोड़ा

गांधी के विचारों में ईश्वर की अवधारणा पर बात करते हुए त्रिवेदी ने कहा कि ईश्वर है या नहीं, इसे लेकर मनुष्य के भीतर हमेशा से द्वंद्व रहा है। अलग-अलग संप्रदायों और दर्शनों ने ईश्वर के स्वरूप को अलग-अलग तरह से समझाया है। गांधी ने इस प्रश्न को अलग तरह से संबोधित करते हुए कहा ‘सत्य ही ईश्वर है।’ उन्होंने कहा कि इससे ईश्वर को समझने का रास्ता हमारे अपने आचरण से जुड़ जाता है। यदि जीवन में ईश्वर का सानिध्य पाना है तो सत्याग्रही बनना पड़ेगा।

उन्होंने कहा कि गांधी को लेकर बहस करने के बजाय यह देखना चाहिए कि गांधी हमारे अपने जीवन में कहां मौजूद हैं। गांधी का अर्थ सत्य है, गांधी का अर्थ अहिंसा है, गांधी का अर्थ सादगी है, गांधी का अर्थ शांति है और गांधी का अर्थ सद्भाव तथा मेल-जोल है।

यदि सत्य, अहिंसा, शांति और सद्भाव कमजोर पड़ते हैं तो हिंसा और टकराव का कारोबार बढ़ता है। गांधी इस ‘धंधे’ में नहीं पड़े। उन्होंने मनुष्य की जीवन-ऊर्जा और प्राकृतिक जीवन के बीच संबंध को समझने का प्रयास किया।

आजीविका को ही जीवन मान लेना सबसे बड़ी भूल

जीवन की उम्र और उपलब्धियों की गिनती पर टिप्पणी करते हुए त्रिवेदी ने एक उच्च न्यायालय के सेवानिवृत्त हो रहे न्यायाधीश का प्रसंग सुनाया। उन्होंने बताया कि विदाई के अवसर पर न्यायाधीश ने कहा कि सेवानिवृत्ति के बाद सब खत्म हो जाएगा। त्रिवेदी ने सवाल उठाया कि क्या हमारी जीवन की कल्पना इतनी सीमित हो गई है कि हमारी आजीविका ही हमारा जीवन बन गई है? आजीविका है तो हम प्रसन्न हैं और आजीविका नहीं है तो प्रसन्न नहीं हैं।

इसी संदर्भ में उन्होंने गांधी के चरखे और खादी के प्रयोग का उल्लेख किया। उन्होंने कहा कि खादी पहले से मौजूद थी, लेकिन मशीनों के आने के बाद पीछे चली गई थी। गांधी ने कताई और बुनाई को फिर से केंद्र में लाकर ऐसा साधन विकसित किया, जिसने देश की धारणा को बदलने का काम किया।

उनके अनुसार गांधी का संदेश था ‘कर्म ही जीवन है।’ दांडी सत्याग्रह इसका उदाहरण है। सवाल था कि क्या करना है? पैदल जाना है और नमक बनाना है। लेकिन नमक बनाने जैसी सामान्य क्रिया पर भी जब शासन का नियंत्रण हो, तब सत्याग्रह व्यवस्था के चरित्र पर प्रश्न खड़ा करता है।

मुस्कुराने के लिए भी सेंसरशिप!

त्रिवेदी ने कहा कि आज मनुष्य के व्यवहार में भी एक तरह की कृत्रिमता आ गई है। लोग एक-दूसरे को देखकर मुस्कुराने में भी संकोच करने लगे हैं। हम इतने कंजूस हो गए हैं कि मुस्कुराने के लिए भी जैसे सेंसरशिप की जरूरत पड़ने लगी है।

उन्होंने कहा कि यह बाहरी दुनिया नहीं, हमारा अपना मन करता है। गांधी के विचारों को समझने के लिए मनुष्य को अपने भीतर के इसी संसार को देखना होगा।

विचार को खांचों में बांटने से गांधी छोटे हो जाते हैं

त्रिवेदी ने कहा कि आज दुनिया में ऐसी मानसिकता बन गई है जिसमें लोग अपमान सह लेते हैं, लेकिन अधिकार की बात करने, विचार रखने या सवाल पूछने से डरते हैं।

