अंतरराष्ट्रीय विचार

मूल्यविहीन विदेश नीति : ‘ईमां मुझे रोके है तो खींचे है मुझे कुफ्र’

मूल्यविहीन विदेश नीति : ‘ईमां मुझे रोके है तो खींचे है मुझे कुफ्र’

अपने-अपने राष्ट्रीय हितों को साधते हुए दुनियाभर में अमन-चैन बरकरार रखने की खातिर बनाई और अमल में लाई जाने वाली विदेश नीतियों के दिन, लगता है, लद गए हैं। आजकल सभी देश अपने-अपने निजी और अक्सर व्यक्तिगत पूंजी के स्वार्थों...

अरुण कुमार त्रिपाठी

अपने-अपने राष्ट्रीय हितों को साधते हुए दुनियाभर में अमन-चैन बरकरार रखने की खातिर बनाई और अमल में लाई जाने वाली विदेश नीतियों के दिन, लगता है, लद गए हैं। आजकल सभी देश अपने-अपने निजी और अक्सर व्यक्तिगत पूंजी के स्वार्थों को प्राथमिकता देते हुए दूसरे देशों से संवाद की नीतियां बनाते हैं। जाहिर है, ऐसे में अमन-चैन की बात करना बेमानी होता जा रहा है। क्या होते हैं, ऐसी विदेश नीतियों के असर?

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की पांच देशों की यात्रा के इस मौके पर राजनय के विशेषज्ञों ने फिर एक बार जोरदार सलाह दी है कि भारत को आदर्शवादी विदेश नीति त्यागकर व्यावहारिक विदेश नीति अपनानी चाहिए। वैसे शीत-युद्ध के बाद से ही भारत उस दिशा में मुड़ा था और उसने ‘गुटनिरपेक्ष आंदोलन’ का विऔपनिवेशीकरण का चोला एकदम उतार ही फेंका था। आर्थिक वैश्वीकरण के तीव्र प्रवाह में भारत का उतरना इसका स्पष्ट प्रमाण है।

इस समय वैश्विक व्यवस्था में जितने बड़े पैमाने पर अविश्वास, अनिश्चितता और अराजकता व्याप्त है उसमें भारत की विदेश नीति एक किस्म के चौराहे पर खड़ी है। ‘संयुक्त राष्ट्र संघ’ (यूएनओ) और ‘विश्व व्यापार संगठन’ (डब्ल्यूटीओ) के तहत बनने वाली विश्व व्यवस्था को अब कोई मानने को तैयार नहीं है। सभी देश आत्मरक्षा की अपनी-अपनी परिभाषा गढ़ रहे हैं। कोई देश आतंकवाद को प्रोत्साहित करने को अपनी आत्मरक्षा बताता है तो कोई उसे खत्म करने को। कोई देश परमाणु हथियार बनाने को अपनी आत्मरक्षा बताता है तो कोई उसे नष्ट करने को। एक विचित्र किस्म के अराजक विश्व का निर्माण हो चुका है। 1991 में निर्धारित आर्थिक वैश्वीकरण के लक्ष्य को अमेरिका जैसे दुनिया के शक्तिशाली देश ने खारिज कर दिया है।

भारत अगर वैश्वीकरण में अमेरिकी प्रभुत्व का मुकाबला करने के लिए ‘ब्रिक्स’ (ब्राजील, रूस, भारत, चीन, दक्षिण अफ्रीका और बाद में जुडे सऊदी अरब, संयुक्त अरब अमीरात,  ईरान,  इथियोपिया और इंडोनेशिया का संगठन) में शामिल हुआ तो चीन के बढ़ते दबदबे को कम करने के लिए ‘क्वाड’ (भारत, जापान, आस्ट्रेलिया और अमेरिका का संगठन) का सदस्य बना, लेकिन अब उसे ये दोनों संगठन नाकाफी और अविश्वसनीय लग रहे हैं। ‘ब्रिक्स’ में अगर चीन और रूस भारत के साथ खडे नहीं हो रहे हैं तो भारत भी ईरान जैसे देश के साथ खड़ा नहीं हो रहा है।

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‘क्वाड’ के देशों ने भले ही अमेरिका में चल रहे सम्मेलन में आतंकवाद के विरुद्ध बयान जारी कर दिया, लेकिन यह नौबत ‘आपरेशन सिंदूर’ या पहलगाम हमले के दो महीने बाद आई। उसी तरह से भारत अगर ‘शंघाई सहयोग संगठन’ (चीन, कजाखस्तान, किर्गिजस्तान, रूस, ताजिकिस्तान, उज्बेकिस्तान, भारत, पाकिस्तान, ईरान और बेलारूस का संगठन) में रूस और चीन से व्यावहारिक रिश्ते कायम रखने के लिए शामिल हुआ तो वहां से भी उसे निराशा हाथ लगी।

आतंकवाद, अविश्वास और अस्थिर विश्व के भीतर अपनी जगह बनाने को आतुर भारत के समक्ष विदेश नीति की दुविधा बढ़ी है। एक ओर हमारे समक्ष शीत-युद्ध के दौरान पंडित जवाहरलाल नेहरू द्वारा बनाई गई ‘गुटनिरपेक्ष आंदोलन’ की मूल्य आधारित विदेश नीति का मोह (नास्टैल्जिया) है तो दूसरी ओर मूल्य विहीन और दबंग विदेश नीति अपनाने के ‘न्यू नार्मल’ का आकर्षण। जहां ‘गुटनिरपेक्ष आंदोलन’ के बहाने भारत को विश्व में सम्मान और तमाम देशों का नेतृत्व करने का अवसर मिला था वहीं मौजूदा स्थिति में उसे आर्थिक रूप से समृद्ध होने का मौका मिला है, लेकिन विश्वगुरु का दावा करने के बावजूद शिष्यों के लाले पड़ रहे हैं।

