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संविधान बनाम खनन : पचामा दादर में पर्यावरणीय न्याय की परीक्षा

संविधान बनाम खनन : पचामा दादर में पर्यावरणीय न्याय की परीक्षा

मध्यप्रदेश के बालाघाट स्थित पचामा दादर बॉक्साइट ब्लॉक की प्रस्तावित खनन परियोजना पर्यावरणीय मानकों, जल संसाधन आकलन और वनाधिकार प्रावधानों की गंभीर अनदेखी के आरोपों में घिर गई है। अधूरी ईआईए रिपोर्ट, घटते भूजल स्तर, समृद्ध जैव विविधता वाले वन...

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मध्यप्रदेश के बालाघाट स्थित पचामा दादर बॉक्साइट ब्लॉक की प्रस्तावित खनन परियोजना पर्यावरणीय मानकों, जल संसाधन आकलन और वनाधिकार प्रावधानों की गंभीर अनदेखी के आरोपों में घिर गई है। अधूरी ईआईए रिपोर्ट, घटते भूजल स्तर, समृद्ध जैव विविधता वाले वन क्षेत्र और ग्राम सभाओं की अस्पष्ट सहमति को लेकर आदिवासी समुदायों ने विरोध तेज करते हुए नीलामी प्रक्रिया निरस्त करने की मांग उठाई है।


मध्यप्रदेश के जिला बालाघाट स्थित पचामा दादर बॉक्साइट ब्लॉक की नीलामी प्रक्रिया वर्ष 2023 में प्रारंभ की गई थी। प्रस्तावित बॉक्साइट खनन परियोजना हेतु प्रस्तुत पर्यावरण प्रभाव आकलन रिपोर्ट में प्राथमिक बेसलाइन डेटा केवल दिसंबर 2024 से फरवरी 2025 तक की अवधि का ही संकलित किया गया है, जो कि पर्यावरणीय आकलन के स्थापित मानकों एवं दिशा निर्देशों के अनुरूप नहीं है। रिपोर्ट में परियोजना की जल आवश्यकता और भूजल दोहन का विवरण प्रदान नहीं किया गया है। जबकि प्रस्तावित खनन क्षेत्र और आसपास के गांवों में पहले से ही भूजल स्तर कम है। बिना सटीक दैनिक एवं वार्षिक जल उपयोग और भूजल दोहन बताएं,यह अनुमान लगाना असंभव है कि परियोजना से स्थानीय जल स्तर पर क्या प्रभाव पङेगा।

प्रस्तावित खनन क्षेत्र के 10 किलोमीटर के दायरे में 24416.5 हेक्टेयर में घना वन है। जिसमें वन्य प्राणी और औषधीय पौधे भी है। इस क्षेत्र में बाघ,तेंदुआ,भालू ,चीतल , सांभर आदि का रहवास है और  कान्हा – पेंच टाइगर रिजर्व का कारीडोर है।1000 के पैमाने पर जैव विविधता सूचकांक 0.929 से 929.000 है।  जिसे समृद्ध जैव विविधता माना जाता है।

प्रस्तावित खनन के लिए पर्यावरणीय  जनसुनवाई आगामी 18 फरवरी को निर्धारित किया गया है। इस जनसुनवाई को निरस्त करने की मांग को लेकर विगत 12 फरवरी को बैहर तहसील के उकवा वन परिक्षेत्र कार्यालय के सामने सैकड़ों आदिवासियों ने चक्का जाम किया। यह क्षेत्र वन भूमि, आदिवासी बहुल आबादी, संवेदनशील जल-तंत्र एवं पारिस्थितिकी से जुड़ा हुआ है।