उनके अनुसार विचार अनंत है, उसकी कोई सीमा नहीं है। लेकिन हम विचारों को छोटे-छोटे खांचों में बांट देते हैं और व्यक्ति को किसी एक पहचान से जोड़कर देखने लगते हैं—कोई गांधीवादी है, कोई लेफ्टिस्ट है, कोई मार्क्सिस्ट है, कोई राष्ट्रवादी है या किसी और विचार का समर्थक है।

उन्होंने कहा कि विचार के टुकड़े करके किसी एक विचार से चिपक जाना मनुष्य की दृष्टि को सीमित करता है। गांधी विचार से चिपके नहीं थे। इसी कारण उनका चिंतन व्यापक बना।

गालियां मिलती रहीं, गांधी चरखा चलाते रहे

गांधी से जुड़ा एक प्रसंग सुनाते हुए त्रिवेदी ने कहा कि गांधी को उनके जीवनकाल में भी गालियां दी गईं और आज भी दी जाती हैं। मनुष्य के भीतर घृणा भी है और प्रेम भी। सृजन की क्षमता भी है और विध्वंस की भी।

उन्होंने बताया कि इंग्लैंड जाते समय एक अंग्रेज गांधी से घृणा करता था और उनके सामने उन्हें लगातार गालियां देता था। गांधी अपना चरखा चलाते रहते थे। एक दिन उस व्यक्ति ने गांधी के लिए छह पन्नों में अपशब्द लिखकर उनके हाथ में दे दिए।

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गांधी ने कागजों को देखा। उन पन्नों को जोड़ने के लिए लगी ऑलपिन निकालकर अपने चरखे में रख ली, कागजों को मोड़कर नीचे रख दिया और फिर सूत कातने लगे। जब उस व्यक्ति ने पूछा कि इतना कुछ लिखने के बाद गांधी ने कोई प्रतिक्रिया क्यों नहीं दी, तो गांधी ने कहा कि जो उनके काम का था, उन्होंने ले लिया।

त्रिवेदी ने कहा कि गांधी को समझने में हमारी एक बड़ी दिक्कत यह है कि जो हमारे काम का नहीं है, उसे हम अपने सिर पर ले लेते हैं। उन्होंने गांधी के सार्वजनिक और रचनात्मक कार्यकर्ताओं के लिए दिए गए सूत्र का उल्लेख करते हुए कहा कि किसी भी रचनात्मक कार्यकर्ता को यह बोझ लेकर नहीं जीना चाहिए कि दुनिया की सारी क्रांतियां उसी के माध्यम से पूरी होंगी।

प्रार्थना, संगीत और मन को साधने की प्रक्रिया

गांधी आश्रम की भजनावली और प्रार्थना सभाओं का उल्लेख करते हुए त्रिवेदी ने कहा कि यह केवल संगीत या स्वर-लहरियों की प्रस्तुति नहीं थी। यह ध्वनि की ऊर्जा को समेटकर मनुष्य के जीवन को कृतार्थ करने का एक तरीका था।

उनके अनुसार गांधी ने भजनों के माध्यम से हिंदुस्तान के उदासीन मानस को स्वतंत्रता आंदोलन की चेतना से जोड़ने का काम किया। प्रार्थना सभा के माध्यम से लोगों को शांत रहना, तत्पर रहना, भयभीत हुए बिना सरलता से जीवन जीना और प्रकृति के साथ जुड़ना सीखने को मिला।

दुनिया में बंदूक ही नहीं बनती तो…

त्रिवेदी ने प्रसिद्ध लेखिका पर्ल बक से जुड़ा एक प्रसंग भी सुनाया। गांधी की हत्या की खबर जब यूरोप में उनके गांव तक पहुंची तो पर्ल बक के परिवार में भोजन के समय इस खबर पर चर्चा हुई। उसी परिवार के करीब 12 वर्षीय बच्चे ने कहा यदि इस दुनिया में बंदूक नहीं बनती तो कितना अच्छा होता।

त्रिवेदी ने कहा कि यह मनुष्य के विचार और समझ की ताकत का उदाहरण है। गांधी की मृत्यु की खबर ने एक छोटे बच्चे को भी यह सोचने के लिए प्रेरित किया कि यदि बंदूक ही नहीं होती तो गांधी की हत्या भी नहीं होती।

उन्होंने कहा कि आज दुनिया हिंसा की आदी होती जा रही है। हिंसा होने पर हम अक्सर चुप हो जाते हैं। जहां आग लगी हो, वहां अपनी वाणी और साहस से उसे बुझाने के बजाय हम हिंसा का जवाब हिंसा से देने लगते हैं।

सादगी हमारे बस की बात नहीं तो क्या फिजूलखर्ची विरासत है?

