Sarvodaya Press Service

सर्वोदय प्रेस सर्विस – फीचर्स सेवा के छ: दशक

नदी संसद-एक अनोखा संगम

हाल ही में मैं एक नदी संसद का साक्षी था, जहां दक्षिण एशिया की नदियाँ अपने साझा संकटों पर चर्चा करने जुटी थीं। इस अनोखे संगम की मेजबानी नर्मदा ने की, जो पूरे क्षेत्र की नदियों से समान दूरी पर है। आरंभिक समारोह में दिलचस्प बातें सामने आईं—जैसे सहायक नदियों की यह शिकायत कि मुख्य धारा में मिलकर वे अपनी पहचान खो देती हैं, या मुख्य नदियों का यह गिला कि सहायक नदियाँ कभी-कभी अत्यधिक वेग से बहकर संतुलन बिगाड़ देती हैं। वहीं दक्षिण की नदियाँ इस बात से क्षुब्ध थीं कि उत्तर की नदियों को अधिक महत्व दिया जाता है।

नर्मदा: भाइयो और बहनो, मैं इस प्राचीन भू-भाग की ओर से आपका अभिवादन करती हूं। आज हम न केवल नदियों के लिए, बल्कि सभी भू-भागों, महासागरों और उनके प्राणियों के लिए एकत्र हुए हैं। हमारा उद्देश्य उन समस्याओं को साझा करना है जिनका हम सभी सामना कर रहे हैं। विशेष रूप से जिस तरह से मनुष्य हमारे साथ व्यवहार कर रहे हैं। हमें यहां उनके समाधान के तरीके खोजना है।

यह एक साझा उद्देश्य है, इसलिए एक संयुक्त मोर्चे के रूप में हम जो हासिल कर सकते हैं, उस पर ध्यान केंद्रित करें। इसका मतलब यह नहीं है कि हम अपनी व्यक्तिगत पहचान खो दें – हम एक-दूसरे से कई प्रकार से भिन्न हैं, लेकिन कुछ चीजें हैं, जो हमें एक साथ बांधती हैं। इनमें वे तरीके भी शामिल हैं, जिनसे हम उन भू-भागों का पोषण करते हैं, जिनसे हम गुजरते हैं और वे समुद्र या झीलें, जिनमें हम मिलते हैं। अब, मैं गंगा से चर्चा शुरू करने का आह्वान करती हूं।

 कावेरी : नर्मदा, मैं आपकी बातों की सराहना करती हूं, लेकिन निश्चित रूप से आपको हमारी पीड़ा के प्रति संवेदनशील होने की आवश्यकता है। उत्तरी नदियों को हमसे अधिक महत्व मिलता रहा है, पर कभी-कभी, हमें भी पहले बोलने का मौका मिलना चाहिए!

नर्मदा: क्षमा करें, कावेरी। मुझे यकीन है कि गंगा को कोई आपत्ति नहीं होगी – कृपया अपनी बात रखें।

 कावेरी: शुक्रिया! जैसा कि आप सभी जानते हैं, मनुष्य दशकों से मेरे पानी के लिए लड़ रहे हैं – लगता है उन्हें प्रकृति की कृपा को बांटना ही नहीं आता। इससे भी बुरी बात यह है कि वे मेरी दुर्दशा से बेखबर हैं। मैं बांधों, प्रदूषण से परेशान हूं और सोचती हूं कि मेरे अपने बच्चे मेरे साथ कैसा व्यवहार कर रहे हैं। उन्होंने अपने झगड़े को सुलझाने के लिए एक न्यायाधिकरण भी बनाया है, लेकिन मुझे अपनी चर्चाओं में शामिल होने के लिए आमंत्रित नहीं किया! मैं बस यही प्रार्थना कर सकती हूं कि उन्हें सद्बुद्धि आए।

