प्रकृति : पीछे रह गए पेड़

हेमलता म्हस्के

कई अध्ययनों में बताया जा रहा है कि 2024 का साल ज्ञात इतिहास का सर्वाधिक गरम साल रहा है। ऐसे में इंसानी वजूद के लिए क्या किया जाना चाहिए? विकास की मौजूदा खाऊ-उडाऊ अवधारणा को फौरन से पेश्तर बदल डालने के अलावा पेडों की आबादी बढ़ाना एक उपाय हो सकता है।

गर्मी तो हर साल आती है लेकिन इस बार पिछले रिकार्ड भी तोड़ गई है। यह हमारी लगातार लापरवाही का नतीजा है। हमने कांक्रीट के जंगल बसाए, ढ़ेर सारे उपकरण लगाए, लेकिन पौधे नहीं लगाए, बल्कि उनको काट डाला। क्या हम अभी भी सचेत नहीं होंगे। बढ़ते तापमान को रोकने के लिए हमें अपनी कोशिशें तेज करनी होंगी। पिछले कई वर्षों के मुकाबले इस बार अप्रैल और मई के साथ जून महीने में इतनी भीषण गर्मी पड़ी है जिससे अब तक के सभी रिकॉर्ड टूट गए हैं। शरीर को झुलसा  देने वाली गर्मी, सूरज का बढ़ता पारा और लू के थपेडों से न केवल मनुष्य बल्कि पशु-पक्षी और जीव-जंतु सभी का हाल-बेहाल है।

सूरज का पारा दिन-प्रतिदिन बढ़ने का मुख्य कारण ‘ग्लोबल वार्मिंग’ है। पृथ्वी के बढ़ते तापमान को ही ‘ग्लोबल वार्मिंग’ कहते हैं। पृथ्वी सूर्य की किरणों से ऊष्मा प्राप्त करती है जो वायुमंडल से गुजरते हुए पृथ्वी की सतह से टकराती हैं और धरती को ऊष्मा प्रदान करती है। इंसान की लापरवाही और धन की हवस के कारण वायुमंडल की निचली परत में ‘ग्रीन हाउस गैसों’ का आवरण सा बन जाता है। यह आवरण लौटती किरणों के एक बड़े हिस्से को रोक लेता है। ऐसी रुकी हुई किरणें ही धरती के तापमान को बढ़ाती हैं।

वायुमंडल में गैसों का एक निश्चित अनुपात माना गया है, लेकिन बढ़ती ‘ग्लोबल वार्मिंग’ के कारण संतुलन बिगड़ रहा है। पिछले 100 वर्षों में कार्बन डाइ-ऑक्साइड की मात्रा में 24 लाख टन की बढ़ोतरी हुई है, जबकि ऑक्सीजन की मात्रा में 26 लाख टन की कमी आई है। यह असंतुलन मानव सहित पशु-पक्षियों और वनस्पति जगत के लिए बहुत ही चिंताजनक है। अगर हम अभी भी जागरूक नहीं होंगे तो वह दिन दूर नहीं जब हमें घर से बाहर निकलते हुए अपने साथ ऑक्सीजन का एक छोटा सिलेंडर भी ढोकर ले जाना होगा।

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अनुमान है कि भविष्य में ‘ग्लोबल वार्मिंग’ के कारण पृथ्वी के तापमान में और बढ़ोतरी होगी और अगर ध्रुव और ग्लेशियर की बर्फ पिघलने लगी तो पूरी पृथ्वी समुद्र के जल से जलमग्न हो सकती है और पृथ्वी पर महाप्रलय भी आ सकती है। भविष्य में संकट को देखते हुए ‘ग्लोबल वार्मिंग’ को रोकने के लिए हमें पौधे लगाने होंगे। केवल सरकार के भरोसे ‘ग्लोबल वार्मिंग’ को नहीं रोका जा सकता। अगर हर साल हर परिवार का एक व्यक्ति एक पौधा लगाए तो हम अपने आसपास के 2.5 सेंटीग्रेड फारेनहाइट तापमान को कम कर सकते हैं। इसलिए जरूरी है कि हम मिलकर प्रयास करें, वरना भविष्य में ना केवल हमें, बल्कि आने वाली पीढ़ियों को भी कष्ट उठाना पड़ेगा।

पेड़ मनुष्यों को ऑक्सीजन प्रदान करते हैं, कार्बन का भंडारण करते हैं, मिट्टी को स्थिर करते हैं और दुनिया भर में विभिन्न प्रकार के जीवों का पोषण करते हैं। वे हमें उपकरण और आवास के लिए आवश्यक संसाधन भी देते हैं। पेड़ पत्तेदार छाया और नमी से हवा, भूमि और पानी को ठंडा करते हैं। हमारे घरों के पास और हमारे समुदाय में लगाए गए पेड़ तापमान को नियंत्रित करते हैं, और जीवाश्म ईंधन को जलाने से उत्पन्न एयर-कंडीशनिंग और हीटिंग की आवश्यकता को कम करते हैं, जो वायुमंडलीय कार्बन डाइ-ऑक्साइड का एक प्रमुख स्रोत है। पेड़ अनगिनत प्रजातियों के लिए घोंसले बनाने की जगह, भोजन और आश्रय प्रदान करते हैं। पेड़ सभी वन्यजीवों को आश्रय और पोषण देते हैं।

