Sarvodaya Press Service

सर्वोदय प्रेस सर्विस – फीचर्स सेवा के छ: दशक

युद्धों में भुलाया जाता पर्यावरण

लेखक की फोटो

जीते-जागते इंसानों, सभ्यताओं, प्राणियों और स्व-निर्मित संसाधनों को नेस्तनाबूद करने के अलावा युद्ध पर्यावरण का भी विनाश करते हैं। विडंबना यह है कि पर्यावरण की यह बरबादी सदियों वापस पटरी पर नहीं आ पाती। क्या होता है, यह नुकसान? इसकी अहमियत क्या होती है? बता रहे हैं, डॉ. ओ.पी.जोशी।–संपादक


आधुनिक समय में लड़े जा रहे युद्ध उच्च-तकनीकी के उपयोग से बहुत विनाशकारी साबित हो रहे हैं। इनमें बड़े पैमाने पर बम, टैंक, मिसाइल, ड्रोन, मोर्टार्स, विमान, राकेट्स एवं कई सैन्य उपकरणों का प्रयोग किया जाता है। पर्यावरणविदों ने तकनीक की मदद से लड़े जा रहे इन युद्धों को पर्यावरण के लिए उद्योगों से भी ज्यादा खतरनाक बताया है। दुनिया आज युद्धों से घिरती जा रही है। रूस-युक्रेन युद्ध तो पिछले 4-5 वर्षों से जारी था, परंतु अभी मार्च के प्रारंभ में ही अमेरिका-इजरायल द्वारा ईरान पर हमले ने एक और भयानक युद्ध शुरु कर दिया है। गाज़ा में ढाई-तीन साल से एक युद्ध इज़राइल व हमास के बीच चल ही रहा है।

युद्ध की रणनीति में पर्यावरण की चिंता कहीं नहीं की जाती, इसीलिए युद्धों में पर्यावरण की बलि चढ़ती ही रहती है। अभी भी युद्ध एवं संघर्ष से पर्यावरण को हो रही हानि या विनाश को गंभीरता से नहीं लिया जा रहा है। युद्ध के कारण वायु, जल एवं भूमि के प्रदूषण के साथ-साथ वन, चारागाह एवं फसलों का विनाश होता है और जैव-विविधता घटती है, परन्तु सबसे खतरनाक है उन ‘ग्रीन हाउस गैसों’ का उत्सर्जन (कार्बन उत्सर्जन) जो तापमान बढ़ाने और ‘ग्लोबल-वार्मिंग’ में सहायक होती हैं।

See also    प्रकृति : पीछे रह गए पेड़

पिछले 3 – 4 वर्षों के युद्ध उस दौर में लड़े जा रहे हैं जब वायु-मण्डल में ‘ग्रीन-हाउस गैसों’ (जीएचजी) का उत्सर्जन खतरनाक स्तर पर पहुंच गया है, जो बहुत ही चिंताजनक है। ‘ग्रीन-हाउस गैसें’ उन्हें कहा जाता है, जो वायुमण्डल में एक निश्चित ऊँचाई पर पहुँचकर कांच की तरह कार्य करती हैं। इससे पृथ्वी से पैदा होने वाली गर्मी रुक जाती है एवं धीरे-धीरे तापमान बढ़ने लगता है। यही ‘ग्लोबल वार्मिंग’ कहलाता है। इन गैसों में ‘कार्बन डाय-ऑक्साइड,’ ‘मीथेन’ एवं ‘क्लोरो-फ्लोरो कार्बन’ प्रमुख हैं, परन्तु सबसे खतरनाक ‘कार्बन डाय-ऑक्साइड’ है, जो कम क्रियाशील होने से लगभग 300 वर्षों तक वायुमंडल में बनी रहती है।

‘नेशनल ओशनिक एण्ड एटमॉस्फीरिक एडमिनिस्ट्रेशन, अमेरिका’ (एनओएए) के अनुसार वर्ष 2021 में 36.3 अरब टन ‘ग्रीन-हाउस गैसों’ का उत्सजन हुआ जिसे अब तक का सर्वाधिक बताया गया है। वर्ष 2023 में 2022 की तुलना में उत्सर्जन बढ़ा एवं ‘कार्बन डाय-ऑक्साइड’ की वैश्विक मात्रा/सांद्रता 420 ‘पी.पी.एम.’ (पार्ट्स पर-मिलियन) तक पहुंच गयी। इस गैस का उत्सर्जन वर्ष 2025 में रिकॉर्ड 38.1 अरब टन तक पहुंचा था। ‘क्रिश्चियन एड, ब्रिटेन’ की रिपोर्ट के मुताबिक ‘ग्रीन-हाउस गैसों’ की बढ़ती मात्रा के कारण बढ़ते ‘ग्लोबल वार्मिंग’ एवं जलवायु बदलाव से संभवतः वर्ष 2025 में ही इतनी आपदाऐं (बाढ़, सूखा, लू, जंगल की आग व तूफान आदि) आयीं कि विश्‍व को 122 अरब डॉलर की हानि हुई।

