Sarvodaya Press Service

सर्वोदय प्रेस सर्विस – फीचर्स सेवा के छ: दशक

बालाघाट में आदिवासी समाज का दो दिवसीय ‘घेरा ड़ालो-डेरा डालो’ आंदोलन शुरू

वनग्रामों के विस्थापन के खिलाफ जनसंघर्ष का आह्वान

बालाघाट, 8 अक्‍टूबर। वन ग्रामों  को विस्थापित किए जाने सहित जल, जंगल, जमीन और प्रशासनिक मुद्दों को लेकर जन संघर्ष मोर्चा महाकौशल के बैनर तले आज से दो दिवसीय घेरा डालो- डेरा डालो आंदोलन की शुरुआत हुआ। जिसमें समस्त आदिवासी समाज संगठन के आह्वान पर बालाघाट, मंडला और डिंडोरी के वन ग्रामों में रहने वाले ग्रामीण जिला मुख्यालय पहुंचकर जनसुनवाई में शामिल हुए। इस दौरान अंबेडकर चौक में जनसुनवाई का आयोजन कर विभिन्न क्षेत्रों से आए ग्रामीणों से उनकी समस्याएं जानकर अधिकारियों के समक्ष रखा ताकि उनके निराकरण की कोशिश की जाएगी। वहीं 9 अक्टूबर को इन तीनों ही जिले के आदिवासियों से आई समस्याओं, जल जंगल जमीन से जुड़े मुद्दे, मुआवजा और वन ग्रामों से आदिवासी समाज के लोगों के विस्थापन जैसे विभिन्न मुद्दों को लेकर ज्ञापन सौंपकर इस आंदोलन का समापन किया जाएगा। 

यह आंदोलन किसी एक संगठन का नहीं बल्कि आदिवासी के सभी संगठनों का है। मध्यप्रदेश आदिवासी एकता महासभा,  चुटका परमाणु विरोधी संघर्ष समिति, मध्य प्रदेश किसान संगठन, मध्य प्रदेश आदिवासी विकास परिषद, बरगी बांध विस्थापित और प्रभावित संघ, पेसा सशक्तिकरण मिशन मध्यप्रदेश टीम बालाघाट, सर्व आदिवासी समाज संगठन बालाघाट सहित अन्य संगठनों द्वारा उक्त मुद्दे पर जन संघर्ष मोर्चा महाकौशल के बैनर तले यह आयोजन किया गया था।

उपस्थित लोगों ने कहा कि वन अधिकार देने की बजाय जमीन से बेदखली की कार्यवाही को हम बर्दाश्त नहीं करेंग महाकौशल के बालाघाट, सिवनी, मंडला, डिंडोरी जबलपुर जिले में वन ग्रामों और परियोजनाओं से विस्थापन, प्राकृतिक संपदा की लूट, वन विभाग की तानाशाही और प्रशासनिक अनियमितताओं के खिलाफ संघर्ष तेज करने की बात कही गई।

See also  9 से 24 जून तक ‘जन स्वाभिमान यात्रा’ गुजरेगी बालाघाट और मंडला बहुल गांवों से

दरअसल क्षेत्र में लघु और गौण खनिज संपदा, जंगल और जमीन प्रचुर मात्रा में है। हमारी इन संसाधनों को लूटने की पूंजीपतियों खुली छूट दी जा रही है। इससे हमारा जीवन जीना कठिन और दुखदाई होता जा रहा है। देश–प्रदेश में जहां मंत्रीमंडल हमारे संवैधानिक अधिकारों के लिए नियम कायदे और नीतियां बना रहा है, वहीं प्रशासन में बैठे अधिकारी कर्मचारी अपनी जिम्मेदारयां ठीक तरह से नहीं निभा रहे हैं।

बताया गया कि बैहर क्षेत्र के 55 वनखंडों को रिजर्व फॉरेस्ट में बनाने के खिलाफ हैं। शासन प्राकृतिक संपदा का पूंजीपतियों के हाथों अंधाधुंध दोहन कर रही है वहीं श्रमिकों का शोषण हो रहा है।

