Sarvodaya Press Service

सर्वोदय प्रेस सर्विस – फीचर्स सेवा के छ: दशक

डिंडोरी : समृद्ध जल संसाधनों के बीच प्यासा आदिवासी समाज

लेखक की फोटो

डिंडोरी को जल अभावग्रस्त घोषित किया जाना केवल प्रशासनिक आदेश नहीं, बल्कि गहराते जल संकट की गंभीर चेतावनी है। गिरते भूजल, सूखते स्रोतों और बढ़ती गर्मी के खतरे के बीच पानी के उपयोग पर नियंत्रण लागू किया गया है। आदिवासी बहुल इस जिले में पेयजल सुरक्षा अब सबसे बड़ी चुनौती बनकर उभरी है, जिससे जल प्रबंधन को लेकर नई बहस शुरू हो गई है।


मध्‍यप्रदेश के डिंडोरी को जल अभावग्रस्त जिला घोषित किया गया है। इसका मायने यह है कि जिले में मौजूदा वर्ष में पेयजल और सिंचाई के लिये उपलब्ध पानी की कमी का संकट गहराया है, खासकर आगामी ग्रीष्म ऋतु को ध्यान में रखते हुए। ऐसे में जल संसाधनों के विनियमन और उपयोग पर नियंत्रण लगाया गया है। यह आदेश 10 फरवरी से 30 जून 2026 तक लागू रहेगा, जिसमें पानी के अनावश्यक दोहन पर रोक और संरक्षण-उन्मुख व्यवहार सुनिश्चित करने का प्रयास किया जा रहा है। इसके साथ ही निजी नलकूप,बोरवेल एवं हैंडपम्प के लिए अनधिकृत खनन और ड्रिलिंग पर रोक जैसे कदम भी प्रशासन ने उठाए हैं ताकि जल स्तर और उपलब्धता को बचाया जा सके। डिंडोरी और आसपास के आदिवासी-ग्रामीण जिलों में पहले से भूजल स्तर गिर रहा है और पेयजल की उपलब्धता सीमित है। मौसमी स्रोतों पर अत्यधिक दबाव और वर्षाजल संचयन की कमी के कारण प्रशासन ने जल आपूर्ति सुनिश्चित करने के लिये इस आदेश का सहारा लिया है ताकि गर्मियों में लोगों को पीने के पानी की समस्याएं और गंभीर न हों।

मध्यप्रदेश को देश का सबसे बड़ा आदिवासी आबादी वाला राज्य कहा जाता है। आदिवासी समुदाय सदियों से जंगल, नदी और पहाड़ियों के साथ सहजीवन में रहे हैं। विडंबना यह है कि आज वही समुदाय पानी की सबसे गंभीर असुरक्षा का सामना कर रहा है। प्राकृतिक संसाधनों से भरपूर आदिवासी अंचल आज पानी के लिए जूझते दिखाई देते हैं। आदिवासी बहुल क्षेत्रों की भौगोलिक पृष्ठभूमि मध्यप्रदेश के झाबुआ, अलीराजपुर, धार, बड़वानी, मंडला, डिंडोरी, शहडोल, उमरिया, अनूपपुर, बालाघाट, सिंगरौली और शिवपुरी (सहरिया क्षेत्र) जैसे जिले मुख्यतः आदिवासी हैं। ये क्षेत्र या तो पथरीली पहाड़ियों, घने जंगलों या पठारी भूभाग पर बसे हैं, जहां जल का प्राकृतिक संचयन कठिन होता है।

See also  ब्राज़ील कोप सम्मेलन के मौके पर पर्यावणविद राजेंद्र सिंह की अमेज़न यात्रा

आदिवासी क्षेत्रों में पेयजल का मुख्य आधार झरने, छोटे नाले, कुएं और हैंडपंप हैं। गर्मियों में ये स्रोत सूख जाते हैं, जिससे कई गांवों में तीन–चार महीने गंभीर जल संकट रहता है।गहरे नलकूप आधारित जल व्यवस्था आदिवासी अंचलों के भूगर्भ के अनुकूल नहीं है। नतीजतन, बड़ी संख्या में हैंडपंप कुछ वर्षों में ही सूख जाते हैं, जिससे सरकारी निवेश व्यर्थ हो जाता है। कई आदिवासी क्षेत्रों में भूजल में फ्लोराइड, आयरन और नाइट्रेट की मात्रा अधिक पाई जाती है। इससे दंत रोग, हड्डियों की विकृति और पेट से जुड़ी बीमारियां आम हैं, लेकिन जांच और उपचार की सुविधाएं सीमित हैं। नर्मदा घाटी, सिंगरौली, बालाघाट और मंडला जैसे क्षेत्रों में बांध, खनन और औद्योगिक परियोजनाओं ने आदिवासियों को उनके पारंपरिक जल स्रोतों से अलग कर दिया है। विस्थापन के बाद बसाए गए गांवों में अक्सर स्थायी जल व्यवस्था नहीं होती, जिससे पानी की समस्या और गहरी हो जाती है।

जलवायु परिवर्तन के कारण अनियमित मानसून, कम अवधि में तेज़ वर्षा और लंबे सूखे ने आदिवासी कृषि और जल स्रोतों दोनों को प्रभावित किया है। पहले जिन झरनों में सालभर पानी रहता था, वे अब सिर्फ मानसून तक सीमित हो गए हैं।

