Sarvodaya Press Service

सर्वोदय प्रेस सर्विस – फीचर्स सेवा के छ: दशक

मिट्टी क्षरण और वर्षा पानी को रोकना मरुस्थलीकरण का समाधान

17 जून : विश्व मरुस्थलीकरण एवं सूखा रोकथाम दिवस

राज कुमार सिन्हा

मरुस्थलीकरण और भूमि क्षरण आज वैश्विक संकट बन चुके हैं, जो दुनिया की एक-तिहाई भूमि और अरबों लोगों की आजीविका को प्रभावित कर रहे हैं। भारत में स्थिति और भी गंभीर है, जहां 29% भूमि क्षरित हो चुकी है। कृषि, जैव विविधता और आजीविका पर इसका गहरा असर पड़ा है। अब जरूरी हो गया है कि हम टिकाऊ भूमि प्रबंधन और प्रकृति-आधारित समाधानों को प्राथमिकता दें।

शुष्क भूमि पारिस्थितिकी तंत्र, जो दुनिया की एक तिहाई से अधिक भूमि को कवर करता है, अत्यधिक दोहन और अनुचित भूमि उपयोग के लिए बेहद संवेदनशील है। मरुस्थलीकरण शुष्क, अर्ध-शुष्क और शुष्क उप-आर्द्र क्षेत्रों में मुख्य रूप से मानवीय गतिविधियों और जलवायु परिवर्तन के कारण होता है और दुनिया के सबसे गरीब लोगों को प्रभावित करता है। स्वस्थ भूमि संपन्न अर्थव्यवस्थाओं का आधार है। वैश्विक ‘सकल घरेलू उत्पाद’ (GDP) का आधे से अधिक हिस्सा प्रकृति पर निर्भर है। फिर भी हम इस प्राकृतिक पूंजी को खतरनाक दर से नष्ट कर रहे हैं। इससे जैव-विविधता का नुकसान होता है, सूखे का खतरा बढ़ता है और समुदाय विस्थापित होते हैं।

भूमि हमारी खाद्य प्रणालियों का आधार है, दुनिया का 95% भोजन कृषि भूमि पर उत्पादित होता है। हालांकि, इनमें से एक तिहाई भूमि क्षरित हो चुकी है। यह क्षरित भूमि दुनिया भर के 3.2 अरब लोगों को प्रभावित करती है, विशेष रूप से ग्रामीण समुदायों और छोटे किसानों को जो अपनी आजीविका के लिए भूमि पर निर्भर हैं। इससे उनकी भूख, गरीबी, बेरोजगारी और जबरन पलायन में वृद्धि होती है।

ऐसे में भूमि, मृदा और जल-संसाधनों का टिकाऊ प्रबंधन खाद्य उत्पादन बढ़ाने, पारिस्थितिकी तंत्र को संरक्षित करने, भूमि, मृदा और जल की गुणवत्ता में सुधार लाने तथा चरम मौसम की घटनाओं के प्रति ग्रामीण समुदायों को जागरूक करने की जरूरत है। वर्ष 1992 के रियो ‘पृथ्वी सम्मलेन’ के दौरान जलवायु परिवर्तन और जैव-विविधता के नुकसान के साथ मरुस्थलीकरण को सतत् विकास के लिये सबसे बड़ी चुनौतियों के रूप में पहचाना गया था। मरुस्थलीकरण, भूमि क्षरण और सूखा हमारे समय की सबसे गंभीर पर्यावरणीय चुनौतियों में से एक है। विश्व भर में 20 से 40% भूमि पहले से ही क्षरित है।

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‘संयुक्त राष्ट्र संघ’ के ‘पारिस्थितिकी तंत्र बहाली दशक, 2021-2030’ के आधे पड़ाव पर पहुंचने के साथ ही, हमें भूमि की बड़े पैमाने पर बहाली के प्रयासों में तेजी लाना होगा। 20 वीं सदी के बाद से, खनन, वनों की कटाई, अत्यधिक चराई, एकल कृषि, अत्यधिक जुताई और रासायनिक उर्वरकों और कीटनाशकों के उपयोग जैसे मानव निर्मित कारकों के कारण मिट्टी का क्षरण तेजी से बढ़ा है। कोलंबिया गणराज्य इस वर्ष 17 जून को ‘मरुस्थलीकरण और सूखा दिवस’ के वैश्विक आयोजन की मेजबानी करेगा, जो प्रकृति-आधारित समाधानों के माध्यम से भूमि क्षरण की समस्याओं को हल करने की प्रतिबद्धता को रेखांकित करता है।

