‘आर्मेनियाई जनसंहार-ऑटोमन साम्राज्य का कलंक’ : नरसंहार के निहितार्थ

डॉ.कश्मीर उप्पल

सत्ता और पूंजी की खातिर समाज को आपस में सतत युद्धरत, हिंसक बनाए रखने का नतीजा क्या एक व्यापक नरसंहार नहीं हो सकता? एक ऐसा नरसंहार जिसमें आम लोग अज्ञानतावश बडी शिद्दत से शामिल हो जाते हों? पिछले सौ-डेढ सौ सालों के दुनियाभर के नरसंहारों के अनुभव तो यही बताते हैं। सुमन केशरी और माने मकर्तच्यान की पुस्तक ‘आर्मेनियाई जनसंहार : ऑटोमन साम्राज्य का कलंक’ इसी बात को एक बार फिर पुष्ट करती है।

इस समय पिछली बीसवीं शताब्दी के प्रारंभ का प्रथम विश्वयुद्ध (1914-1918) और इसके मध्य का द्वितीय विश्वयुद्ध (1938-1945) अपने काल से बाहर आकर हमारी 21 वीं शताब्दी के सम्मुख खड़ा हो गया है। मानो वह कह रहा हो कि क्या हमारे सिखाए हुए सबक भुला दिये गये हैं? क्या वे सबक काफी नहीं थे?

ज्ञान-विज्ञान के संसाधनों से भरपूर इस 21 वीं शताब्दी में अनेक देश, अपनी एक-पक्षीय सोच में डूबते नजर आ रहे हैं। इन देशों को लगता है कि वहां के एक विशेष धर्म और जाति के लोग ज्ञान-विज्ञान के संसाधनों से अपना एक अलग स्वर्णयुग रच लेंगे। ऐसे देश ज्ञान-विज्ञान के अपने प्रारंभिक दौर में ही, इतिहास की हजारों वर्ष की राख में से अपनी पौराणिक कथाओं (माइथोलॉजी) के बुझ चुके अंगारों को हवा दे रहे हैं। ऐसा वातावरण बनाया जा रहा है कि जैसे पुराण-कथाओं के नायक इस युग के ज्ञान-विज्ञान पर सवार होकर पूरे देश को किसी नए युग में ले जायेंगे। हालांकि यह भी सच है कि इन देशों का ज्ञान-विज्ञान दुनिया के विकसित देशों से आयात किया हुआ है।

भारतीय उपमहाद्वीप में धार्मिक उन्माद, हिंसा और विस्थापन के धार्मिक और सामाजिक घटनाक्रम के मध्य सुमन केशरी और माने मकर्तच्यान की पुस्तक ‘आर्मेनियाई जनसंहार : ऑटोमन साम्राज्य का कलंक’ (राजकमल प्रकाशन, दिल्ली) का प्रकाशित होना देश के नवजागरण की दिशा में एक बढा हुआ कदम है।

दुनिया में हिंसा के इस माहौल में यह जानना जरूरी है कि प्रथम विश्वयुद्ध के पूर्व तुर्की के ‘ऑटोमन-साम्राज्य’ में करीब 20 लाख आर्मेनियाई रहते थे और उनमें से करीब 15 लाख लोगों को 1915 से 1923 के दौरान आपसी मतभेद के कारण मार डाला गया था। यह जनसंहार 20 वीं शताब्दी का पहला जनसंहार माना जाता है। 21 वीं सदी के वर्ष 2015 में इस जनसंहार को हुए पूरे 100 वर्ष हो गये हैं।

यह पुस्तक नक्शों और रंगीन चित्रों के साथ चार खंडों में विभाजित है। इसके खंड-1 में पीडि़तों के बयान, संस्मरण और साक्षात्कार हैं, खंड-2 में आर्मेनियाई रचनाकारों की लोकप्रिय कविताएं हैं, खंड-3 में कहानियां एवं उपन्यास अंश तथा खंड-4 में जनसंहार पर वैचारिक लेख दिये गये हैं। इस पुस्तक के अंत में एक परिशिष्ट है जिसमें आर्मेनियाई जनसंहार को मान्यता प्रदान करने वाले अथवा इसका संज्ञान लेने वाले देशों की सूची है। इसमें अमेरिका, रूस, जर्मनी, फ्रांस, इटली आदि का नाम तो है, परंतु इंडिया का नाम नहीं है।

इस पुस्तक की भूमिका में लेखिका सुमन केशरी बताती हैं कि जब ऑटोमन साम्राज्य रूस के खिलाफ युद्ध में उतरा तो रूस के पूर्वी इलाकों में रहने वाले रूसी-भाषी आर्मेनियाइयों से अपेक्षा की गई कि वे रूस का साथ न देकर तुर्की के ऑटोमन राज्य का साथ दें। ऐसा न होने पर तुर्कों ने दमन का सहारा लिया और इसकी शुरूआत वहां के नेताओं, बुद्धिजीवियों और व्यापारियों के दमन से हुई।

