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पर्यावरण : ‘कैम्पा’ से रोकी जा सकती है, वनों की कटाई

राज कुमार सिन्हा

हमारी नीतियां, खासकर वन संबंधी नीतियां, इस अवधारणा पर टिकी होती हैं कि उपभोग के बाद हम अपने प्राकृतिक संसाधनों को वापस पुनर्जीवित कर लेंगे। वनों की क्षतिपूर्ति की खातिर बना ‘कैम्पा’ इसी विचार की बानगी है, लेकिन क्या इस तरह से हम लाखों एकड जंगल काटकर वापस उसे हरा-भरा कर सकेंगे? ‘कैम्पा’ से भी आखिर क्या हो पा रहा है?

‘प्रतिपूरक वनरोपन निधि प्रबंधन एवं योजना प्राधिकरण’ (कैम्पा) निधि का उपयोग वन भूमि और पारिस्थितिकी तंत्र सेवाओं के नुकसान की भरपाई के लिए किया जाता है। इसका उपयोग प्रतिपूरक वनरोपन के अलावा वनों की गुणवत्ता में सुधार, जैव-विविधता का संवर्धन, वन्य-जीव आवास में सुधार, वनों की आग पर नियंत्रण, वन-संरक्षण और मृदा एवं जल-संरक्षण उपायों के लिए होता किया जाता है। ‘कैम्पा’ गतिविधियों का क्रियान्वयन स्थानीय समुदायों को वनरोपन, नर्सरी तैयार करने, मृदा-जल संरक्षण और वन-सुरक्षा गतिविधियों में शामिल करके किया जाता है।

वर्ष 2019-20 के दौरान, यानी नए ‘कैम्पा’ फंड नियम लागू होने के बाद पूरे साल में राज्यों को उनके हिस्से के रूप में कुल 47.86 हजार करोड़ रुपये जारी किए गए थे। वर्ष 2019 -20 से लेकर 2022- 23 (जनवरी  2023 तक) मध्यप्रदेश को 6.12 हजार करोड़ रुपये मिले हैं। साल 2019 से साल 2024- 25 तक मध्यप्रदेश में 21 करोड़ 78 लाख से अधिक पौधारोपण किए जाने का दावा किया जा रहा है। वन विभाग की नई कार्ययोजना के मुताबिक 50 लाख हेक्टेयर वन क्षेत्र को हरा – भरा करने का लक्ष्य है। इसके लिए पांच साल की योजना बनाई गई है, लेकिन अक्सर देखा जाता है कि वृक्षारोपण कार्यक्रम में वृक्ष मृत्यु दर बहुत अधिक होती है। लक्ष्य हासिल करने की हड़बड़ी में, वन विभाग बहाली में विफल हो जाता है, क्योंकि पेड़ गलत तरीके से, गलत जगहों पर और स्थानीय लोगों के सहयोग के बिना लगाए जाते हैं। सफल वनरोपन कार्यक्रमों को उन लोगों द्वारा दीर्घकालिक रखरखाव की योजना बनानी चाहिए जो आस-पास रहते हैं और काम करते हैं।

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‘संयुक्त राष्ट्र विकास कार्यक्रम’ (यूएनडीपी), ‘जलवायु और भूमि उपयोग गठबंधन’ और अन्य भागीदारों द्वारा समर्थित ‘वन घोषणा मूल्यांकन’ द्वारा 20 मार्च, 2025 को जारी की गई रिपोर्ट में स्पष्ट रूप से वित्त पोषण में कमी को उजागर किया गया है। वनों की कटाई रोकने के लिए प्रति वर्ष अनुमानित 460 बिलियन डॉलर की आवश्यकता है, लेकिन वास्तविक वित्तीय सहायता बहुत कम है। सन् 2023 में, निजी वित्तीय संस्थानों ने वनों की कटाई से जुड़े क्षेत्रों में 6.1 ट्रिलियन डॉलर का निवेश किया, जबकि सरकारें प्रतिवर्ष 500 बिलियन डॉलर की सब्सिडी प्रदान करती रहीं, जो संरक्षण के बजाय पर्यावरण विनाश को प्रोत्साहित करती हैं।