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पर्यावरण प्रभाव आकलन और पर्यावरण प्रबंधन योजना रिपोर्टों एवं सार्वजनिक सूचनाओं के अध्ययन से यह स्पष्ट होता है कि उक्त नीलामी प्रक्रिया संवैधानिक, पर्यावरणीय एवं विधिक प्रावधानों का उल्लंघन करती है। इस पचामा दादर बॉक्साइट ब्लॉक के लिए ब्लॉक-विशेष, अद्यतन और स्वतंत्र पर्यावरण प्रभाव आकलन अध्ययन सार्वजनिक रूप से उपलब्ध नहीं है। पूर्व से संचालित अन्य खदानों (जैसे मैंगनीज खदानों) की रिपोर्टों को संदर्भ बनाना पर्यावरण प्रभाव निर्धारण अधिसूचना 2006 का उल्लंघन है।

पर्यावरण मंत्रालय द्वारा प्राप्त टर्म ऑफ रेफरेंस (टीओआर) के अन्तर्गत सामाजिक प्रभाव,वन अधिकारों  की स्थिति तथा प्रभावित समुदायों के अधिकारों का स्पष्ट विवरण अनिवार्य होता है। वन अधिकार कानून इस परियोजना क्षेत्र में लागू नहीं मानना टीओआर की शर्तों का सीधा  उलंघन है। जिससे पूरी पर्यावरण प्रभाव आकलन रिपोर्ट संदिग्ध हो जाती है।

वन अधिकार अधिनियम,देश के समस्त वन क्षेत्रों पर लागू होता है, जहां अनूसूचित जनजाति एवं अन्य परंपरागत वन निवासियों के व्यक्तिगत व सामुदायिक के अधिकार वर्णित हैं। आदिवासी समुदायों के व्यक्तिगत एवं सामुदायिक वन अधिकारों पर पड़ने वाले प्रभावों का कोई समुचित आकलन नहीं किया गया है। यह स्थिति वन अधिकार अधिनियम, 2006 तथा माननीय सर्वोच्च न्यायालय के निर्देशों के प्रतिकूल है। इस खनन परियोजना को लेकर पर्यावरण,वन और जलवायु परिवर्तन मंत्रालय द्वारा  23 नवंबर 2023 को जारी अधिसूचना की कंडिका- 19 में वन अधिकारों का उल्लेख किया गया है। ओपनकास्ट बॉक्साइट खनन के दीर्घकालिक प्रभावों को “नगण्य” बताना वैज्ञानिक तथ्यों के विपरीत है। पेसा कानून के अन्तर्गत ग्राम सभाओं की पूर्व, स्वतंत्र एवं सूचित सहमति के स्पष्ट और प्रमाणित दस्तावेज़ उपलब्ध नहीं कराए गए हैं। जल संसाधनों पर प्रभाव को कम करके दिखाया गया है।

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ईआइए में यह कहा गया है कि कोर क्षेत्र में कोई स्थायी जल स्रोत नहीं है, जबकि  मौसमी नाले, वर्षाजल संचयन, भूजल पुनर्भरण स्थानीय कृषि एवं जीवन का आधार हैं। खनन हेतु जल उपयोग से क्षेत्र में पहले से मौजूद जल संकट और गहराने की आशंका है, जिसका समुचित आकलन नहीं किया गया। सामाजिक और आर्थिक प्रभावों का एकतरफा चित्रण किया गया है। रोजगार सृजन के दावे अनुमान आधारित हैं, जिनमें यह स्पष्ट नहीं है कि कितने स्थानीय आदिवासियों को स्थायी रोजगार मिलेगा। विस्थापन एवं आजीविका हानि की भरपाई कैसे होगी। ट्रक परिवहन, धूल, शोर, स्वास्थ्य जोखिम और सामाजिक असंतोष जैसे नकारात्मक पहलुओं को नगण्य बताया गया है। पर्यावरण प्रबंधन योजना अव्यावहारिक है। जल संकट वाले क्षेत्र में नियमित पानी छिड़काव अव्यावहारिक है। हरित पट्टी एवं बैंक फिलिंग जैसे उपाय कागजी औपचारिकता बनकर रह जाते हैं। खनन के बाद भूमि की मूल पारिस्थितिकी की वास्तविक बहाली संभव नहीं है। नीलामी प्रक्रिया में पर्यावरणीय सावधानी का अभाव है। नीलामी प्रक्रिया पर्यावरणीय एवं सामाजिक स्वीकृतियों से पूर्व आगे बढ़ाई गई। संचयी पर्यावरणीय प्रभाव नहीं कराया गया है। यह दर्शाता है कि राजस्व प्राथमिकता को पर्यावरणीय न्याय एवं संवैधानिक अधिकारों से ऊपर रखा गया है।