गांधी बैरिस्टर से फकीर कैसे बने, इस प्रश्न पर त्रिवेदी ने कहा कि हम आसानी से कह देते हैं कि गांधी की सादगी हमारे बस की बात नहीं है। लेकिन सवाल यह है कि यदि सादगी हमारे बस की नहीं है तो क्या फिजूलखर्ची और अमीरी हमारी विरासत है?

उन्होंने कहा कि प्रकृति ने मनुष्य को दो चीजें देकर भेजा है—तन और मन। दुनिया के बाकी जीव अपना जीवन इन्हीं के आधार पर जीते हैं। कोई चिड़िया अपने लिए 2BHK घर बुक नहीं करती और कोई जीव अपने जीवन का आधार अपने द्वारा बनाई गई भौतिक वस्तुओं को नहीं बनाता।

इसके विपरीत मनुष्य अपनी बनाई हुई वस्तुओं और साधनों को अपने जीवन का आधार बनाता गया है।

भागदौड़ को ही जीवन मान बैठे हैं

त्रिवेदी ने कहा कि आधुनिक मनुष्य इतनी आपाधापी में जी रहा है कि शांतिपूर्ण और सद्भावपूर्ण जीवन उसे सहज नहीं लगता। तेजी से भागना, लगातार साधनों का उपयोग करना और सुविधा के पीछे भागना जैसे जीवन का स्वाभाविक हिस्सा बन गया है।

हम जन्म से मृत्यु तक की यात्रा को आनंद, मंगल और सद्भाव के साथ जीने के बजाय लगातार भागदौड़ को जीवन मान बैठे हैं। ऐसे वातावरण में गांधी की सादगी और शांति असहज लगती है।

उन्होंने कहा कि गांधी मनुष्य को तन और मन दोनों के साथ जीवन जीने की बात करते हैं। मनुष्य की दृष्टि, विचार, सोच, अध्यात्म, दर्शन और तेजस्विता की ऊर्जा समाप्त नहीं होती। जिन ग्रंथों, ऋषियों, मुनियों और विचारों से मनुष्य को प्रेरणा मिलती है, उनका भौतिक अस्तित्व नहीं होता, लेकिन उनका दार्शनिक और आध्यात्मिक अस्तित्व बना रहता है। मनुष्य के भीतर आने वाले विचारों के संगम से ही दुनिया जीवित रहती है।

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‘भूख लगने पर खाना प्रकृति, बिना भूख खाना विकृति’

त्रिवेदी ने गांधी के भोजन संबंधी विचार का उल्लेख करते हुए कहा कि गांधी ने भोजन को लेकर कोई जटिल सिद्धांत नहीं दिया। उन्होंने केवल इतना कहा ‘भूख लगने पर खाना प्रकृति है और बिना भूख के खाना विकृति है।’

उन्होंने कहा कि यह प्रकृति और विकृति का सरल लेकिन गहरा भाष्य है। गांधी ने यह बात प्रकृति से सीखी थी। जंगल में कोई जीव भूख न लगने पर शिकार नहीं करता, लेकिन मनुष्य जरूरत न होने पर भी केवल इच्छा या आकर्षण के कारण चीजें खरीदता और खाता है। यही अंतर गांधी की जीवन-दृष्टि को समझने में मदद करता है।

वैश्वीकरण के बीच छूटती गई गांधी की सादगी

त्रिवेदी ने कहा कि वैश्वीकरण की पूरी सभ्यता के उपद्रव को हमने स्वीकार कर लिया और गांधी की सादगी तथा चैतन्यता को जीवन से विसर्जित कर दिया। यही आधुनिक समय का एक बड़ा विरोधाभास है।

उन्होंने कहा कि ‘मेरा और तेरा’ का भेद बढ़ता गया है। हिंदू-मुसलमान, अमीर-गरीब और स्त्री-पुरुष जैसे भेदों से आगे भी मनुष्य के भीतर अनेक विभाजन पैदा हुए हैं। उनके अनुसार गांधी ने इन विभाजनों के बीच मनुष्यता की धारणा को बदलने का काम किया।