आर्मेनियायी लोगों के इस नरसंहार का निहितार्थ है कि जो हमारे एजेंडे में, हमारे साथ नहीं है वह हमारा शत्रु है और इसलिए उसका दमन करना हमारा कर्त्तव्य है। इस तरह आर्मेनियाइयों के दमन का यह पाठ सभी के चिंतन-मनन का विषय बन जाता है। इस पुस्तक की विशेषता है कि यह विश्वभर में हुई हिंसात्मक घटनाओं का केवल एतिहासिक दस्तावेज न होकर हिंसा होने और उसे रोकने पर गंभीर विचार-विमर्श भी करती है।

उल्लेखनीय है कि हिंसा करने वालों से कहीं ज्यादा चिंताजनक वे लोग हैं जिनकी मानसिकता हिंसा और क्रूरता को जायज ठहराती है। ऐसे लोग सांप्रदायिक हिंसा की जिम्मेदारी गुंडों पर डालकर फारिग हो लेना चाहते हैं। सुमन केशरी कहती हैं कि ऐसे लोगों को गांधीजी बारं-बार याद दिलाते थे कि ‘गुंडे आकाश से नहीं टपकते, ना ही वे जमीन फाड़कर निकल आते हैं, उन्हें समाज ही पालता है और वही उसे बढ़ावा भी देता है।’

सुमन केशरी बताती हैं कि इस पुस्तक का लक्ष्य विश्व को जनसंहार के बारे में बताना और जागरूक करना है। वे उल्लेख करती हैं कि आर्थिक संकट के क्षणों में अपना वर्चस्व बनाये रखने की राजनीति में यह ‘अन्य’ कब दुश्मन में बदल जाता है यह बात साधारण जनमानस समझ ही नहीं पाता। शासक वर्ग तमाम प्रचार-तंत्रों के माध्यम से अपनी असफलताओं को अल्पसंख्यकों के माथे मढ़ देता है। ऐसे में आम लोगों में भी दुश्मन को खत्म कर देने का जज्बा इतनी तेजी से फैलता है कि वह खुद हैवान में बदल जाते हैं।

जर्मनी के एडोल्फ हिटलर ने भी यह कहा था कि ‘आखिर आज कौन आर्मेनियाईयों की हत्या और तबाही की बात करता हैं?’ जबकि इतिहास गवाह है कि खुद हिटलर ने इसी राह पर चलते हुए यहूदियों और अपने विरोधियों का संहार उसी तरीके से निर्ममता-पूर्वक किया था।

यह पुस्तक उन परिस्थितियों और कारणों की भी खोज करती है जिनसे ऐसी घटनाएं जन्म लेती हैं। इस पुस्तक से हिंसक घटनाओं के पीछे छिपी राजनीति और समूहों के स्वार्थ को समझकर ऐसी घटनाओं के दोहराव को रोका जा सकता है। दुनियाभर के जनसंहारों के अनुभव से यह स्पष्ट है कि किसी भी हिंसा को शुरू करने वाला देश का वर्चस्वशाली वर्ग ही होता है। यह प्रभावशाली समुदाय, जिसे औपचारिक तौर पर शक्तिशाली बनाने वाले सभी साधनों पर प्रमुख रूप से अधिकार प्राप्त होता है, अल्पसंख्यकों को बलपूर्वक अथवा जानलेवा हमला करके कमजोर या समाप्त करने की कोशिश करता है।

अमरीकी समाजशास्त्री और इतिहासकार वहाक्न दाद्रियान ने जनसंहार के कई रूपों की व्याख्या की है जिसमें सांस्कृतिक, अप्रत्यक्ष, प्रतीकात्मक, उपयोगितापरक और सर्वघाती जनसंहार प्रमुख हैं। इसी तरह हिंटन अपने लेख में कहते हैं कि हमें यह सोचना होगा कि हम कुछ मामलों और विषयों पर ही फोकस क्यों करते है? और इसके चलते हमारी जानकारी में क्या शामिल होता है और क्या-क्या छूट रहा होता है? इस विषय के राजनीतिकरण को देखते हुए हमें यह जानना होगा कि हम किस तरह उपलब्ध स्वार्थों और एजेंडों से प्रभावित हो जाते हैं।

तुर्की के ही एक विद्वान साईत छेतिनोलू सामाजिक हिंसा को एक अलग ही आर्थिक परिप्रेक्ष्य में देखते हैं। उनके अनुसार इस तरह की हिंसा का उद्देश्य अल्पसंख्यकों के आर्थिक और सांस्कृतिक आधार को खत्म करना, उनकी संपत्ति और जीवनयापन के साधनों को लूटना प्रमुख होता है। इस पुस्तक में नरसंहारों का इतिहास पढ़ाने के विषय में भी विस्तृत विचार-विमर्श किया गया है। एक दार्शनिक ने इंगित किया है कि नरसंहार में निहित नैतिक पतन की समझ के लिए सबसे अहम है, इसके एतिहासिक मूल्य को जानना। एक समय यह डर था कि इस तरह के नरसंहार को भुला दिया जायेगा, परंतु अब स्थिति ऐसी नहीं है।

