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ग्लोबल वार्मिंग के प्रभावों का बढ़ा-चढ़ाकर न बताएं

हाल ही में जलवायु मॉडलों की मदद से किए गए कुछ अध्ययनों के निष्कर्ष प्रकाशित हुए हैं। एक अध्ययन का दावा है कि आर्कटिक वर्षा अपेक्षा से काफी पहले 2060 के दशक तक ही प्रभावी हो जाएगी जबकि एक अन्य अध्ययन में पश्चिमी अमेरिका में जंगल की आग से वायु प्रदूषण वर्ष 2100 तक तीन गुना होने का दावा किया गया है। तीसरे अध्ययन में दावा किया गया है कि महासागरीय जीवों की व्यापक विलुप्ति अगली कुछ शताब्दियों में ही हो जाएगी।

ये निष्कर्ष नवीनतम जलवायु मॉडलों पर आधारित हैं और सभी वातावरण के समय से पहले और अपेक्षा से अधिक गर्म होने की चेतावनी देते हैं। हालांकि स्वयं मॉडल निर्माताओं ने इन मॉडलों में समस्या को पहचाना और स्वीकार किया है लेकिन जलवायु परिवर्तन के प्रभावों का आकलन करने वाले शोधकर्ता अभी भी इस बात को पकड़ नहीं पाए हैं। कुछ शोधकर्ताओं को डर है कि ‘अपेक्षित से तेज़’ जलवायु परिवर्तन की ऐसी भविष्यवाणियां इस विज्ञान की विश्वसनीयता को कम कर सकती हैं।

नेचर में प्रकाशित एक समीक्षा में वैज्ञानिकों के एक समूह ने मॉडल का चयन करने में अधिक सावधानी बरतने का सुझाव दिया है। साथ ही उन्होंने विभिन्न मॉडल्स के अनुमानों के औसत का उपयोग न करने की सलाह दी है। यह औसत इंटरगवर्नमेंटल पैनल ऑन क्लाइमेट चेंज (आईपीसीसी) द्वारा 2100 तक के अनुमान से 0.7 डिग्री सेल्सियस अधिक वृद्धि का अंदेशा जताता है। इस बारे में जलवायु शोधकर्ता ज़ेके हौसफादर जलवायु मॉडल के लोकतंत्र की बजाय मॉडल श्रेष्ठता को अपनाने की सलाह देते हैं जिसमें अधिक वास्तविक वार्मिंग दरों का संकेत देने वाले मॉडल्स को प्राथमिकता दी जाए।                         

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नासा के गोडार्ड इंस्टीट्यूट फॉर स्पेस स्टडीज़ की जलवायु वैज्ञानिक केट मार्वल मानती हैं कि जलवायु मॉडल काफी सफल अनुसंधान साधन हैं और कुछ ‘अतिशय वार्मिंग’ वाले मॉडल जलवायु विज्ञान के सिद्धांतों को झुठलाते नहीं हैं। यह तो सच ही है कि ग्रीनहाउस प्रभाव से पृथ्वी का तापमान बढ़ रहा है, बर्फ पिघल रही है, समुद्र के स्तर में वृद्धि हो रही है और कई क्षेत्र बार-बार सूखे की चपेट में आ रहे हैं लेकिन मॉडल कोई क्रिस्टल बॉल नहीं हैं, उनमें खामियां स्वाभाविक हैं।  

