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गणतंत्र दिवस : प्रजातंत्र में पक्षधरता

कुलभूषण उपमन्यु

प्रजातंत्र में निष्पक्ष चिंतन राज्य, सरकार और समाज को सर्वजन-हिताय बनाए रखता है, लेकिन हमारे यहां के मौजूदा पार्टी-प्रधान ढांचे ने पक्षधरता की बेहद कमजोर छवि बनाई है। नतीजे में समूचा तंत्र शिथिल होता जा रहा है। क्या हैं, पक्षधरता के दोष? इनसे कैसे पार पाया जा सकता है?

76वें ‘गणतंत्र दिवस’ (26 जनवरी) पर विशेष

प्रजातंत्र, अनेक शासन व्यवस्थाओं में बेहतरीन व्यवस्था मानी जाती है, क्योंकि इसमें तानाशाही व्यवस्थाओं जैसी मनमानी और क्रूरता की संभावना न्यूनतम होती है। प्रारंभ में शासन की जिम्मेदारी केवल बाहरी हमलों से सुरक्षा और आंतरिक सुरक्षा व्यवस्था को सुचारू रूप से बनाए रखने मात्र की होती थी। लोग अपनी-अपनी सामर्थ्य के अनुसार रोजी-रोटी के प्रयास करने के लिए स्वतंत्र थे, किन्तु इस व्यवस्था में कमजोर और शक्तिशाली को एक ही धरातल पर प्रतिस्पर्धा करना होती थी।

औद्योगिक क्रांति के बाद जो पूंजीवादी व्यवस्था बनी उसने भी इसी मान्यता को अपनाया, किन्तु इस मॉडल ने नागरिकों के बीच आर्थिक असमानता को और भी ज्यादा बढ़ा दिया। उद्योगपति और मजदूर, मालिक और नौकर वाली व्यवस्था बनी जिसमें मालिक मजदूर या श्रमिक वर्ग का मनमाना शोषण करने के लिए स्वतंत्र थे। इसी के विरुद्ध प्रतिक्रिया के फलस्वरूप साम्यवादी विचारधारा का उदय हुआ जिसने आर्थिक असमानता को कम करने के प्रयास किए, किन्तु एकदलीय तानाशाही की स्थापना की। इसने व्यक्ति की स्वतंत्र चिंतन और स्वस्थ प्रतिस्पर्धा को नष्ट कर दिया जिसके फलस्वरूप ही साम्यवादी व्यवस्थाएं अपने ही बोझ से ध्वस्त हो गईं। जो बची हैं वे भी साम्यवाद का पाखंड ही करती दिखती हैं, क्योंकि उनकी अर्थव्यवस्था तो भयंकर पूंजीवादी बन गई है।

इसी दुविधा काल में फिर से प्रजातंत्र के विचार को बल मिला, किन्तु पूंजीवादी व्यवस्था में जो खुले शोषण की छूट मिल जाती थी उस पर दो तरह से नियंत्रण करने के प्रयास किये गए। एक तो श्रमिक हितों की रक्षा के लिए कानून बनाए गए और दूसरे कल्याणकारी राज्य की अवधारणा का विकास हुआ। कल्याणकारी राज्य में प्रतिस्पर्धा में पिछड़ गए या किसी भी कारण हाशिए पर आ गए समाज को सुरक्षा देने की जिम्मेदारी राज्य पर डाली गई। इसमें गरीबी उन्मूलन, मानव कल्याण के काम जैसे भोजन, आवास, स्वास्थ्य, शिक्षा, और आय संबंधी बुनियादी जरूरतों को पूरा करने के काम शामिल हैं।

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भारतीय संविधान में भी धारा 38 और 39 में राज्य के कल्याणकारी कर्तव्यों का प्रावधान किया गया है। यानि धीरे-धीरे प्रजातंत्र और पूंजीवादी अर्थ-व्यवस्था को सुधारते हुए अधिकाधिक प्रगतिशील बनाने के प्रयास हुए। इंग्लेंड और जर्मनी में 1940 के दशक में ही कल्याणकारी राज्य की अवधारणा पर कार्य आरंभ हुआ जिससे प्रजातंत्र का ऐसा स्वरूप विकसित हो रहा है जो समाज को उन्मुक्त चिंतन के अवसर प्रदान करता है, कार्य और उद्यम की स्वतंत्रता प्रदान करता है, प्रतिस्पर्धा में पिछड़ गए समाज के भाग को आर्थिक सुरक्षा प्रदान करता है और तानाशाही वृतियों को नियंत्रित करता है।