प्रकृति इंसान की सबसे बड़ी दोस्त होती है, लेकिन इंसान को प्रकृति की उतनी परवाह नहीं है। इंसान अपने आराम के लिए  प्रकृति का बेधड़क इस्तेमाल कर रहा है। पहले जहां जंगल थे, चारों तरफ जहां हरियाली थी, वहां अब हरियाली सिमटती नजर आ रही है और इसका सबसे बड़ा कारण है, इंसान। इंसानों ने अपने इस्तेमाल के लिए पेड़ों की कटाई की और जमीनों की खुदाई की। इसके साथ ही ऐसा वातावरण बनाया जिससे पिछले कुछ सालों में जंगल लगातार कम होते जा रहे हैं।  ‘भारतीय वन रिपोर्ट’ के मुताबिक साल 2021 में भारत में 7,13,789 वर्ग किलोमीटर जंगल क्षेत्र था जो पूरे देश के भौगोलिक क्षेत्र का 21.72 प्रतिशत था। इसमें साल 2019 के बाद 1540 वर्ग किलोमीटर की बढ़ोतरी हुई, लेकिन पिछले कुछ सालों में इसमें कमी देखने को मिली, जो एक चिंता का विषय है।

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दुनिया में सबसे ज्यादा जंगल रूस में हैं। रूस में 815 मिलियन हेक्टेयर से ज़्यादा जंगल हैं, जो रूस के पूरे क्षेत्रफल का 45% है। दुनिया के सबसे बड़े जंगल की बात की जाए तो वह दक्षिण अमेरिका में है। दक्षिण अमेरिका का जंगल ‘अमेजॉन रेनफॉरेस्ट’ करीब 65 लाख वर्ग किलोमीटर में फैला हुआ है। इसे पृथ्वी का फेफड़ा भी कहते हैं क्योंकि यह दुनिया की करीब 20% ऑक्सीजन पैदा करता है। वहीं अगर भारत की बात की जाए तो भारत में सबसे ज्यादा जंगल मध्यप्रदेश में हैं, जो 77,462 वर्ग किलोमीटर में फैले हुए हैं।

हमारी जीवन शैली और कुछ लापरवाहियों की वजह से जो ठंडे इलाके माने जाते थे वहां भी अब गर्मी अपना रौद्र रूप दिखा रही है। इसके तुरंत बाद बाढ़ और वर्षा की आपदाओं का सामना करना पडता है। इसके बाद फिर सूखा भी आएगा। खेती बर्बाद होगी। ऐसे में पानी के लिए पूरे देश में हाहाकार होगा। फिर जब ठंड का समय आएगा तो भी उतनी ठंड नहीं होगी जिससे हम महसूस कर सकें कि ठंड का मौसम आ गया है। नदियां सूख रही हैं। दुनिया भर में लाखों लोग गर्मी से मर रहे हैं। इनमें 30 फीसद लोग एशिया के हैं। जिस रफ्तार से जंगल कट रहे हैं उस  हिसाब से पर्याप्त पेड़ नहीं लग रहे हैं।

2010 की मैपिंग के अनुसार भारत के खेतिहर इलाके में 60 करोड़ छायादार पेड़ थे। 2018 की एक रिपोर्ट के मुताबिक मात्र आठ सालों में साढ़े 6 करोड़ से अधिक छायादार पेड़ नष्ट कर दिए गए हैं। ये आंकड़े सबसे अधिक तेलंगाना, हरियाणा, केरल, आंध्रप्रदेश, महाराष्ट्र और उत्तरप्रदेश के हैं, जहां गर्मी के कारण हाहाकार मचता है। ऐसे में हमारी आदतें और आरामपरस्ती नहीं बदलेगी तो हम निश्चित ही अपने अंत की ओर बढ़ रहे हैं। इन सबका बुरा असर हमारी अर्थव्यवस्था पर भी पड़ेगा। अपने देश में पिछले एक-दो दशकों से ‘पेड़ लगाओ अभियान’ सरकार और समाज द्वारा चलाए जा रहे हैं, लेकिन इसके बावजूद तापमान में बढ़ोतरी हो रही है। पेड़ लगाने का काम हमें ईमानदारी से और पूरी गंभीरता से करने की जरूरत है। पेड़ लगाने के नाम पर बेईमानी से दूर होना होगा। आज पेड़ हमारी जिंदगी में बहुत पीछे रह गए हैं। (सप्रेस)

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