Month: July 2025

युद्धकाल : बूचड़खाने में बदलती दुनिया

महात्मा गांधी कहा करते थे कि यदि ‘आंख के बदले आंख निकाली जाए तो अंत में समूची दुनिया अन्धी हो जाएगी।’ कौन जानता था कि गांधी की विदाई के 77 साल बाद यह बात कहावत से निकलकर कड़वी सच्चाई में…

मुंशी प्रेमचंद: जिन्होंने आम आदमी को साहित्य का नायक बनाया

मुंशी प्रेमचंद हिन्दी साहित्य के वो युगपुरुष हैं, जिनकी लेखनी ने आम आदमी की पीड़ा, सामाजिक कुरीतियों और आज़ादी की भावना को शब्द दिए। उन्होंने उपन्यास, कहानी, नाटक और लेखों के माध्यम से साहित्य को जन-सरोकारों से जोड़ा और हिन्दी…

स्वस्थ और सुखी रहना है तो प्रकृति के साथ जीना होगा

28 जुलाई को मनाया जाने वाला ‘विश्व प्रकृति संरक्षण दिवस’ हमें इस सच्चाई से रूबरू कराता है कि लगातार मानवीय गतिविधियों और प्रकृति से छेड़छाड़ के चलते मौसम चक्र असंतुलित हो चला है। ग्लोबल वार्मिंग, बाढ़, सूखा, वनों की आग…

युद्ध, टेक्नोलॉजी और लोकतंत्र

इंसान का आपस में साथ रह पाना कितना कठिन होता जा रहा है? क्या एक-दूसरे के बीच का फासला इतना गहरा हो गया है कि युद्ध के बिना इसे पाटा नहीं जा सकता? इसी मानवीय कमजोरी की पड़ताल करता विवेकानंद…

विनाश को विस्तार देते युद्ध !

आजकल दुनियाभर में जारी युद्धों की अमानवीय क्रूरता, वीभत्स हिंसा और असंख्य मौतों के नतीजे में आखिर क्या मिलता है? दवाओं जैसी अकूत पूंजी कूटते, हथियारों के सौदागरों की कमाई के अलावा इनसे किसी पक्ष को, किसी तरह की कोई…

पर्यावरण : ‘कैम्पा’ से रोकी जा सकती है, वनों की कटाई

हमारी नीतियां, खासकर वन संबंधी नीतियां, इस अवधारणा पर टिकी होती हैं कि उपभोग के बाद हम अपने प्राकृतिक संसाधनों को वापस पुनर्जीवित कर लेंगे। वनों की क्षतिपूर्ति की खातिर बना ‘कैम्पा’ इसी विचार की बानगी है, लेकिन क्या इस…

जटिल है, जातिवार जनगणना 

एन बिहार चुनाव के पहले की गई ‘केन्द्रीय चुनाव आयोग’ की गफलतों ने राजनीतिक जमातों में उथल-पुथल मचा दी है, लेकिन इसी की टक्कर का एक और मुद्दा देशभर में खदबदा रहा है, जातिवार जनगणना का । यह मुद्दा ऊपरी…

मूल्यविहीन विदेश नीति : ‘ईमां मुझे रोके है तो खींचे है मुझे कुफ्र’

अपने-अपने राष्ट्रीय हितों को साधते हुए दुनियाभर में अमन-चैन बरकरार रखने की खातिर बनाई और अमल में लाई जाने वाली विदेश नीतियों के दिन, लगता है, लद गए हैं। आजकल सभी देश अपने-अपने निजी और अक्सर व्यक्तिगत पूंजी के स्वार्थों…

भारतीय भाषाओं का डिजिटल संरक्षण

तेजी से विलुप्त होती हमारी भाषाओं, बोलियों को बचाने, संरक्षित करने के क्या उपाय हैं? अव्वल तो तरह-तरह के विकासवादी खटकरमों से उस समाज को बचाना होगा जो उन भाषाओं, बोलियों को वापरता है। दूसरे, भाषाओं की ध्वनियों, व्याकरण और…

हरियाली अमावस्या : कल्पवृक्ष पूजन मेला

हमारे देश में अलग-अलग पर्वों पर पीपल, बरगद, आंवला, शमी, इमली आदि वृक्षों की पूजा की जाती है, परन्तु राजस्थान के अजमेर के पास गांव मांगलियावास में सावन की हरियाली अमावस्या पर कल्पवृक्षों के जोड़े की पूजा की जाती है।…