आदिवासी समाज के पास पारंपरिक जल संरक्षण का समृद्ध ज्ञान रहा है,जैसे पहाड़ी ढलानों पर छोटे बांध, झिरिया, डबरा, जैसे स्थानीय जल ढांचे प्रमुख हैं। जंगल संरक्षण के माध्यम से जल संरक्षण की आधुनिक नीतियों में इस ज्ञान को नजर अंदाज किया गया, जिससे समाधान टिकाऊ नहीं बन पाए। इसलिए विकेंद्रीकृत जल प्रबंधन के अन्तर्गत ग्रामसभा आधारित जल योजना, जहां पानी को सामुदायिक संसाधन मानना, झिरिया, तालाब, झरनों और छोटे बांधों का संरक्षण, कम गहराई वाले कुएं, वर्षाजल संचयन और गुरुत्व आधारित जल प्रणालियां विकसित करने का प्रयास करना और जल समितियों में आदिवासी महिलाओं की निर्णायक भूमिका सुनिश्चित करने जैसे प्रयास प्रमुख हैं।

See also  यात्रा-वृत्तांत : अनोखी है बैतूल की भू-संस्कृति

मध्यप्रदेश के आदिवासी क्षेत्रों में पानी की समस्या केवल प्राकृतिक नहीं, बल्कि नीतिगत उपेक्षा और विकास के असंतुलित मॉडल का परिणाम है। जब तक आदिवासी समाज को जल प्रबंधन का केंद्र नहीं बनाया जाएगा, तब तक “हर घर जल” का सपना इन अंचलों में अधूरा ही रहेगा। आदिवासी समाज को पानी नहीं दिया जा रहा है, बल्कि उनसे उनका पानी छीना जा रहा है, यह सच्चाई स्वीकार किए बिना समाधान संभव नहीं है। 

मध्यप्रदेश में तेजी से गिरता भूजल न केवल किसान समुदाय के लिए चिंता का विषय है, बल्कि शहरी और ग्रामीण दोनों जीवन के लिए जल सुरक्षा संकट का संकेत देता है।मध्यप्रदेश में लगभग 58.75 से 60 प्रतिशत  भूजल का दोहन  हो चुका है, जो राज्य को बढ़ते जल संकट की ओर ले जा रहा है।कृषि के लिए भूजल उपयोग लगभग 90 प्रतिशत है, जबकि घरेलू उपयोग में 9 प्रतिशत और औद्योगिक उपयोग के लिए 1 प्रतिशत है। यह दर्शाता है कि कृषि आधारित भूजल दोहन सबसे बड़ा कारण है। ग्रामीण क्षेत्रों में पीने के लिए पानी के स्रोत खत्म होते जा रहे हैं, जिससे लोगों को बड़े-बड़े टैंकर और ट्यूबवेल पर निर्भरता बढ़ रही है।

मध्यप्रदेश के भूजल भंडार की गिरावट सामयिक समस्या नहीं, बल्कि दीर्घकालिक रणनीतिक आपदा बन चुकी है। केवल भूमि-स्तर पर नीतिगत संवर्धन, सूचना-आधारित प्रशासन और सामुदायिक भागीदारी से ही भविष्य में पानी की विश्वसनीयता सुनिश्चित की जा सकती है।

डिंडोरी में जल संकट ‘संभावना’ नहीं, ‘वर्तमान स्थिति’ बन चुका है। मानसून पर अत्यधिक निर्भरता और कमजोर रिचार्ज व्यवस्था असफल हो रही है। यदि अभी नियंत्रण नहीं किया गया, तो गर्मी के समय में पेयजल आपातकाल बन सकता है। यह पहली बार है जब प्रशासन ने पानी को कानून और अनुशासन के दायरे में लाने की कोशिश की है। यदि इस आदेश को केवल प्रतिबंध मानकर टाल दिया गया, तो संकट बढ़ेगा। लेकिन यदि इसे जल-अनुशासन की शुरुआत माना गया, तो डिंडोरी एक उदाहरण बन सकता है।

WhatsApp हमारे WhatsApp Channel को Join करें
See also  पर्यावरणविद ‘पानी वाले बाबा’ के नाम से ख्‍यात राजेंद्र सिंह बोले : इंदौर शहर के परंपरागत जल स्त्रोतों को प्रदूषण और अतिक्रमण से बचाएं, उन्हें पानीदार बनाएं

Table of Contents

अनशन से आगे का संघर्ष: सोनम वांगचुक से उठी एक ऐसी अपील, जिसने लोकतंत्र की आत्मा को छू लिया

लोकतांत्रिक आंदोलनों का इतिहास केवल संघर्षों का इतिहास नहीं है, बल्कि उन नैतिक दुविधाओं का भी इतिहास है, जहाँ एक ओर सिद्धांतों के लिए जीवन दांव पर लगा होता है और दूसरी ओर वही जीवन आंदोलन की सबसे बड़ी पूंजी

Read More »

सोनम वांगचुक :  अनशन नहीं, सत्ता का चरित्र बदला है

सोनम वांगचुक का आमरण अनशन अब केवल शिक्षा सुधार या एक मंत्री की जवाबदेही का प्रश्न नहीं रह गया है, बल्कि लोकतांत्रिक प्रतिरोध की प्रभावशीलता की भी परीक्षा बन चुका है। इसी बीच न्यायालय ने उनके जीवन की रक्षा को

Read More »

यात्रा-वृत्तांत : अनोखी है बैतूल की भू-संस्कृति

भारत की विविध भू-संस्कृतियों की खोज में बैतूल एक ऐसा पड़ाव है, जहाँ प्रकृति, लोकजीवन, आस्था और सामुदायिक संस्कृति एक-दूसरे में सहज रूप से घुली-मिली दिखाई देती हैं। यह यात्रा-वृत्तांत एक शोधार्थी की आँखों से बैतूल की सांस्कृतिक और प्राकृतिक

Read More »