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समर्पण से सशक्तीकरण : चंबल की विरासत और ‘शांति एवं महिला’ अभियान

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14 अप्रैल को मनाया जाने वाला समर्पण दिवस हमें उस ऐतिहासिक क्षण की याद दिलाता है, जब चंबल के बागियों ने हिंसा का मार्ग छोड़कर आत्मसमर्पण किया। यह घटना केवल कानून व्यवस्था की सफलता नहीं, बल्कि मानव हृदय परिवर्तन की अद्भुत मिसाल है, जिसने अहिंसा और करुणा की शक्ति को पूरे देश के सामने स्थापित किया।


14 अप्रैल : बागी आत्‍म समर्पण का 55वां वर्ष

चंबल यह नाम सुनते ही कभी जेहन में बीहड़, धूल, घोड़ों की टाप और बागी डाकुओं की डरावनी तस्वीरें उभर आती थीं। दशकों तक यह क्षेत्र भय, प्रतिशोध और रक्तपात का पर्याय बना रहा। लेकिन इतिहास गवाह है कि जहाँ अंधेरा सबसे घना होता है, वहीं से उजाले की किरण फूटती है। सन् 1972 में चंबल की घाटी में एक ऐसी क्रांतिकारी घटना घटी, जिसने न केवल भारत को बल्कि पूरी मानवता को एक नई दिशा दी। यह घटना थी बागी -आत्मसमर्पण, जिसने हिंसा की धरती को शांति और अहिंसा की प्रयोगशाला में बदल दिया।

जयप्रकाश नारायण और हृदय परिवर्तन का प्रयोग

इस महान परिवर्तन के सूत्रधार थे लोकनायक जयप्रकाश नारायण (जेपी)। गांधीवादी मूल्यों में अटूट विश्वास रखने वाले जेपी का मानना था कि “अपराध से घृणा करो, अपराधी से नहीं।” 14-16 अप्रैल 1972 के वे दिन जौरा (मुरैना) के गांधी सेवा आश्रम के इतिहास में स्वर्ण अक्षरों में दर्ज हैं।

जब माधो सिंह और मोहर सिंह जैसे कुख्यात बागियों ने जेपी के चरणों में अपनी बंदूकें रखीं, तो वह केवल हथियारों का समर्पण नहीं था; वह एक विचारधारा का समर्पण था। लोकनायक की सौम्य उपस्थिति और उनके नैतिक प्रभाव ने उन लोगों के भीतर सोई हुई मानवता को जगा दिया, जिन्हें समाज ‘दुर्दांत’ कहता था। महात्मा गांधी के चित्र के सामने जब सैकड़ों बागियों ने घुटने टेके, तो चंबल की हवाओं में पहली बार भय की जगह भरोसे की खुशबू घुली। यह विश्व इतिहास का संभवतः सबसे बड़ा सामूहिक आत्मसमर्पण था, जिसे बिना किसी बल प्रयोग के, केवल ‘संवाद’ के माध्यम से संपन्न किया गया।

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क्षमा और करुणा की अग्निपरीक्षा

आत्मसमर्पण के बाद असली चुनौती शुरू हुई। वर्षों तक जेल की सजा काटने के बाद जब ये बागी समाज की मुख्यधारा में लौटे, तो एक बड़ा यक्ष प्रश्न सामने था क्या समाज इन्हें अपनाएगा? अक्सर संघर्षों के बाद प्रतिशोध की भावना प्रबल होती है। आशंका थी कि जिन परिवारों ने इन बागियों के जुल्म सहे थे, वे बदला लेंगे। लेकिन यहीं चंबल ने दुनिया को चौंका दिया। जिस तरह बागियों का हृदय परिवर्तन हुआ था, उसी तरह पीड़ितों के मन में भी ‘करुणा’ और ‘क्षमा’ का ज्वार उठा। पीड़ितों ने अपने घावों को भुलाकर उन पूर्व बागियों को गले लगाया। यह ‘सत्य और अहिंसा’ का साक्षात साक्षात्कार था। समाज ने दिखाया कि यदि न्याय के साथ संवेदनशीलता जुड़ जाए, तो अपराधी को भी एक सम्मानित नागरिक बनाया जा सकता है।

चंबल से कन्नूर तक: एक वैश्विक प्रेरणा

चंबल की यह सफलता केवल मध्य भारत के बीहड़ों तक सीमित नहीं रही। इसकी गूँज दक्षिण भारत के केरल तक पहुँची। केरल का कन्नूर जिला, जो दशकों से राजनीतिक हिंसा और वैचारिक संघर्ष की आग में झुलस रहा था, वहां के सामाजिक कार्यकर्ताओं ने चंबल के मॉडल को अपनाया।