वर्ष 2026 के प्रारंभ में पर्यावरणविदों ने यह सम्भावना जतायी थी कि बढ़ती ‘ग्रीन-हाउस गैसों’ की मात्रा से यह वर्ष पिछले कुछ वर्षों की तुलना में ज्यादा गर्म साबित होगा। वर्तमान में जारी युद्धों एवं संघर्षों से यह सम्भावना हकीकत में बदलती नजर आ रही है। अमरीका तथा ब्रिटेन के कुछ शोधकर्ताओं ने आधुनिक तकनीक से युद्धों में उत्सर्जित प्रमुख ‘ग्रीन-हाउस गैस’ ‘कार्बन डाय-ऑक्साइड’ की मात्रा का आंकलन किया है।

See also  जलवायु कार्यकर्ताओं की बढ़ती गिरफ़्तारियाँ और लोकतांत्रिक संकट

इजराइल-गाज़ा संघर्ष में 38.2 मिलियन टन ‘कार्बन डाय-आक्साइड’ का उत्सर्जन हुआ एवं रूस-युक्रेन युद्ध में अभी तक 230 मिलियन टन का। रूस-युक्रेन युद्ध में 27,000 से ज्यादा आग लगने की घटनाऐं हुई। तेल ठिकानों (कुओं, डिपो, रिफायनरी, जहाज) पर लगी आग से सर्वाधिक ‘ग्रीन-हाउस गैसों’ का उत्सर्जन होता है। वर्तमान युद्ध में तेहरान के 30 बड़े ऑइल डिपो तथा बहरीन की तेल कम्पनी पर हमलों से आग लग चुकी है एवं यह आगे भी जारी रहेगी।

पहले से बढ़ी हुई ‘ग्रीन-हाउस गैसों’ की मात्रा में मौजूदा युद्ध एवं संघर्ष ‘घी में आग’ का कार्य कर रहे हैं। एक और महत्वपूर्ण बात यह है कि ‘कार्बन डाय-ऑक्साइड’ को सोखने वाले जंगल घटते जा रहे हैं तथा समुद्री-क्षेत्र भी प्रदूषण से ग्रस्त है। एक अध्ययन के अनुसार इजराइल-गाज़ा संघर्ष में पैदा 38.2 मिलियन टन ‘कार्बन डाय-ऑक्साइड’ को सोखने के लिए 3.31 करोड़ हेक्टर में फैले सघन जंगल जरूरी बताए गए हैं।

ब्राजील के बेलेम में नवम्बर 2025 में आयोजित ‘संयुक्त राष्ट्र संघ जलवायु शिखर सम्मेलन’ (कॉप-30) में ‘कृत्रिम बुद्धि’ (एआई) के अध्ययन पर आधारित एक रिपोर्ट में बताया गया था कि वर्ष 2024 में पिछले दशक के औसत की तुलना में धरती की ‘कार्बन डाय-ऑक्साइड’ सोखने की क्षमता आधी से कम हो गयी है। ‘ग्रीन-हाउस गैसों’ के बढ़ने से पैदा ‘ग्लोबल वार्मिंग’ एवं जलवायु बदलाव से पैदा ‘चरम मौसम’ की घटनाओं का आपदाओं के रूप में बढ़ना तय है।

ये आपदाऐं उन क्षेत्रों में भी आयेंगी जिनका युद्ध एवं संघर्षों से कोई लेना-देना नहीं है। पिछले ‘जलवायु शिखर सम्मेलन’ में भाग लेने वाले 197 देश भी युद्ध एवं संघषों को रोकने के लिए उन देशों पर दबाव नहीं बना रहे हैं, जो इनके लिए जिम्मेदार हैं। याद रखिए, विश्‍व में शांति बनाए रखना पर्यावरण के लिए भी जरूरी है। (सप्रेस)

WhatsApp हमारे WhatsApp Channel को Join करें
See also  धधकती धरती : विकास की अंधी दौड़ या विनाश का काउंटडाउन

Table of Contents

अनशन से आगे का संघर्ष: सोनम वांगचुक से उठी एक ऐसी अपील, जिसने लोकतंत्र की आत्मा को छू लिया

लोकतांत्रिक आंदोलनों का इतिहास केवल संघर्षों का इतिहास नहीं है, बल्कि उन नैतिक दुविधाओं का भी इतिहास है, जहाँ एक ओर सिद्धांतों के लिए जीवन दांव पर लगा होता है और दूसरी ओर वही जीवन आंदोलन की सबसे बड़ी पूंजी

Read More »

सोनम वांगचुक :  अनशन नहीं, सत्ता का चरित्र बदला है

सोनम वांगचुक का आमरण अनशन अब केवल शिक्षा सुधार या एक मंत्री की जवाबदेही का प्रश्न नहीं रह गया है, बल्कि लोकतांत्रिक प्रतिरोध की प्रभावशीलता की भी परीक्षा बन चुका है। इसी बीच न्यायालय ने उनके जीवन की रक्षा को

Read More »

यात्रा-वृत्तांत : अनोखी है बैतूल की भू-संस्कृति

भारत की विविध भू-संस्कृतियों की खोज में बैतूल एक ऐसा पड़ाव है, जहाँ प्रकृति, लोकजीवन, आस्था और सामुदायिक संस्कृति एक-दूसरे में सहज रूप से घुली-मिली दिखाई देती हैं। यह यात्रा-वृत्तांत एक शोधार्थी की आँखों से बैतूल की सांस्कृतिक और प्राकृतिक

Read More »