 सिंधु : माफ़ करना, मुझे देर हो गई। मुझे अपने अलग-अलग हिस्सों से, खासकर भारत और पाकिस्तान की इंसानी सीमाओं के पार, खुद को इकट्ठा करने में थोड़ा वक़्त लगा। सबको जुले और आदाब! कई सालों में ये इंसानी देश मेरे और मेरी सहायक नदियों के पानी के बंटवारे पर एक समझौते पर पहुंचे थे। अब वे फिर से लड़ रहे हैं, भारत मुझे पाकिस्तान में बहने से पहले ही रोकने की धमकी दे रहा है – मानो वो ऐसा कर सकता है ! लेकिन जानते हो…

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 कृष्णा (बात काटते हुए) : अरे भाई, नर्मदा ने हम दक्षिणी नदियों को पहली आवाज़ दी है, हमें पहले बात करने दो!

 सिंधु : ओह, माफ़ी कीजिए! मैं अपनी बात बाद में पूरी करूंगी।

 कृष्णा : तुम सबको लगता है कि तुम्हें कोई समस्या है? मुझ पर और मेरी सहायक नदियों पर एक दर्जन से ज़्यादा बांध हैं, मेरा पानी मुश्किल से समुद्र में जा पाता है – जो इसकी शिकायत करता रहा है। शायद अगली बार हमें उसे भी बुलाना चाहिए। प्रदूषण की वह मात्रा जो मुझे घुटन देती है, उसे देखने के बाद ही यकीन होता है। मुझे बताया गया है कि मेरे तटों पर रहने वाले लोग मुझे पवित्र मानते हैं, लेकिन मेरे प्रति उनका व्यवहार बिल्कुल सम्मानजनक नहीं है!

 गंगा: सबसे पहले, मैं अपने दक्षिणी भाइयों, बहनों से क्षमा चाहती हूं – इंसानों द्वारा मुझ पर दिया गया ध्यान मेरी वजह से नहीं है। कृष्णा की तरह वे मुझे भी पवित्र कहते हैं। शुरू में मैं इस बात से बहुत खुश थी कि वे मेरी प्रार्थना करते थे और प्रशंसा में स्तुति-ग्रंथ लिखते थे, लेकिन जल्द ही यह सब मुझे थका देने वाला लगा। अब मैं चाहती हूं कि वे मुझे अकेला छोड़ दें।

सम्मान तो छोड़ो, उन्होंने मुझे और आपमें से कई नदियों को बांधकर भटका दिया है। प्रदूषण के भयावह प्रभावों का वर्णन करने के लिए मेरे पास शब्द नहीं हैं। इंसानों का अजीब तरीका होता है। जिन्हें वे पवित्र मानते हैं उसे भयानक गंदा कर देते हैं ! मैं अब नदी नहीं रही। मुझे शर्म आती है कि मैं उन ज़मीनों को पोषित करने में असमर्थ हूं, जिन्हें पहले पोषित करती थी। मेरे जलक्षेत्र में हमेशा से खेलने वाली डॉल्फिनों के अस्तित्व पर खतरा मंडरा रहा है।

ब्रह्मपुत्र: दोस्तो, मेरी दुर्दशा पर भी विचार करें। खुद को चीन कहने वाला देश, यारलोंग त्सांगपो नदी पर, सियांग बनने से पहले, एक विशाल जलविद्युत परियोजना बनाने जा रहा है। सियांग,  मुझे अपना पानी देती है। अगर चीन इन योजनाओं पर आगे बढ़ता है, तो मेरी सेहत को बहुत नुकसान पहुंचेगा। शायद मेरे रास्ते में बहुत कम पानी और गाद बहेगी। मेरे अविरल जल पर निर्भर सभी प्राणी प्रभावित होंगे।

महाकाली/ शारदा : यह इंसानों द्वारा हमें उन क्षेत्रों में बांटने का नतीजा है, जिन्हें वे देश कहते हैं। उन्होंने मेरे दो नाम रखे हैं – नेपाल में एक और भारत में दूसरा और दोनों देशों के बीच की सीमा बनाकर अब मेरे पानी के लिए लड़ रहे हैं! सिंधु का भी ऐसा ही है। वह सिंघे खबाब, इन्डस और अलग-अलग हिस्सों में सिंधु बुलाई जाती है।  