उन्होंने ‘संवाद’ को अपना हथियार बनाया। चंबल के अनुभव से सीख लेते हुए वहां शांति समितियां बनाई गईं और निरंतर सात वर्षों के प्रयास के बाद कन्नूर की हिंसक घटनाओं में भारी कमी आई। यह इस बात का जीवंत प्रमाण है कि संवाद की शक्ति किसी भी अत्याधुनिक हथियार से कहीं अधिक मारक और प्रभावी होती है।

शांति पर्यटन और शिक्षा का नया केंद्र: जौरा

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आज आवश्यकता है कि जौरा का आत्मसमर्पण स्थल केवल एक स्मारक बनकर न रह जाए। इसे अहिंसा, शांति और संघर्ष समाधान के एक वैश्विक केंद्र के रूप में विकसित किया जाना चाहिए।

शांति पर्यटन:

जैसे दुनिया युद्ध स्थलों को देखने जाती है, वैसे ही उसे उन स्थलों को भी देखना चाहिए जहाँ युद्ध समाप्त हुए थे। जौरा का गांधी आश्रम दुनिया को यह सिखा सकता है कि सबसे जटिल समस्याओं का समाधान बंदूक नहीं, बल्कि बैठकर बात करने से संभव है। यह स्थान युवाओं के लिए एक पाठशाला बन सकता है, जहाँ उन्हें सिखाया जाए कि शांति का मार्ग कायरता नहीं, बल्कि सबसे बड़ा साहस है।

शांति और महिला” अभियान: एक नई पहल

इसी कड़ी में, 14 अप्रैल को जौरा की पावन धरा से “शांति और महिला” अभियान का शंखनाद किया जा रहा है। शांति स्थापना में महिलाओं की भूमिका सदैव निर्णायक रही है। इस अभियान के माध्यम से दुनिया भर की महिलाएं एकजुट होकर यह संदेश देंगी कि एक शांतिपूर्ण समाज का निर्माण घर की दहलीज से शुरू होता है।

इतना ही नहीं, चंबल का यह अहिंसक प्रयोग अब अंतरराष्ट्रीय मंचों पर भी गूँज रहा है। अफ्रीका के देश बेनिन में आयोजित होने वाले ‘विश्व शांति मंच’ में चंबल के इस सफल प्रयोग पर चर्चा की जाएगी। यह गर्व का विषय है कि एक समय में पिछड़ा माना जाने वाला क्षेत्र आज विश्व शांति के लिए ‘रोल मॉडल’ बन रहा है।

विनोबा भावे की ‘सज्जन शक्ति’ का आह्वान

आज जब दुनिया के कई हिस्सों में युद्ध के बादल मंडरा रहे हैं और हथियारों की होड़ मची है, तब हमें आचार्य विनोबा भावे की वह बात याद आती है “संगठित सज्जन शक्ति ही दुर्जन शक्ति को चुनौती दे सकती है।” अहिंसा का अर्थ केवल शांत बैठना नहीं है, बल्कि अन्याय के विरुद्ध प्रेम और संगठन की शक्ति से खड़ा होना है। हिंसा को कोसने से अंधेरा दूर नहीं होगा, हमें अहिंसा के दीये को और अधिक चमकदार बनाना होगा। 14 अप्रैल, जो ‘समर्पण दिवस’ के रूप में विख्यात है, हमें याद दिलाता है कि इंसान के भीतर का ‘राम’ कभी भी ‘रावण’ पर विजय पा सकता है, बशर्ते उसे सही दिशा और प्रेम मिले।

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चंबल घाटी का इतिहास हमें सिखाता है कि कोई भी व्यक्ति जन्म से अपराधी नहीं होता, परिस्थितियाँ उसे बागी बनाती हैं और ‘करुणा’ उसे पुनः इंसान बनाती है। जयप्रकाश नारायण, डॉ. सुब्बराव और तमाम गांधीवादी विचारकों ने जो बीज बोया था, वह आज एक विशाल वटवृक्ष बन चुका है।

आज हमें संकल्प लेना चाहिए कि हम चंबल की इस विरासत को आगे बढ़ाएंगे। संवाद के दरवाजों को कभी बंद नहीं होने देंगे। यदि चंबल के बीहड़ों में शांति के फूल खिल सकते हैं, तो दुनिया के किसी भी कोने में युद्ध समाप्त हो सकता है। आइए, इस 14 अप्रैल को हम सब मिलकर शांति के इस महायज्ञ में अपनी आहुति दें और एक ऐसे विश्व का निर्माण करें जहाँ केवल प्रेम की भाषा बोली जाए।

(लेखक राजगोपाल पी.व्ही. महात्मा गाँधी सेवा आश्रम जौरा के अध्यक्ष और एकता परिषद् के संस्थापक है.)

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