दरअसल इन ‘अतिशय वार्मिंग’ मॉडलों की समस्या 2019 में कपल्ड मॉडल इंटरकंपेरिज़न प्रोजेक्ट (सीएमआईपी) के माध्यम से पता चली जो विश्व भर के मॉडलों के परणामों को एकत्रित करता है। इन परिणामों को आम तौर पर हर 7-8 वर्षों में जारी की जाने वाली आईपीसीसी रिपोर्ट के प्रकाशित होने से पहले जारी किया जाता है। सीएमआईपी के पिछले राउंड में अधिकांश मॉडलों ने 2 से 4.5 डिग्री सेल्सियस की जलवायु संवेदनशीलता का अनुमान लगाया था। वायुमंडलीय कार्बन डाईऑक्साइड के पूर्व-औद्योगिक समय से दुगनी होने पर अपेक्षित तापमान को जलवायु संवेदनशीलता कहते हैं। इसके बाद 2019 में सीएमआईपी6 में 55 में से 10 मॉडल ने 5 डिग्री सेल्सियस से अधिक संवेदनशीलता का अनुमान लगाया। ये परिणाम एक अन्य अध्ययन से काफी अलग थे जिसमें जलवायु संवेदनशीलता के आकलन हेतु पुराजलवायु और अवलोकन सम्बंधी रिकॉर्ड का सहारा लिया गया था। उसके अनुसार जलवायु संवेदनशीलता 2.6 से 3.9 डिग्री सेल्सियस के बीच निकलती है। संवेदनशीलता अनुमानों में इस तरह की भिन्नता जलवायु की जटिलता को उजागर करती है।  

तब शोधकर्ताओं ने ‘अतिशय वार्मिंग’ मॉडलों का अध्ययन किया। इनमें मुख्य रूप से नेशनल सेंटर फॉर एटमॉस्फेरिक रिसर्च, यूएस डिपार्टमेंट ऑफ एनर्जी, युनाइटेड किंगडम मेट ऑफिस और एनवायरनमेंट एंड क्लाइमेट चेंज कनाडा द्वारा तैयार किए गए मॉडल शामिल हैं। इन मॉडलों के परिणाम अक्सर बादलों की उपस्थिति से सम्बंधित पाए गए और एक में उष्णकटिबंधीय क्षेत्रों में वार्मिंग का अत्यधिक अनुमान लगाया गया था। अलबत्ता कुछ मॉडल अपने पूर्ववर्ती मॉडल की तुलना में दुनिया को बेहतर स्थान बता रहे थे। मॉडल-निर्माताओं ने समस्या के प्रति खुलापन दर्शाया है लेकिन इनमें सुधार करने में समय लगेगा।

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आईपीसीसी ने पिछले वर्ष की अपनी पैनल रिपोर्ट में इस समस्या से निपटने के प्रयास के तहत जलवायु परिवर्तन के भौतिक आधारों को भी शामिल किया। इसके अलावा आईपीसीसी ने मॉडल्स का मूल्यांकन इस आधार पर भी किया कि वे ऐतिहासिक तापमानों को कैप्चर करने में कितने सफल हैं। इसके बाद जीवाश्म ईंधन के विभिन्न उत्सर्जन परिदृश्यों के आधार पर आधिकारिक ‘आकलित वार्मिंग’ अनुमान लगाए। आईपीसीसी ने सभी मॉडलों के परिणामों को वार्मिंग की डिग्री (1.5 डिग्री सेल्सियस, 2 डिग्री सेल्सियस और 3 डिग्री सेल्सियस) के आधार पर प्रकाशित किया। इसका फायदा यह है कि ‘अतिशय वार्मिंग’ मॉडल्स की उपयोगी जानकारी का इस्तेमाल किया जा सकता है।

हालांकि, आईपीसीसी ने इस चुनौती को सम्बोधित तो किया लेकिन वास्तविक समस्या के बारे में कुछ नहीं बताया। कई शोधकर्ताओं को तो यह पता तक नहीं है कि आईपीसीसी ने ऐसा कुछ किया है और वे औसतों के आधार पर ही काम कर रहे हैं। इसके परिणामस्वरूप जलवायु मॉडलों से मिलने वाले परिणाम आईपीसीसी की तुलना में काफी बदतर देखने को मिले। ऐसे में आईपीसीसी को उचित मार्गदर्शन प्रदान करना चाहिए ताकि समस्याओं पर ध्यान दिया जा सके और सही अनुमान लगाए जा सकें। इसके लिए जलवायु शोधकर्ताओं को आईपीसीसी द्वारा उठाए गए कदमों का अनुसरण करना चाहिए।

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