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 तीस्ता : दोस्तो, हमें और ज़्यादा आक्रामक कार्रवाई करनी होगी। मैंने ग्लेशियर की मदद से उन बांधों में से एक को तोड़ दिया, जो उन्होंने मेरे रास्ते में बनाए थे। तुम सबको ऐसा करने की ताकत और हिम्मत जुटानी होगी। मुझे पता है कि इस प्रक्रिया में जानें जाएंगी, लेकिन उन सभी ज़िंदगियों के बारे में भी सोचो जो बच जाएंगी!

 सिंधु : मुझे लगता है, ये अच्छा विचार है। मैंने उनके बनाए एक बांध को बर्दाश्त कर लिया है, अब और बर्दाश्त नहीं करूंगी।

 कोसी : तुम्हें पता है कि बेवकूफ इंसान तटबंध बनाकर मेरे प्रवाह को रोकने की कोशिश करते हैं, लेकिन मैं उन्हें बार-बार तोड़ देती हूं। मैं क्यों न चंचल बनी रहूं, अपनी मर्ज़ी से बहती रहूं?

 साबरमती: मैं ऐसी हिंसक कार्रवाइयों का समर्थन नहीं करती। तुम्हें पता है, मैं हमेशा अपने अंदर और आसपास रहने वाले जीवों के साथ शांतिपूर्ण सह-अस्तित्व में विश्वास करती रही हूं। गांधी, जिन्होंने मेरे तट पर अपना घर बनाया और अहिंसा का संदेश फैलाया – हर दिन मेरे तट पर ध्यान और प्रार्थना करते थे, जिससे हमको शांति मिलती थी। मैं उसका अपमान कैसे कर सकती हूं, यह जानते हुए कि दूसरे इंसानों के लिए भी उनके जैसा होना संभव है?

 सियांग : देखो, उन्होंने तुम्हारे साथ क्या किया! तुम्हारा ज़्यादातर पानी नर्मदा से आता है, तुम अब साबरमती भी नहीं रही! मुझे बताया गया है कि उन्होंने तुम्हें सीमेंट-कंक्रीट से भी बांध दिया है, जिसे वे ‘रिवरफ्रंट डेवलपमेंट’ कहते हैं?

 साबरमती: हां, तुम सही कह रही हो। पहले तो उन्होंने अरावली की पहाड़ियों को नष्ट कर दिया, जहां बारिश होती है और मेरे रास्ते में आती है। उन्होंने मुझे नर्मदा का पानी पिलाकर मेरी पहचान मिटा दी – और फिर उन्होंने मुझे दो दीवारों के बीच बांध दिया। कोसी की तरह, मुझे अभी तक उन्हें तोड़ने की ताकत नहीं मिली है।

 नर्मदा : साबरमती, मैं तुम्हारा दर्द समझती हूं। मेरे लिए भी यह कम दर्दनाक नहीं था। तुम्हें पानी पहुंचाने के लिए, उन्होंने मुझे एक विशाल बांध में जकड़ दिया और मेरे कई तटवर्ती रहवासियों को वहां से चले जाने पर मजबूर कर दिया। उनकी ज़मीनें और घर डूब गए थे। मुझे इस बात का दुःख है कि मेरे पानी ने उन्हें इतना दुख पहुंचाया।

 इंद्रावती : मुझे लगता है कि हमें इंसानों के संवेदनशील तबकों से मदद की अपील करनी चाहिए। कई साल पहले, मेरे तटों पर बसे लोगों ने मानव श्रृंखला बनाकर मुझ पर प्रस्तावित दो विशाल बांधों का विरोध किया था। वे इसमें सफल रहे, वरना मैं भी रोक दी जाती, जैसा कि आपमें से कईयों के साथ हुआ है। कोयल और कारो के साथ भी यही हुआ था। मुझे पता है कि कई इंसानों ने नर्मदा पर बांध रोकने की कोशिश की थी। वे सफल नहीं हुए, लेकिन उनके संघर्ष ने कई और इंसानों को हमारा साथ देने और कई नदियों को आज़ादी का सपना देखने के लिए प्रेरित किया।

