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ब्राजील : जलवायु शिखर सम्मेलन कोप 30 और पृथ्वी की पुकार

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ब्राजील के बेलेम शहर में जलवायु पर शिखर सम्मेलन COP30 शुरू हो रहा है, जिसमें 200 देशों के 50,000 से अधिक प्रतिनिधि शामिल होंगे। सम्मेलन 10 से 21 नवंबर तक चलेगा और इसका मुख्य उद्देश्य जलवायु परिवर्तन से निपटना है।


दुनिया में पर्यावरण की चर्चा आज एक वैश्विक राजनीतिक भाषा बन चुकी है, लेकिन इसकी शुरुआत को याद करना भी उतना ही ज़रूरी है। वर्ष 1972 में स्टॉकहोम में पहला पृथ्वी शिखर सम्मेलन (अर्थसम्मिट) आयोजित हुआ था। तब हम विद्यार्थी थे। यहीं से “पर्यावरण” शब्द हमारे सार्वजनिक जीवन और नीति-चर्चाओं में आया। उस समय इस बात को समझाया गया कि प्रकृति केवल संसाधन नहीं, बल्कि जीवन का आधार है।

उसी सम्मेलन में भारत की प्रधानमंत्री श्रीमती इंदिरा गांधी ने विश्व समुदाय के सामने यह महत्वपूर्ण विचार रखा कि पर्यावरण और गरीब इंसान का रिश्ता सीधा और गहरा है। प्रकृति को होने वाला नुकसान सबसे पहले और सबसे ज्यादा गरीबों को प्रभावित करता है। क्योंकि वे जंगल, पानी, जमीन और जलवायु पर प्रत्यक्ष रूप से निर्भर होते हैं। उन्होंने यह भी कहा कि पर्यावरण की रक्षा और गरीबी के समाधान को अलग-अलग नहीं देखा जा सकता।

इंदिरा गांधी ने जंगलों और वन्य प्राणियों की रक्षा के लिए अनेक सशक्त कानून बनवाए। लेकिन इसी के बाद बड़ी कंपनियाँ एकत्रित होकर कहने लगीं कि पर्यावरण संरक्षण से उद्योग बंद हो जाएंगे। अगले 20 वर्षों में इन कंपनियों की आवाज और प्रभाव इतना बढ़ा कि 1992 में रियो डी जेनेरो में आयोजित दूसरे कोप में यह शक्ति खुलकर सामने आ गई।

रियो और हमारा जन-संघर्ष

1992 के रियो सम्मेलन में मैंने स्वयं भाग लिया। वहाँ मैंने देखा कि दुनिया भर के जन-नेता, आदिवासी समुदायों के प्रतिनिधि और स्थानीय समाज के कार्यकर्ता अपने जंगलों, नदियों और पंचमहाभूतों के अधिकार के लिए कितनी दृढ़ता से आवाज़ उठा रहे थे।

इससे पहले, 1991 में फ्रांस के राष्ट्रपति मित्रॉ ने हमें पेरिस बुलाया था। दस दिनों तक हमने छोटे-छोटे मंचों पर तरुण भारत संघ के अनुभव साझा किए। उस समय अरावली और सरिस्का क्षेत्र में खनन के विरुद्ध हमारा संघर्ष चरम पर था। समुदाय की शक्ति से चार राज्यों में अवैध खनन बंद करवाया जा चुका था। तरुण भारत संघ को उस समय पर्यावरण आंदोलन का एक प्रमुख योद्धा माना जाने लगा था।

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रियो सम्मेलन से लौटते हुए रास्ते में ही अरावली के खनन को रोकने की हमारी दूसरी बड़ी जीत मिली। यह लोक-शक्ति और जन-संगठन का समय था। उस समय भारत के प्रधानमंत्री पी.वी. नरसिंह राव ने भी रियो में कहा कि भारतीय संस्कृति में प्रकृति का सम्मान दैनिक जीवन के संस्कारों में है। उन्होंने स्मरण कराया:“समुद्रवसने देवि पर्वतस्तनमण्डले। विष्णुपत्नि नमस्तुभ्यं पादस्पर्शं क्षमस्व मे॥” यह केवल श्रद्धाभिव्यक्ति नहीं, बल्कि एक पर्यावरण-दर्शन है।