यह दुविधा भारत की ही नहीं, पूरी दुनिया की है। हमने जिस तरह के अनैतिक, भौतिकवादी और स्वार्थी विश्व की रचना कर दी है उसमें न तो राष्ट्रों का जीवन सरल है और न ही नागरिकों का। ‘ग्लोबल विश्व’ के आह्वान के बीच न तो अंतरराष्ट्रीय शांति, स्थिरता और भाईचारे के मूल्य का पालन हो रहा है और न ही मानवाधिकार और लोकतंत्र का।

दरअसल मूल्य आधारित विदेश नीति और राष्ट्रीय हित आधारित विदेश नीति के बीच एक टकराव हमेशा से रहा है। श्रेष्ठ विदेश नीति वही होती है जिसमें दोनों का समन्वय हो। आज समन्वय समाप्त हो गया है और तनाव बढ़ गया है। इस सिलसिले में कृष्णन श्रीनिवासन, जेम्स मेयल और संजय पुलिपका के संपादन में आई पुस्तक ‘वैल्यूज इन फारेन पालिसी’ इन पहलुओं पर चर्चा करती है। इसमें शामिल लेख बताते हैं कि वास्तविक दुनिया में सैन्य सत्ता, राजनीतिक सत्ता और आर्थिक सत्ता की खींचतान ही विदेश नीति का निर्धारण करती है। इसलिए राष्ट्रीय हित ही सर्वोपरि दिखाई देते हैं। राष्ट्रीय हित को सर्वोपरि रखने वाली विदेश नीतियों से अल्पकाल में राष्ट्रों और राष्ट्रीय नेतृत्व की हैसियत बढ़ती है और उन्हें लाभ भी होता दिखता है, लेकिन दीर्घकाल में इससे विश्व व्यवस्था अस्थिर और असुरक्षित हो जाती है।

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किताब के संपादकों का कहना कि दो सदी तक दुनिया पर पश्चिमी मूल्यों का प्रभाव रहा जो अब कमजोर पड़ रहा है, लेकिन क्या पूर्वी देशों के मूल्य दुनिया की भूराजनीति पर अपना प्रभाव छोड़ेंगे? वास्तव में पश्चिमी देशों ने मानवाधिकार, आधुनिकता, राष्ट्रीय संप्रभुता और लोकतंत्र के जिन सार्वभौमिक मूल्यों को अपनी विदेश नीति का हिस्सा बनाने का दावा किया उसमें भारी छल था। इसीलिए वे आज मजबूत होने के बजाय भरभरा कर गिर रहे हैं। नोम चोम्स्की जैसे विचारक तो अमेरिकी विदेश नीति के इसी पाखंड को निरंतर उजागर करते रहे हैं।

उसी तरह का पाखंडी तर्क अफगानिस्तान और इराक पर और अभी ईरान पर हमले के लिए दिया गया। वे कहीं स्थायी स्वतंत्रता लाने की बात कर रहे थे तो कहीं स्थिरता और लोकतंत्र। यूरोप और अमेरिका की विदेश नीति का एक बड़ा हिस्सा हथियार कंपनियों द्वारा निर्धारित होता है। उसी से जुड़ा होता है, ‘तीसरी दुनिया’ के देशों के खनिजों का दोहन। हथियार कंपनियों के  कारोबार में निरंतर तीव्र बढ़ोतरी देखी जा रही है। सन् 2023 में यह 632 अरब डॉलर था तो 2024 में बढकर 2.443 खरब डॉलर हो चला है।

ऐसे में चीन, भारत, मध्यपूर्व, अफ्रीका और दक्षिण अमेरिका के देश अपने धर्म, संस्कृति और इतिहास के आधार पर विदेश नीति के नए मूल्य गढ़ते हैं, लेकिन टकराव तब होता है जब वे दूसरे देश के मूल्यों को समझने में गलती करते हैं। कहा जाता है कि चीन अपनी विदेश नीति को गढ़ने में ‘ताओवाद’ और ‘कन्फूसियसवाद’ जैसे दार्शनिक विचारों की मदद लेता रहता है और अपनी सत्ता और सुरक्षा को ध्यान में रखते हुए भूभाग और प्रभाव का निरंतर विस्तार भी करता रहता है। जापान ने 2006 में शिंजो आबे के नेतृत्व में मूल्य आधारित राजनय की पहल की थी जिसका उद्देश्य लोकतंत्र, स्वतंत्रता, मानवाधिकार, कानून का शासन और बाजार अर्थव्यवस्था के नियमों को बढ़ावा देने का प्रयास था।

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अलबत्ता, जिस तरीके से अमेरिका डोनाल्ड ट्रंप के नेतृत्व में संधियां तोड़ने और नई संधियां करने के रास्ते पर चल रहा है उसका परिणाम गहरा अविश्वास और अस्थिरता ही है। ध्यान रहे, हिटलर भी यही करता था। ऐसे में भारत को, जो कि बुद्ध, गांधी और नेहरू की शांति, अहिंसा और महावीर के ‘जियो और जीने दो’ की महान परंपरा का आज भी स्मरण करता है, पूरी तरह मूल्यहीन विदेश नीति की ओर ढकेलना आसान नहीं होगा, हालांकि भारत के राष्ट्रीय हित उसे हर प्रकार का समझौता करने के लिए बाध्य कर रहे हैं। (सप्रेस)

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