‘पेसा’ की पहल से बढ़ेगा जनजातियों का गौरव

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लगभग तीन दशक पहले भारत की संसद ने आदिवासी इलाकों के लिए एक बेहद जरूरी कानून ‘पेसा’ पारित किया था। इसमें आदिवासी समाज को उनकी पारंपरिक स्वायत्तता और उसी के मुताबिक आसपास के संसाधनों को वापरने की अनुमति दी गई थी, लेकिन आज के विकासवादी राजनेताओं, पूंजीपतियों और नौकरशाहों को यह कतई मंजूर नहीं था। आखिर क्या है, ‘पेसा’ की अहमियत?


1 से 15 नवंबर : जनजातीय गौरव दिवस पखवाड़ा 

वर्ष 2021 में घोषित 15 नवंबर के ‘जनजातीय गौरव दिवस’ को इस वर्ष एक से 15 नवंबर के बीच ‘जनजातीय गौरव वर्ष पखवाड़ा’ के रूप में मनाने की घोषणा की गई है। यह दिवस भगवान बिरसा मुंडा की जयंती (15 नवंबर 1875) के अवसर पर मनाया जाता है। यह केवल स्मरण-दिवस नहीं, बल्कि नीति निर्माण में आदिवासी दृष्टिकोण को केंद्र में लाने का अवसर है। समय आ गया है कि आदिवासी दृष्टिकोण को सही मंशा के साथ संवैधानिक प्रावधानों में लागू किया जाए।

उल्लेखनीय है कि केंद्र सरकार ने संविधान के भाग-9 के अनुच्छेद-243 से जुड़े ‘पंचायत उपबंध (अनुसूचित क्षेत्रों का विस्तार) अधिनियम,1996’ अर्थात ‘पेसा कानून’ बनाया था। 24 दिसंबर 1996 से प्रभावी यह कानून विशेष रूप से ‘अनुसूचित क्षेत्रों’ के लिए बनाया गया था, जहां सामान्य ‘पंचायती राज व्यवस्था’ सीधे लागू नहीं की जा सकती थी। 73 वें ‘संविधान संशोधन अधिनियम, 1992’ में पंचायतों के गठन, शक्तियां और कार्यप्रणाली का उल्लेख तो किया गया है, परंतु प्रावधान किया गया है कि ‘यह भाग अनुसूचित क्षेत्रों और आदिवासी क्षेत्रों पर लागू नहीं होगा।’ इसलिए इन क्षेत्रों के लिए अलग से कानून बनाने की आवश्यकता हुई।

‘पांचवीं अनुसूची’ में दिए गए प्रावधान ‘अनुसूचित क्षेत्रों’ और वहां के जनजातीय समुदायों के प्रशासन से संबंधित हैं। इसी के तहत राष्ट्रपति को अधिकार है कि वे इन क्षेत्रों के लिए विशेष प्रावधान करें। इन्हीं संवैधानिक प्रावधानों के आधार पर भारत सरकार ने ‘पेसा कानून’ लागू किया था जो आदिवासी क्षेत्रों में स्थानीय स्वायत्त सरकार की सशक्त नींव रखता है। यह संविधान के स्वशासन और आत्मनिर्णय के सिद्धांत को साकार करने की दिशा में एक ऐतिहासिक कदम है। राज्य सरकार को ‘अनुसूचित क्षेत्रों’ में रहने वाले आदिवासी समुदायों को स्वशासन का अधिकार देना है, अर्थात ग्रामसभा को निर्णय लेने की सर्वोच्च इकाई बनाना है।  