आंदोलनों, समुदायों और नदी का स्वर

अगले दशक में कोपेनहेगन और फिर 2002 में जोहांसबर्ग सम्मेलन हुए। जोहांसबर्ग में कमला चौधरी और नेपाल के उज्ज्वल प्रधान के साथ मुझे दस दिन तक रहने और अपने अनुभव रखने का अवसर मिला। हम “अर्थ चार्टर” लेकर गए थे, जिसमें समुदाय, व्यक्ति और संस्था की संयुक्त जिम्मेदारी का मार्ग था।

उसी समय तरुण भारत संघ ने यूएनडीपी के साथ मिलकर चंबल क्षेत्र में महिलाओं के नेतृत्व में जल संरक्षण का कार्य चलाया। यह उसी भूमि की कहानी है, जहाँ कभी हिंसक सीमा और भय का माहौल था। लेकिन जब महिलाओं ने जल-संरक्षण को हाथ में लिया, तो हिंसक अर्थतंत्र अहिंसक जीवन-तंत्र में बदलने लगा। खेतों में पानी लौटा, फसलें लौटीं, और मनुष्यता की गरिमा लौटी। यह प्रमाण है कि जब जीवन-तंत्र मजबूत होता है, तो शांति स्वतः आती है।

धीरे-धीरे अर्थसम्मिट का नाम बदलकर कोप (Conference of Parties) हो गया। मैं कई कोप सम्मेलनों में गया। लेकिन समय के साथ यह स्पष्ट होता गया कि कोप की प्रक्रिया अब अधिकतर उद्योग और वैश्विक कंपनियों के हित में झुकने लगी है। समुदायों की आवाज़ और उनकी सदियों की प्रकृति-समझ को कमतर आँका जाने लगा।

इजिप्ट के कोप 28 में हमने दुनिया के लगभग 200 आदिवासी प्रतिनिधियों के साथ मिलकर यह आवाज उठाई कि कोप में आदिवासी ज्ञान को उचित स्थान नहीं दिया जा रहा। सीनाई पर्वत के नीचे हमने स्थानीय समुदाय की महिलाओं के साथ मिलकर नदी पुनर्जीवन की प्रशिक्षण यात्रा शुरू की। वहाँ की महिला मोना ने इसे आगे बढ़ाया और आज वह कार्य एक जीवंत उदाहरण है कि समाधान जमीन पर पैदा होते हैं, कागजों और मंचों पर नहीं।

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ब्राज़ील में कोप — जंगल और जीवन के भविष्य पर प्रश्न

4 नवंबर को मैं ब्राज़ील पहुँचा। अब कोप की राजधानी ब्राज़ील का वैले क्षेत्र बनाया गया है। यह भी विडंबना है कि इस सम्मेलन स्थल के निर्माण में स्वयं जंगलों को काटा गया, जिससे भारी नुकसान हुआ।

अमेज़ॉन — जो विश्व की साँस है — अब अपने मध्य में होटल, सड़कें और छोटे-छोटे नए शहरों से घिरता जा रहा है। जंगल घट रहा है और उसके साथ वहाँ के समुदायों का जीवन-चक्र बदल रहा है।

6 नवंबर को अनामीदेवा शहर के सिटी हॉल में दुनिया भर के पर्यावरण कार्यकर्ताओं की बैठक हुई। हमने चर्चा की कि इस कोप में पर्यावरण की चिंता को केवल दस्तावेज़ों और घोषणाओं से आगे बढ़ाकर जमीन पर संघर्ष और समुदाय की भागीदारी की दिशा में लाया जाए। बातचीत में यह साफ सामने आया कि आज उद्योगपति, सरकारें और सत्ता एक ऐसा त्रिगुट बना चुके हैं जो आदिवासी समाजों और प्रकृति के विरुद्ध काम कर रहा है।

