Year: 2022

कैसे करें पर्यावरण की परवाह

‘विश्व पर्यावरण दिवस’ (5 जून) पर विशेष हर साल पर्यावरण दिवस के बहाने हम लगातार बदहाल होते अपने परिवेश का लेखा-जोखा तो कर लेते हैं, लेकिन उसे लेकर गंभीरता से कोई पहल नहीं करते। क्या हमारा यह व्यवहार प्रकृति, पर्यावरण और…

खुशहाल खेती का मंत्र – ‘खेत एक, फसलें अनेक’

रासायनिक खादों-दवाओं-कीटनाशकों की भरपूर मात्रा से विपुल पैदावार करने वाली ‘हरित क्रांति’ ने अब अपने पैदा किए खतरों को उजागर करना शुरु कर दिया है। एक जमाने में कभी-कभार होने वाली कैंसर जैसी बीमारी अब घर-घर का संकट बन गई…

ग्लोबल वार्मिंग के प्रभावों का बढ़ा-चढ़ाकर न बताएं

हाल ही में जलवायु मॉडलों की मदद से किए गए कुछ अध्ययनों के निष्कर्ष प्रकाशित हुए हैं। एक अध्ययन का दावा है कि आर्कटिक वर्षा अपेक्षा से काफी पहले 2060 के दशक तक ही प्रभावी हो जाएगी जबकि एक अन्य…

झीलों को ‘मारकर’ बसाया गया बेंगलुरु

देशभर में जलस्रोतों को जिस हिंसक क्रूरता के साथ ध्वस्त किया जा रहा है, उससे एक समाज की हैसियत से अपने आत्महंता होने की तस्दीक तो होती ही है। बेंगलुरु समेत मुम्बई, चेन्नई, पुणे, दिल्ली, कोलकता, इंदौर, भोपाल जैसे नगर-महानगर…

Education : ‘अर्ध-अंग्रेज़ी’ से अध्यापन

कस्बाई और ग्रामीण इलाकों के स्कूलों में भाषा, खासकर मीडियम यानि माध्यम की भाषा का सवाल अक्सर बेचैन करता है। विज्ञान समेत ऊंचे दर्जे की कक्षाओं के अनेक विषय अंग्रेजी में होते हैं, लेकिन उन्हें सीखने-समझने की बच्चों की तैयारी…

Uttarakhand : विकास की खातिर हिमालय की हत्या

सब जानते हैं कि भारत, खासकर उत्तर भारत के प्राकृतिक वजूद के लिए हिमालय का होना कितना जरूरी है, लेकिन तिल-तिल मरते हिमालय को बचाने की पहल कोई नहीं करता। कभी, कोई वैज्ञानिक या स्थानीय समाज इसको लेकर आवाज उठाते…

साइबर अपराध आज चिंता का बड़ा सबब है

समाचार पत्रों एवं विभिन्न संचार माध्यमों के द्वारा आए दिन हमें सायबर अपराधों के समाचार पढ़ने को मिलते रहते हैं। इन घटनाओं में कुछ व्यक्तियों के काफी बड़े-बड़े नुकसान के समाचार भी होते हैं। लेकिन इन सब में एक ‘‘सामान्य…

‘आर्मेनियाई जनसंहार-ऑटोमन साम्राज्य का कलंक’ : नरसंहार के निहितार्थ

सत्ता और पूंजी की खातिर समाज को आपस में सतत युद्धरत, हिंसक बनाए रखने का नतीजा क्या एक व्यापक नरसंहार नहीं हो सकता? एक ऐसा नरसंहार जिसमें आम लोग अज्ञानतावश बडी शिद्दत से शामिल हो जाते हों? पिछले सौ-डेढ सौ…

मोटे नहीं, पौष्टिक हैं ये अनाज

साठ के दशक में हमारे देश में आई ‘हरित क्रांति’ ने उत्पादन तो कई-कई गुना बढाया, लेकिन हमारे भोजन से पौष्टिकता गायब कर दी। देश भर में भोजन के नाम पर सिर्फ गेहूं और चावल परोसे जाने लगे और कुछ…

अतीत के प्रति घृणा और बदले की भावना लोगों के मन में घोलने के बजाय देश के वास्तविक विकास के लिए काम करना चाहिए

सरकारों, मीडिया और नागरिकों से की महात्मा गांधी की पौत्री तारा भट्टाचार्य ने अपील नईदिल्‍ली। राष्ट्रपिता महात्मा गांधी की पोती 89 वर्षीय तारा गांधी भट्टाचार्य ने एक बयान में कहा है कि आज देश में जो कुछ हो रहा है, वह विकट…