नरसंहार के इतिहास की कक्षाओं में ऐसे अनेकानेक विद्यार्थियों और अध्यापकों का जमघट हो गया है जो इसके बारे में मिथ्याधारणाओं, मिथकों और भ्रम पैदा करने वाले राष्ट्रीय आख्यानों और सामान्यत: घटना की सरलीकृत समझ से परिचित हैं। इतिहासकार प्रमाणों के साथ अब इस निष्कर्ष पर पहुंचे हैं कि हिटलर के शासन के आरंभिक वर्षों में यदि मुठ्ठीभर लोगों ने भी मूक दर्शक बनना अस्वीकार कर दिया होता, तो अपराध करने वाले पीडि़तों को बाधा पहुंचती या उन्हें रोका जा सकता था। इसीलिए नरसंहार और सामाजिक हिंसा पर गंभीर चिंतन-मनन करने की जरूरत है। आश्चर्य की बात है कि हिंसा भारत में मनोरंजन का साधन बनी हुई है, जबकि यह हमारे राष्ट्रीय जीवन के उत्थान और पतन को खासा प्रभावित कर रही है। (सप्रेस)

सुमन केशरी

मुज़फ़्फ़रपुर, बिहार में जन्मी कवि सुमन केशरी ने जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय से सूरदास पर पीएच.डी. की है तथा भारत सरकार में प्रशासनिक पद पर कार्य करते हुए यूनिवर्सिटी ऑफ़ वेस्टर्न ऑस्ट्रेलिया, पर्थ से एम.बी.ए. किया है। अध्ययन-अध्यापन में गहरी रुचि के चलते उन्होंने वर्ष 2013 में निदेशक के पद से स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति लेने के बाद आई.टी.एम., ग्वालियर में मैनेजमेंट का अध्यापन किया तथा प्रेप से लेकर आठवीं कक्षा तक की ‘सरगम’ व ‘स्वरा’ नाम से हिन्दी पाठ्य-पुस्तकें तैयार कीं। सुमन केशरी के तीन कविता-संग्रह—याज्ञवल्क्य से बहस, मोनालिसा की आँखें और पिरामिडों की तहों में प्रकाशित हुए हैं। उनकी महाभारत पर आधारित कविताएँ चर्चा का विषय रही हैं। उन्होंने जे.एन.यू. में नामवर सिंह का भी सम्पादन किया है। कविताओं के समग्र विश्लेषण पर आधारित कविताओं के देस में शीर्षक पुस्तक प्रकाशनाधीन है। सुमन केशरी कहानियाँ, समीक्षाएँ, निबन्‍ध, यात्रा-वृत्तान्‍त भी लिखती हैं। इन दिनों वे नाटक में क़लम आजमा रही हैं। उनका लघु नाटक करोना काल में शादी वेब मैगज़ीन शब्दांकन में प्रकाशित हुआ है।

माने मकर्तच्यान

जन्म : 27 मई, 1990; खासाख़, आर्मेनिया गणराज्य। शिक्षा : दौलत राम महाविद्यालय, दिल्ली विश्वविद्यालय से हिन्दी में स्नातक और स्नातकोत्तर की पढ़ाई। जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय से हिन्दी में एम.फिल., वर्तमान में पीएच.डी. की शोधकर्ता। भारत को अपना दूसरा घर बना चुकी माने मकर्तच्यान आर्मेनियाई व रूसी से हिन्दी अनुवाद में अपना विशेष स्थान रखती हैं। माने मकर्तच्यान पिछले 11 वर्षों से भारत में अनेक साहित्यिक व सामाजिक गतिविधियों से जुड़ी रही हैं। उनके साहित्यिक और राजनीतिक लेख और अनुवाद अनेक पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित हुए हैं और चर्चा में रहे हैं। भारत के इकलौते ‘आर्मेनियाई सांस्कृतिक केन्द्र’ की स्थापना और संचालन में उनकी महत्त्वपूर्ण भूमिका रही है। यह केन्द्र भारत और आर्मेनिया के बीच सांस्कृतिक, शैक्षणिक और साहित्यिक सम्बन्‍धों के विकास के लिए प्रतिबद्ध है। माने मकर्तच्यान एक मानवतावादी हैं। इतिहास में जघन्य नरसंहारों पर उन्होंने गहरा शोध किया है और नरसंहारों के विरुद्ध चेतना जागृत करने में वे लगातार सक्रिय हैं।

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