मैंने वहाँ बीज-विचार रखा कि हमें उस विकास के विकल्प की ओर लौटना होगा, जिसमें प्रकृति और संस्कृति एक-दूसरे की पोषक हों। केवल नारे और भाषण काम नहीं करेंगे। परिवर्तन वही करेगा जो तरुण भारत संघ ने किया — 50 वर्षों तक भूमि, जल और समुदाय के साथ निरंतर काम।

जलवायु का समाधान धरती पर है — कागज पर नहीं

2015 के पेरिस कोप में हमने दुनिया के सामने कहा था “जलवायु ही जल है — और जल से ही जलवायु है।” यह केवल वाक्य नहीं, बल्कि धरातल का अनुभव है। जलवायु परिवर्तन का समाधान न तो किसी तकनीकी युक्ति में है, और न अंतरराष्ट्रीय प्रतिज्ञाओं में यह मिट्टी, जल, जंगल और नदी के पुनर्जीवन में है।

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आगे का मार्ग — रचना और संघर्ष एक साथ

आने वाले समय में हमें एक साथ दो कार्य करने होंगे। पहला, रचना का, जिसमें हम जल-संरक्षण, मिट्टी की उर्वरता, जंगल की रक्षा और गाँवों की आजीविका को पुनर्जीवित करें। दूसरा, विनाशकारी विकास, खनन, अतिक्रमण और प्रदूषण के विरुद्ध शांतिमय सत्याग्रह और लोक-संगठन खड़ा करें। 1980–90 के दशक में अरावली में हमने यही किया। लोगों को तैयार किया। 7 मई 1992 को एक शांतिमय क्रांति ने खनन को रोका। यही मार्ग आज भी सबसे प्रभावी है।

ग्रीन जॉब — विकास का प्राकृतिक मॉडल

ग्रीन जॉब केवल हरित तकनीकी नौकरियाँ नहीं हैं। ग्रीन जॉब वह है जिसमें प्रकृति और मनुष्य दोनों सुरक्षित और समृद्ध होते हैं। जब गाँव में पानी लौटता है, खेती सुधरती है, जंगल सांस लेते हैं तो लोग शहर नहीं भागते, बल्कि गाँव में रहकर ही अपना जीवन रचते हैं। तरुण भारत संघ ने 50 वर्षों में 23 नदियों को पुनर्जीवित किया है। इसके बाद शहरों से लोग वापस गाँव लौटने लगे हैं। यह हरित आजीविका का जीवंत मॉडल है।

ब्राज़ील के लिए संदेश

अमेज़ॉन को बचाने के लिए केवल कानून नहीं, सांस्कृतिक और समुदाय-आधारित जैव विविधता की रक्षा का मार्ग अपनाना होगा। ब्राज़ील में कंपनियों ने बीजों के मूल अधिकार समुदाय से छीन लिए हैं। भारत अब भी बीज-स्वराज को जीवित रखे हुए है। यह वह सीख है जो ब्राज़ील और दुनिया, दोनों ले सकती हैं।

 ‘जय जगत’ की भूमि

आज हमें राजनीतिक नेतृत्व को स्पष्ट रूप से यह कहना होगा कि विकास प्रकृति और संस्कृति के विरोध में नहीं हो सकता। यदि पृथ्वी को बचाना है, तो हमें प्रकृति-सम्मत जीवन-तंत्र को पुनर्जीवित करना होगा। कोप का लक्ष्य तभी सार्थक होगा जब यह सम्मेलन समुदायों, नदियों, जंगलों और धरती की रक्षा का वास्तविक मंच बने। विनोबा भावे का नारा ‘जय जगत’ तभी सफल होगा, जब हम पूरी दुनिया में प्रकृति और मानवता के बीच विश्वास का यह सेतु फिर से खड़ा कर सकें।

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