 जनसुनवाई में तमाम प्रकार के मुद्दों और अन्याय पीड़ित जनों की सुनवाई की गई।

कार्यक्रम में मध्य प्रदेश आदिवासी विकास परिषद अध्यक्ष दिनेश धुर्वे, जन संघर्ष मोर्चा महाकौशल के विवेक पवार,केंद्रीय कमेटी के सदस्य राम नारायण कुररिया, बरगी बांध विस्थापित एवं प्रभावित संघ के राज़ कुमार सिन्हा, जिला पंचायत सदस्य मंशा राम मंडावी, अंजना कुररीया सहित अन्य पदाधिकारियों सभा को संबोधित किया।

पूंजीपतियों के हाथों में जंगल सौंपने की हो रही तैयारी

आज वन विभाग और राजस्व विभाग के आंकड़ों में भ्रांतियां हैं, जिसे दूर करने की आवश्यकता है। वनांचल क्षेत्र में तेजी से विस्थापन की प्रक्रिया हो रही है, सरकार पूंजीपतियों का साथ देते हुए ग्रामीणों  को विस्थापित कर रही है। संगठन ने प्रशासन से राजस्व और वन विभाग के अधिकारियों को भी जनसुनवाई में शामिल होने के लिए आमंत्रित किया गया था। रिजर्व फारेस्ट के लिए बैहर क्षेत्र के 55 गांवों को विस्थापित करने की प्रक्रिया चल रही है। इस पर लोगों ने आपत्ति जताई है। इससे आदिवासियों के अधिकार समाप्त हो जाएंगे। घोषणा प्रारूप में स्पष्ट है कि रिजर्व फारेस्ट होने के बाद  प्रवेश का अधिकार खत्म हो जाएगा। प्रशासन कह रहा है कि ऐसा नहीं होगा, लेकिन प्रारूप को हम कैसे झुठला सकते हैं।

See also  वन अधिकार कानून और वन संरक्षण अधिनियम आदिवासी हितों का पूरक

वनाधिकार अधिनियम 2006 में आदिवासी ग्रामीणों को वन भूमि का पट्टा देने के बजाय सरकार उन्हें उनकी ही जमीन से बेदखली का अभियान चलाना चाहती है। सरकार जमीन की लूट के लिए पूंजीपतियों को छूट दे रही है। प्राकृतिक संपदा का बुरी तरह दोहन हो रहा है। हमारी मांग है उक्त कानून का रद्द किया जाए, विस्थापन नीति के तहत आदिवासियों का विस्थापन ना किए, साथ ही उनकी समस्याओं मांगों, पूर्व के मुआवजे और पट्टो की प्रकिया पूरी कर, हमें न्याय दिलाया जाए।

राज कुमार सिन्हा ने कहा कि जब पूरा जंगल ही वन अधिकार कानून 2006 के अन्तर्गत सामुदायिक वन अधिकार में शामिल होने वाला है, तो वन विभाग द्वारा ‘वन व्यवस्थापन’ की प्रक्रिया चलाने का कोई औचित्य नहीं है।

Table of Contents

अनशन से आगे का संघर्ष: सोनम वांगचुक से उठी एक ऐसी अपील, जिसने लोकतंत्र की आत्मा को छू लिया

लोकतांत्रिक आंदोलनों का इतिहास केवल संघर्षों का इतिहास नहीं है, बल्कि उन नैतिक दुविधाओं का भी इतिहास है, जहाँ एक ओर सिद्धांतों के लिए जीवन दांव पर लगा होता है और दूसरी ओर वही जीवन आंदोलन की सबसे बड़ी पूंजी

Read More »

सोनम वांगचुक :  अनशन नहीं, सत्ता का चरित्र बदला है

सोनम वांगचुक का आमरण अनशन अब केवल शिक्षा सुधार या एक मंत्री की जवाबदेही का प्रश्न नहीं रह गया है, बल्कि लोकतांत्रिक प्रतिरोध की प्रभावशीलता की भी परीक्षा बन चुका है। इसी बीच न्यायालय ने उनके जीवन की रक्षा को

Read More »

यात्रा-वृत्तांत : अनोखी है बैतूल की भू-संस्कृति

भारत की विविध भू-संस्कृतियों की खोज में बैतूल एक ऐसा पड़ाव है, जहाँ प्रकृति, लोकजीवन, आस्था और सामुदायिक संस्कृति एक-दूसरे में सहज रूप से घुली-मिली दिखाई देती हैं। यह यात्रा-वृत्तांत एक शोधार्थी की आँखों से बैतूल की सांस्कृतिक और प्राकृतिक

Read More »