बारिश और मिट्टी क्षरण के बीच सीधा संबंध है। यदि बारिश सामान्य से 1% अधिक रहती है तो मिट्टी क्षरण में 2% की बढ़ोतरी होती है। वैज्ञानिकों ने सन् 2050 तक बारिश में सामान्य से 10% बढ़ोतरी की आशंका जताई है, ऐसे में मिट्टी क्षरण और बढ़ सकता है। भारतीय मिट्टी सबसे कमजोर मिट्टी में से एक है। भारत में औसत मृदा-क्षरण प्रति वर्ष 20 टन प्रति हेक्टेयर है, जबकि वैश्विक औसत 2.4 टन प्रति हेक्टेयर प्रति वर्ष है।

भारत में मरुस्थलीकरण एक बड़ी समस्या है, जिससे देश की लगभग 29.32% भूमि क्षरण के दौर से गुजर रही है। राजस्थान, महाराष्ट्र और गुजरात में देश की करीब 50 प्रतिशत भूमि मरुस्थलीकरण से गुजर रही है। झारखंड में सर्वाधिक 68.77 प्रतिशत भूमि क्षरित हो चुकी है। 62 प्रतिशत क्षरित भूमि के साथ राजस्थान दूसरे स्थान पर है।

वर्ष 2003-05 में 9.45 करोड हेक्टेयर भूमि का क्षरण हुआ था जो 2018-19 में यह 9.78 करोड हेक्टेयर हो गया है। अर्थात लगभग 30 लाख हेक्टेयर अतिरिक्त भूमि पिछले 15 वर्षों में खराब हुई है। यह समस्या मुख्य रूप से जलवायु परिवर्तन, मानवीय गतिविधियों और प्राकृतिक आपदाओं के कारण होती है। इस समस्या के कारण भारत में बंजर भूमि का विस्तार हो रहा है, जिससे कृषि उत्पादकता कम हो रही है और गरीबी बढ़ रही है।

सन् 2025 की ‘नेचर’ पत्रिका में प्रकाशित वैज्ञानिक रिपोर्ट बताती है कि 2030 तक भूमि क्षरण पर ‘संयुक्त राष्ट्र संघ’ के एजेंडे को हासिल करने के लिए भारत को 77 ज़िलों में ‘गली इरोजन’ (भारी बारिश के दौरान मिट्टी के बह जाने की प्रक्रिया) को रोकने पर काम करना होगा। इस रिपोर्ट के मुताबिक “भारत के भूमि क्षरण उन्मूलन मिशन में गली इरोजन एक गंभीर बाधा है।” पश्चिम भारत में बंजर जमीनों की अधिकता है तो पूर्वी भारत में ‘गली इरोजन’ भूमि क्षरण में गंभीर बाधा पेश करता है।

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रिपोर्ट के अनुसार नाले का सबसे अधिक कटाव झारखंड और छत्तीसगढ़ में होता है। इसके बाद मध्यप्रदेश और राजस्थान का नंबर आता है। मरूस्थलीकरण से निपटने के लिए टिकाऊ भूमि प्रबंधन और चारागाहों के संरक्षण को बढ़ावा देना जरूरी है। इसमें वनस्पति आवरण की स्थापना, जंगल कटाई को रोकना, मिट्टी और जल-संरक्षण उपायों (जैसे चेक-डैम) को अमल में लाना, ‘गली इरोजन’ की भराई,  अपवाह को कमजोर करना और उनका रुख मोङना शामिल है।मिट्टी संरक्षण के लिए कम गहरी जुताई, मेड़बंदी, पट्टियों और सीढ़ीदार खेतों का उपयोग, कटाव को कम कर सकते हैं और पानी के बहाव को धीमा कर सकते हैं। बंजर भूमि की अधिकता वाले इलाकों में खराब भूमि में सुधार और उन्हें दोबारा उपजाऊ बनाने के लिए उपयुक्त नीतियां बनाना बहुत जरूरी है।

भारत को भूमि प्रबंधन की एक ऐसी नीति की आवश्यकता है जो बैड लैंड और कटाव बने नालों और जो समाज के साथ – साथ पर्यावरण पर उनके प्रभावों में स्पष्ट अंतर करती हो। भारत विश्व की 18% मानव आबादी और विश्व की 15% पशुधन आबादी का भरण-पोषण करता है, लेकिन उसके पास विश्व का केवल 2.4% भूमि क्षेत्र है। इसलिए देश को युद्ध स्तर पर बंजर होती जमीन को बचाना होगा। (सप्रेस)

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