वन पारिस्थितिकी संतुलन बनाए रखने, जैव-विविधता को सहारा देने और आजीविका को बनाए रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। भारत जैसे विविधतापूर्ण और पर्यावरण की दृष्टि से समृद्ध देश में, वन और वृक्ष लगभग 8,27,357 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र को कवर करते हैं, जो भारत के भौगोलिक क्षेत्र का 25.17 प्रतिशत है। क्षेत्रफल के हिसाब से मध्यप्रदेश में सबसे ज़्यादा वन क्षेत्र है, जो लगभग 77,073 वर्ग किलोमीटर है। ‘भारत वन स्थिति रिपोर्ट’ (आईएसएफआर) 2023 के अनुसार, मध्यप्रदेश में सभी राज्यों के बीच वन और वृक्ष आवरण में लगभग 612.41 वर्ग किलोमीटर की कमी आई है। अर्थात 2019 में वन क्षेत्र 77,482 वर्ग किलोमीटर था जो 2023 में घटकर 77,073 वर्ग किलोमीटर रह गया है।

मध्यप्रदेश में वनों की कटाई का मुद्दा एक बडी राष्ट्रीय बहस का हिस्सा है।  देश में 2014 से 2024 के बीच 173,000 हेक्टेयर वनभूमि को गैर-वानिकी उपयोग के लिए मंजूरी दी गई है। इसमें मध्यप्रदेश का हिस्सा लगभग 22 प्रतिशत है। इसलिए विकास परियोजनाओं के लिए मंज़ूरी मिलने के मामले में मध्यप्रदेश पहले स्थान पर है। मध्यप्रदेश में 2014 से 2024 के बीच विकास के नाम पर देश में सबसे ज़्यादा वनों की कटाई हुई है। ‘केंद्रीय पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन’ मंत्री भूपेंद्र यादव ने संसद में एक सवाल के जवाब में बताया कि इस अवधि के दौरान राज्य ने विभिन्न सार्वजनिक उपयोगिता परियोजनाओं के लिए 38,552 हेक्टेयर वन भूमि खो दी है। ग्लोबल फारेस्ट वाच’ जैसे अन्तर्राष्ट्रीय संगठनों ने रिपोर्ट दी है कि भारत ने 2001 से 2023 के बीच 23300 वर्ग किलोमीटर वृक्ष-क्षेत्र खो दिया है।

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‘ग्लोबल फारेस्ट वाच’ ने यह भी बताया है कि 2013 से 2023 तक 95 प्रतिशत वनों की कटाई प्राकृतिक वनों में हुई है। प्राकृतिक जंगल एक जटिल पारिस्थितिकी तंत्र है जो पौधों, जानवरों, सूक्ष्म जीवों और अजैविक के बीच अंतःक्रियाओं का परिणाम है। जबकि वृक्षारोपण जिसे अक्सर वानिकी या भूमि सुधार के लिए किया जाता है, में आमतौर पर एक ही प्रजाति के पेङों को एक साथ लगाया जाता है जो प्राकृतिक जंगल की विविधता और जटिलता से बहुत अलग है।

प्राकृतिक जंगल कृत्रिम जंगल से 23 फीसदी अधिक कार्बन सोखता है। ‘स्टेनफोर्ड स्कूल ऑफ अर्थ’ की एरिक लैम्बिन ने अपने अध्ययन में बताया है कि “यदि वृक्षारोपण को प्रोत्साहित करने की नीतियों को खराब तरीके से डिजाइन किया गया है या खराब तरीके से लागू किया गया है, तो न केवल सार्वजनिक धन की बर्बादी का जोखिम है, बल्कि अधिक कार्बन उत्सर्जन और जैव-विविधता को खोने का भी जोखिम है।”  विकास कार्यों में पेङों की कटाई के बदले पौधरोपण को प्रोत्साहित किया जाता है, जबकि जटिल पर्यावरणीय समस्याओं से निपटने के लिए खासकर पेङ काटने से उपजने वाले संकट के समाधान के लिए केवल पौधारोपण जैसे निर्णयों पर पुनर्विचार करना चाहिए। (सप्रेस)

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