क्षेत्रीय विधायक संजय उईके ने पचामा दादर बॉक्साइट ब्लॉक की नीलामी प्रक्रिया तत्काल निरस्त करने की मांग रखी है। उन्होंने सरकार को कहा है कि सभी संबंधित ग्राम सभाओं की सहमति को सार्वजनिक किया जाए। वन अधिकार कानून, पर्यावरण संरक्षण अधिनियम एवं ईआईए अधिसूचना का पूर्ण अनुपालन सुनिश्चित किया जाए। आदिवासी समुदायों की आजीविका, जल और वन सुरक्षा को प्राथमिक आधार बनाया जाए। सरकार को त्वरित एवं न्यायोचित निर्णय लेकर पर्यावरणीय संतुलन, संवैधानिक अधिकारों एवं जनहित की रक्षा की रक्षा करना चाहिए।

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बालाघाट का खनिज संपदा-समृद्ध इलाका रहा है, जिसमें विशेषकर तांम्बा और मैंगनीज़ खनन का लम्बा इतिहास है, लेकिन यह विकास आदिवासी जीवन पर जटिल प्रभाव भी छोड़ता आया है। यहां मैंगनीज़, बॉक्साइट, काइनाईट, मार्बल जैसे कई खनिज पाए जाते हैं, जिससे बड़े-पैमाने पर खनन गतिविधियां संचालित होती हैं।

बालाघाट जिला लगभग भारत में मैंनगनीज़ उत्पादन का करीब 80 प्रतिशत भाग प्रदान करता है।बड़े खनन परियोजनाओं और खनन पट्टों के विस्तार के कारण आदिवासी समुदायों के पारंपरिक कृषि-जमीनें और जंगल क्षेत्रों पर दबाव बढ़ा है। कई बार जमीनों का अधिग्रहण या अतिक्रमण उनके सहमति के बिना किया गया, जिससे भूमि-संबंधी विवाद और संघर्ष उभरे हैं। कुछ मामलों में किसान बड़ी कंपनियों द्वारा अनुमत खनन पट्टों के पास के कृषि भूमि पर भी अतिक्रमण का आरोप लगा चुके हैं। खुले खदानों, मिट्टी के हटाए जाने और जंगलों की कटाई से भूमि-क्षरण, जल स्रोतों का सूखना और पारिस्थितिकी तंत्र में गिरावट आई है। इससे पोषण-जनित कृषि प्रणाली पर सीधा प्रभाव पड़ा है।

जंगल और जंगल उत्पादन, जिन पर आदिवासी समुदायों के जीवन का बड़ा संसाधन रहा है, वे प्रभावित हुए हैं।व्यवसायिक खनन और बाहरी श्रमिकों के आवागमन ने स्थानीय सांस्कृतिक ढांचे को प्रभावित किया है, जिससे परंपरागत जीवनशैली में परिवर्तन आया है। बालाघाट में खनन-उद्योग ने क्षेत्र की अर्थव्यवस्था को मजबूती दी है और उत्पादन में योगदान किया है, लेकिन आदिवासी समुदायों पर इसका प्रभाव मिश्रित एवं चुनौतीपूर्ण रहा है।

भले-ही खनन आर्थिक गतिविधि के रूप में महत्वपूर्ण है, परन्तु इसके कारण पारंपरिक जीवनशैली में बदलाव,भूमि तथा संसाधन पहुंच का विवाद, पर्यावरणीय तनाव, सामाजिक और आर्थिक विभाजन आदि जैसी स्थितियां उभर कर आई हैं, जिनका समाधान सामुदायिक सहभागिता, पारदर्शी भूमि नीति, पर्यावरणीय सहायता और आदिवासी अधिकारों के संरक्षण से ही संभव है।

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