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राथोंग चू : हां, मेरे साथ भी कुछ ऐसा ही हुआ था। कुछ मानव समुदायों ने, जो मुझे पवित्र मानते हैं, दूसरे इंसानों को बांध बनाने से रोका था, लेकिन अब उन्हें अपना विरोध जारी रखना मुश्किल हो रहा है।

 केन : मैंने कुछ इंसानों को हमें एक विशाल माला में बांधने की बात करते सुना है – क्या तुम्हें लगता है कि यह एकजुट होने का अच्छा तरीका होगा?

 गोदावरी : बिल्कुल नहीं केन! इस तथाकथित ‘नदी जोड़ो परियोजना’ का मतलब होगा और भी कई बांध, जो हमारे प्रवाह को रोकेंगे, हमारी विशिष्ट पहचान मिटा देंगे, हमारी कहानियों को आपस में मिला देंगे और समुद्रों के साथ हमारे मिलन में बाधा डालेंगे। यह एक विनाशकारी विचार है!

केन : हमें यकीन नहीं है कि हम यही चाहते हैं। हमें गलत मत समझिए, हम एक-दूसरे से प्यार करते हैं, लेकिन जिस तरह से वे यह कर रहे हैं, बड़े-बड़े निर्माण के ज़रिए, मलबा और धूल उड़ाते हुए और हमसे पूछे बिना… हमें डर लगता है।

 गंगा : एक और रणनीति काम कर सकती है, अगर हम अपने मानव मित्रों का ध्यान इस ओर आकर्षित कर सकें। कुछ समय पहले, एक दूरदर्शी व्यक्ति ने न्यायालय में घोषणा की थी कि यमुना और मेरे पास एक नदी के समान अधिकार हैं – वही अधिकार जो एक इंसान के पास होते हैं। दरअसल, मैंने दुनिया के कई हिस्सों में, जिन्हें न्यूज़ीलैंड, कोलंबिया, कनाडा और बांग्लादेश कहते हैं – अपने भाइयों और बहनों से सुना है कि उनके अधिकारों को भी मान्यता दी गई है।

तुराग : हां, दोस्तो, बांग्लादेश की एक मानव अदालत ने मेरे और मेरे सभी बहनों, भाइयों के अधिकारों को भी मान्यता दी है। हमें अभी भी पूरी स्पष्टता नहीं है कि इसका क्या मतलब है, यह इंसानों के बांधों और प्रदूषण को हमें तबाह करने से कैसे रोकेगा, लेकिन हम आशान्वित हैं।

नर्मदा : यह कितना अजीब है कि हमें इंसानों से अपने अधिकारों को पहचानने का आग्रह करना पड़ रहा है, जबकि हमने ही उन्हें जन्म दिया है! लेकिन हम जो कर सकते हैं, करें। इस तरह एकजुट हों और जितनी भी रणनीतियां हम सोच सकते हैं, उनका इस्तेमाल करें। मैं यह हर किसी की बुद्धि व दिल पर छोड़ती हूं कि वह सबसे प्रभावी कदम क्या है, जिससे किसी भी जीव को कम-से-कम नुकसान हो।

गांधी, जिनके बारे में साबरमती ने बात की थी, कहते थे कि कायरतापूर्वक भागने से अच्छा है सामना करना। तो आइए हम सब मिलकर वह करें जो हम कर सकते हैं, कुछ मनुष्यों द्वारा हम पर लगाए गए अभिशाप को दूर करने के लिए ! (सप्रेस)  (बाबा मायाराम द्वारा अनुवादित)

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