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‘अनुसूचित क्षेत्रों’ में ‘ग्राम सरकार’ और ‘जिला स्वायत्त परिषदें’ केवल प्रशासनिक ढांचे नहीं हैं, बल्कि आदिवासी समुदायों के सांस्कृतिक अस्तित्व, आत्मनिर्णय और सतत विकास के संवैधानिक साधन हैं। स्थानीय स्वायत्तता में प्रमुख हैं – ग्रामसभा को भूमि, जल, वन संसाधनों के उपयोग, प्रबंधन और संरक्षण में निर्णय लेने का अधिकार और स्थानीय विकास योजनाओं की स्वीकृति और निगरानी का अधिकार, संसाधनों का प्रबंधन, लघु वनोपज, जलस्रोत, खनिज, चारागाह, ईंधन, मछली पालन आदि पर सामुदायिक नियंत्रण। परंपरागत न्याय व्यवस्था के अनुसार ग्रामसभा विवादों को निपटा सकती है। ग्रामसभा की अनुमति के बिना भूमि हस्तांतरण या अधिग्रहण नहीं किया जा सकता। ग्रामसभा से अनिवार्य परामर्श के बिना कोई विकास परियोजना शुरू नहीं की जा सकती।

‘भारत जन आंदोलन’ के विजय भाई कहते हैं कि ‘पांचवीं अनुसूची’ के ढांचे में केन्द्र और राज्य सरकारों तथा राज्यपालों को ‘कृपालु पालनकर्ता’ जैसा बनाया गया है। उनके मन में आया तो कोई कानून बनाएं, नहीं तो नहीं भी बनाएं, लेकिन संसद ने जो ‘पेसा कानून’ बनाया है वह ‘पांचवीं अनुसूची’ के ‘कृपालु पालनकर्ता’ की बजाए एक स्वशासी, स्वाभिमानी ढांचे को स्थापित करता है। यह राज्य और केन्द्र सरकारों, राज्यपालों के विवेक पर निर्भर नहीं है। यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि ‘पांचवीं अनुसूची’ के क्षेत्रों में ‘पेसा कानून’ लागू होने के करीब 29 वर्षों बाद भी कुछ राज्यों ने इसके नियम नहीं बनाए हैं।

‘पेसा कानून’ का अर्थ है – ‘स्थानीय स्वायत सरकार।’ संविधान की ‘सातवीं अनुसूची’ के मुताबिक राज्य विधानमंडल को इस हेतु कानून बनाना पड़ेगा। प्रश्न उठता है कि संसद ने तब नियम क्यों नहीं बनाए? ‘पांचवीं अनुसूची’ के पैरा-3 के तहत संसद ने जो ‘पेसा कानून’ बनाया है, वह सिर्फ राज्य को निर्देश है। उससे ज्यादा संविधान इजाजत नहीं देता। संसद ने जो ‘पेसा कानून’ बनाया है वह केवल ‘अनुसूचित क्षेत्र’ में संविधान के भाग-9 को विस्तार देते हुए निर्देशित करता है कि राज्य सरकार कानून बनाकर उसे लागू करे। सवाल उठता है कि राज्य ने अब तक कानून क्यों नहीं बनाए?

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राज्य सरकारों ने ‘पंचायत राज कानून’ को ‘पेसा’ से जोड़ते हुए कुछ मामूली कानूनों में थोड़ा संशोधन कर नियम बना दिए थे। ‘पांचवीं अनुसूची’ क्षेत्र के 10 प्रदेशों में 1997 तक कुछ-न-कुछ नियम बनाए गए थे, लेकिन ग्रामसभा का अधिकार क्षेत्र व्यापक नहीं था। अब सरकार ग्रामसभा को थोड़ा कार्यभार देने की जुगत में है, लेकिन वह ‘पेसा’ सम्मत स्वशासी हो ही नहीं सकता, क्योंकि मूल कानून ‘पंचायत राज कानून’ ही है। हम कितना भी प्रयास कर लें, ग्रामसभा को सक्षम कर ही नहीं सकते, क्योंकि वह स्वशासी नहीं है। ‘अनुसूचित क्षेत्र’ में ‘पंचायत राज कानून’ लागू करेंगे तो वह संविधान सम्मत नहीं हो सकता। ‘पंचायत राज कानून’ संविधान की ‘सातवीं अनुसूची’ के तहत है इसलिए हर वाक्य में अंग्रेजी भाषा का ‘मे’ (एमएवाई) शब्द उपयोग किया गया है, अर्थात इसे लागू करना राज्य सरकार के ‘विवेक’ पर निर्भर है।

