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डॉ. अंबेडकर : सामाजिक न्याय से राष्ट्रीय एकता तक की प्रखर दृष्टि

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डॉ. भीमराव अंबेडकर की 135वीं जयंती केवल स्मरण का अवसर नहीं, बल्कि उनके व्यापक राष्ट्रवादी चिंतन को समझने का समय है। सामाजिक न्याय के पुरोधा अंबेडकर ने संविधान, अधिकारों की सुरक्षा और राष्ट्रीय एकता को सर्वोपरि रखा। आज के विभाजित सामाजिक-राजनीतिक परिदृश्य में उनके विचार न केवल प्रासंगिक हैं, बल्कि समरस, न्यायपूर्ण और सशक्त भारत के निर्माण के लिए मार्गदर्शक भी हैं।


नीतीश कुमार सिंह

दलित चिंतक और महान स्वतंत्रता सेनानी डॉ. भीमराव अंबेडकर की आज 135वीं जन्म जयंती है। मध्यप्रदेश के महू में 14 अप्रैल 1891 को समाजिक न्याय के पुरोधा का जन्म हुआ। इनकी अभिव्यक्ति राष्ट्रवादी आंदोलन से लेकर संविधान सभा और जीवन के अंत तक प्रखर दलित लड़ाके के तौर पर बेधड़क रही, परंतु भारत और भारतीयता को सर्वोपरी मानकर राष्ट्र की एकता, अखंडता और सद्भाव को अपने मन  वाणी और कर्म में संजोए रखा।

आमतौर पर अंबेडकर  की जीवन को समझना बहुत कठिन है।इसीलिए आज की सामाजिक-राजनीतिक परिस्थितयों के बीच अंबेडकर की अर्ध सत्य की धारणा जोर पकड़ी है, जिसमें सामाजिक, धार्मिक वैमनस्यता और देश के भाग्य-विधाताओं को खांचों में बांटकर सिर्फ वोट की राजनीति का कुत्सित क्रिया-कलाप चलना भर रह गया है।

उनके भाषणों से ही नीर-क्षीर किया जा  सकता है। 17 दिसंबर, 1946 को संविधान-सभा में लक्ष्य-संबंधी प्रस्ताव पर 10 मिनट के भाषण में उन्होंने कहा, “जहां राष्ट्र के भाग्य का फैसला करने का प्रश्न हो, वहां नेताओं, दलों और संप्रदायों की शान का कोई मूल्य नहीं होना चाहिए। वहां तो राष्ट्र के भाग्य को ही सर्वोपरि रखना चाहिए।” जो अंबेडकर को मानने वालों के लिए यह बहुत बड़ी सीख है।

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अंबेडकर जी को संविधान निर्माता के तौर पर पहचान मिली है, लेकिन वह प्लानर और इकोनॉमिक्स भी थे। बहुमुखी प्रतिभा वालों के साथ अन्याय होता है। जिन परिस्थितियों में अंबेडकर  ने काम किया और अपने अनुयायियों को पथ-प्रदर्शन दिया। उस दिशा में उनका राष्ट्रवादी अभिमत अभिव्यक्त होता रहा।  उनकी खास बात यह भी थी कि मत-परिवर्तन किया तो भारतीय जड़ों से जुड़े संप्रदाय बौद्ध धर्म में किया, बाहर नहीं किया। सामर्थयपूर्ण पद्धति से चलने वाले संप्रदाय में किया। ये उनकी मूल चरित्र को अभिव्यक्त करता है। ये उनकी एक और विशेषता समझ में आती है।

संविधान-सभा में अंबेडकर कहते हैं कि मैं जानता हूं कि आज हम राजनीतिक आर्थिक और सामाजिक सभी दृष्टियों से विभक्त है। आज हमारा देश कई लड़ाकू दलों में बंट गया है, और मैं तो यहां तक मंजूर करूंगा कि ऐसे ही एक लड़ाकू दल के नेताओं में शायद मैं भी एक हूं, परंतु सभापति महोदय इन सब बातों के बावजूद भी मुझे इस बात पर का पक्का विश्वास है कि समय और परिस्थिति अनुकूल होने पर दुनिया की कोई भी ताकत इस मुल्क को एक होने से रोक नहीं सकती। जाति और धर्म की भिन्नता के बावजूद भी हम किसी न किसी रूप में एक होंगे इसमें मुझे जरा भी शक नहीं है। यह कहने में मुझे रंच मात्र भी संकोच नहीं है कि यद्यपि मुस्लिम लीग आज भारत के विभाजन के लिए भयानक आंदोलन कर रही है पर एक न एक दिन स्वयं मुसलमान में बुद्धि आएगी और वह समझने लगेंगे कि उनके लिए भी संयुक्त भारत ही अधिक कल्याणकर है।

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अंबेडकर ने राष्ट्र, समाज के साथ नागरिक के अधिकारों के संरक्षण पर काफी जोर दिया। इससे अंतिम पायदान के व्यक्ति को संवैधानिक तौर पर समाज और सरकार से सुरक्षा मिल सके।

पंडित जवाहरलाल नेहरू के लक्ष्य संबंधी प्रस्ताव पर ही अंबेडकर ने कहा कि इसमें अधिकारों की चर्चा की गई है पर उनकी सुरक्षा का कोई उपाय नहीं दिया गया है। हम सभी इस बात को जानते हैं कि अधिकारों का कोई महत्व नहीं है यदि उनकी रक्षा की व्यवस्था न हो ताकि अधिकारों पर जब कुठाराघात हो तो लोग उनका बचाव कर सके ऐसी उपचारों पर इस प्रस्ताव में बिल्कुल अभाव है इस सामान्य सिद्धांत का भी इसमें उल्लेख नहीं है कि किसी नागरिक के जीवन और संपत्ति का तब तक अपहरण नहीं किया जाएगा जब तक की कानून खूब जांच पड़ताल कर इसकी आज्ञा ना दे दे। प्रस्ताव में उल्लेखित मौलिक अधिकारों को भी कानून और सदाचार के अधीन रख दिया गया है, निश्चित ही कानून और सदाचार क्या है इसका निर्णय जमाने का शासन प्रबंध करेगा। किसी प्रबंध का एक फैसला हो सकता है और दूसरे का दूसरा। हम निश्चय रूप से या नहीं जानते हैं कि इन मौलिक अधिकारों की स्थिति क्या होगी अगर यह शासन प्रबंध की मर्जी पर छोड़ दिए जाते हैं।

बहरहाल, देश में राम राज्य की बात होती है, मेरा मानना है कि वह तभी पूरी होगी  जिसमें ‘सब नर करहूं परस्पर प्रीति’ होने के साथ सत्ता, संपत्ति और सम्मान में सबकी समुचित भागीदारी हो।

नीतीश कुमार सिंह स्वतंत्र पत्रकार एवं राजनीति शास्त्र के शिक्षक है।
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