कृत्रिम बुद्धिमत्ता से डरने के बजाय अपनी रचनात्मकता बचाएं

त्रिवेदी ने कृत्रिम बुद्धिमत्ता यानी आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस का भी उल्लेख किया। उन्होंने कहा कि आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस भी मनुष्य के प्राकृतिक मस्तिष्क की ही देन है। इसलिए मनुष्य को अपने बनाए हुए साधन से डरने की जरूरत नहीं है।

लेकिन आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस का अर्थ यह नहीं होना चाहिए कि मनुष्य की सोच और समझ ही समाप्त हो जाए।

संगीत का उदाहरण देते हुए उन्होंने कहा कि यदि कंप्यूटर के आदेश से सारी स्वर-लहरियां तैयार हो जाएंगी और मनुष्य को सुर-ताल का अभ्यास नहीं करना पड़ेगा तो फिर मनुष्य की रचनात्मक भूमिका क्या रह जाएगी? तब कुमार गंधर्व जैसे कलाकारों और उनकी साधना का महत्व क्या होगा? उन्होंने कहा कि प्रकृति का आनंद मनुष्य के अपने अनुभव और गांधी के साथ चलने वाली जीवन-दृष्टि में है।

अंतर्दृष्टि ही वास्तविक दृष्टि है

कलकत्ता के दृष्टिबाधित संस्थान के संस्मरण को आगे बढ़ाते हुए त्रिवेदी ने बताया कि वहां जन्म से दृष्टिहीन एक विद्वान प्रोफेसर उन्हें किताबें निकाल-निकालकर बताते थे और उनके विषय-वस्तु पर भी बातचीत करते थे।

इसके बाद उन्होंने एक ऐसी लड़की से मुलाकात की जो शारीरिक रूप से अत्यंत कमजोर थी, लेकिन वह दृष्टिबाधित लोगों को अखबार पढ़कर सुनाती थी।

त्रिवेदी ने कहा कि वहां उन्होंने अनुभव किया कि हमारी आंखें होने के बावजूद हमारी अंतर्दृष्टि मर सकती है, जबकि जिनकी आंखें नहीं हैं, उनकी अंतर्दृष्टि कहीं अधिक विकसित हो सकती है।

उन्होंने कहा कि गांधी ने मनुष्य की जीवन-ऊर्जा और प्राकृतिक जीवन के बीच संबंध को समझने का प्रयास किया। पृथ्वी को चैतन्य रखने और मनुष्य को अपनी आंतरिक ऊर्जा से जोड़ने की उनकी कोशिश उनके पूरे जीवन में दिखाई देती है।

गांधी को जानने से पहले अपने भीतर झांकना जरूरी

त्रिवेदी के पूरे वक्तव्य का केंद्रीय आग्रह यही रहा कि गांधी को केवल इतिहास के एक महापुरुष या किसी विचारधारा के प्रतिनिधि के रूप में देखने के बजाय उनके विचारों को अपने जीवन में तलाशने की जरूरत है। सत्य, अहिंसा, सादगी, शांति, सद्भाव, प्रकृति से संबंध, मनुष्य के प्रति सम्मान और अपनी अंतर्दृष्टि को जागृत करना गांधी की जीवन-दृष्टि के ऐसे पक्ष हैं, जिन्हें केवल बहस के जरिए नहीं समझा जा सकता।

उन्होंने कहा कि गांधी को लेकर विवादों में उलझने के बजाय यह देखना चाहिए कि हमारे अपने जीवन में गांधी कहां हैं। गांधी को बाहर खोजने के बजाय अपने भीतर सत्य, अहिंसा, सादगी, शांति और सद्भाव की उस ऊर्जा को तलाशना होगा, जिसे उन्होंने अपने जीवन और प्रयोगों के माध्यम से सामने रखा।

कार्यक्रम में स्‍वागत उद्बोधन सेवा सुरभि के कुमार सिद्धार्थ ने दिया, संचालन संजय पटेल ने किया। इस मौके पर शहर के प्रबुद्ध नागरिक बड़ी संख्‍या में उपस्थित थे।  

लेखक का परिचय

कुमार सिद्धार्थ

कुमार सिद्धार्थ स्वतंत्र पत्रकार एवं सामाजिक कार्यों से संबद्ध हैं।

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