इसी कारण प्रजातंत्र बेहतरीन शासन पद्धति साबित हो रही है। प्रजातंत्र को उत्तरोत्तर प्रगतिशील बनाने के लिए उसके मूल लक्षणों पर बल देते रहने की जरूरत होती है क्योंकि शासक वर्ग हमेशा ही शक्ति के दुरूपयोग द्वारा तानाशाही वृत्तियों की ओर उन्मुख होने की संभावनाओं से ग्रस्त रहता है। इसीलिए कानून के शासन को प्रजातंत्र में प्रमुख स्थान दिया गया है। जो कानून प्रजा पर लागू होता है वही शासकों पर भी लागू होता है। प्रजातंत्र में बहुदलीय प्रणाली से निश्चित अवधि पर चुनाव होते हैं और वयस्क नागरिक अपने मताधिकार का प्रयोग करते हुए अपने प्रतिनिधि चुनकर सरकार बनाते हैं।

मतदाता का कर्तव्य है कि वह प्रजातंत्र के मूल्यों को ध्यान में रखकर निष्पक्ष होकर अपने प्रतिनिधि और दल चुनें। इसके लिए मतदाता का निष्पक्ष होना जरूरी है। दलों का प्रयास रहता है कि वे अधिक-से-अधिक नागरिकों को अपना सदस्य बनाएं, किन्तु नागरिकों का प्रयास होना चाहिए कि वे कम-से-कम दलीय सदस्यता ग्रहण करें। जब वे दलीय सदस्यता से बाहर रहेंगे तभी वे सत्यनिष्ठ मूल्यांकन कर सकेंगे। वरना प्रतिबद्ध मतदाता, जो किसी दल से जुड़ा है उसके बारे में पता होता है कि वह किसके प्रति अपनी क्या राय व्यक्त करेगा और वह जिस दल के साथ प्रतिबद्ध है उसके गलत काम को भी ठीक ही कहेगा। इसलिए यदि हम चाहते हैं कि शासन निष्पक्ष कार्य करे तो पहले हमें ही निष्पक्ष होने की जरूरत है। हम भिन्न-भिन्न दलों के साथ जुड़ाव को दरकिनार करते हुए उनके कार्य के निष्पक्ष मूल्यांकन के आधार पर मतदान करना आरंभ कर देंगे तो दलों पर भी अपनी कार्य-पद्धति को सुधारने का दबाव बनेगा।

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विनोबा जी ने इस दृष्टि से ‘आचार्य कुल’ नामक संस्था के गठन का विचार दिया था। इस संस्था के सदस्य समाज को पूर्णतः निष्पक्ष राय से जागरूक करते रहें जिससे सर्वहितकारी, न्यायपूर्ण प्रजातंत्र को सुदृढ़ करने के लिए मतदान किया जा सके। अपनी निष्पक्षता को सुदृढ़ करने के लिए ‘आचार्य कुल’ के सदस्य किसी भी दल के सदस्य न बनें, मतदान भी न करें। उनकी राय को मतदाता ध्यान में रखकर अपना विश्लेषण करके मत डालने का निर्णय करें। जब हम केवल अपने लिए सोचते हैं तो दूसरे के साथ कहां, कितना अन्याय हमारी वजह से हो रहा है इसका ख्याल ही नहीं रहता। शासन तो दंड के माध्यम से समाज को रास्ते पर रखने का काम करता है, किन्तु समाज नैतिकता के बल पर अपने को दिशा दिखाता है। ये दोनों ही अपनी-अपनी भूमिका में निष्पक्षता से सक्रिय रहें तो प्रजातंत्र सुदृढ़ भी होगा और न्यायपूर्ण और सर्व-समावेशी भी होगा। यही अच्छे प्रजातंत्र की कसौटी भी है। (सप्रेस)

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