‘पेसा कानून’ संविधान की ‘पांचवीं अनुसूची’ से निकालकर भाग-9 में प्रस्तावित है, जहां राज्य सरकार को ‘विवेक’ जैसा कोई बहाना नहीं है। इसलिए ‘पेसा कानून’ के हर वाक्य में अंग्रेजी के ‘शैल’ (एसएचएएलएल) शब्द का उपयोग किया गया है जो बाध्यकारी है। सामान्य क्षेत्रों में एक समान ‘पंचायती राज व्यवस्था’ चलेगी, लेकिन अनुसूचित क्षेत्रों के लिए अलग ढांचा आवश्यक होगा। इसलिए संसद को यह संवैधानिक अधिकार दिया गया कि वह अनुसूचित क्षेत्रों में पंचायतों की विशेष व्यवस्था बनाए। इसका अभिप्राय था कि ‘जनजातीय और अनुसूचित क्षेत्रों में स्थानीय स्वशासन लागू करने के लिए, उनके सामाजिक-सांस्कृतिक ढांचे और पारंपरिक ग्राम शासन प्रणाली के अनुरूप एक विशेष कानून बनाया जाए,’ लेकिन नौकरशाहों की चालाकी से इस बाध्यकारी बात को ‘विवेकाधीन’ ढांचे में जोड़ देने से ‘पेसा’ का महत्व खो गया।

‘पेसा’ लागू होने पर निर्णय लेने की शक्ति ग्रामसभा को मिलती है, जैसे – भूमि उपयोग, खनन, शराब बिक्री, बाजार प्रबंधन, लघु वनोपज आदि। इससे नौकरशाहों और जनप्रतिनिधियों के अधिकार सीमित हो जाते हैं, इसलिए वे इसे लागू करने में ढिलाई या टालमटोल करते हैं। भारत की प्रशासनिक व्यवस्था ऊपर से नीचे चलती है, जबकि ‘पेसा’ नीचे से ऊपर की बात करता है। स्थानीय समुदायों को निर्णय लेने की शक्ति देना नौकरशाहों के लिए असुविधाजनक होता है। खनन, वनोपज और भूमि-अधिग्रहण जैसे क्षेत्रों से सरकारी और निजी कंपनियों के आर्थिक हित जुड़े हैं। अगर ग्रामसभा को वास्तविक अधिकार मिल जाएं, तो खनन और ठेकेदारी नेटवर्क पर रोक लग सकती है, जिससे कई राजनीतिक और आर्थिक हित प्रभावित होते हैं। राज्यों ने अब तक ‘पेसा’ के नियम देर से या अधूरे बनाए हैं। जहां नियम बने भी हैं, वहां ग्रामसभा को सिर्फ सलाह देने वाला निकाय बनाकर रखा गया है, निर्णय लेने वाला नहीं। ‘पेसा कानून’ को नौकरशाहों और राजनेताओं के चक्रव्यूह से निकालने की जरूरत है। घोर केंद्रीकृत व्यवस्था से विकेंद्रीकृत व्यवस्था बनाने के लिए मजबूत राजनीतिक इच्छाशक्ति अनिवार्य है। ‘अनुसूचित क्षेत्रों’ से ‘पंचायती राज कानून’ को खारिजकर राज्य विधानमंडल ‘पेसा’ सम्मत कानून बनाएं, जिसके तहत ग्रामसभा तथा जिला परिषद को स्वशासी दर्जा देकर शक्तिशाली बनाए जाने की दिशा में काम हो। आज का ‘पंचायती राज कानून’ ज्यादा-से-ज्यादा सिर्फ शीर्ष संचालित विकास की एक सक्रिय और निर्वाचित एजेंसी की रचना कर सकता है।(सप्रेस)

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