Sarvodaya Press Service

सर्वोदय प्रेस सर्विस – फीचर्स सेवा के छ: दशक

World Health Day 7 April : अधूरी स्वास्थ्य सेवाएं, अधूरे सपने

योगेश कुमार गोयल

पूरी दुनिया इस साल ‘स्वस्थ शुरुआत, आशापूर्ण भविष्य’ विषय के साथ 75वां विश्व स्वास्थ्य दिवस मना रही है। यदि पिछले कुछ वर्षों की स्वास्थ्य दिवस की थीम पर नजर डालें तो 2024 का विषय था ‘मेरा स्वास्थ्य, मेरा अधिकार’, 2023 यह दिवस ‘सभी के लिए स्वास्थ्य’, 2022 में ‘हमारा ग्रह, हमारा स्वास्थ्य’, 2021 में ‘सभी के लिए एक निष्पक्ष, स्वस्थ दुनिया का निर्माण’, 2020 में ‘नर्सों और दाईयों का समर्थन करें विषय के साथ मनाया गया था।

विश्व स्वास्थ्य संगठन का पहला लक्ष्य वैश्विक स्वास्थ्य कवरेज रहा है लेकिन इस लक्ष्य की प्राप्ति के लिए यह सुनिश्चित किया जाना बेहद जरूरी है कि समुदाय में सभी लोगों को अपेक्षित स्वास्थ्य सुविधाएं व देखभाल मिले और लोग अपने स्वास्थ्य को लेकर जागरूक भी हों। स्वास्थ्य को लेकर प्रत्येक व्यक्ति को जागरूक करने तथा लोगों के स्वास्थ्य स्तर को सुधारने के उद्देश्य से ही विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) के बैनर तले प्रतिवर्ष 7 अप्रैल को एक खास थीम के साथ ‘विश्व स्वास्थ्य दिवस’ मनाया जाता है। इस दिवस को मनाए जाने का प्रमुख उद्देश्य दुनिया के प्रत्येक व्यक्ति को इलाज की अच्छी स्वास्थ्य सुविधाएं उपलब्ध कराना, उनका स्वास्थ्य बेहतर बनाना, उनके स्वास्थ्य स्तर को ऊंचा उठाना तथा समाज को बीमारियों के प्रति जागरूक कर स्वस्थ वातावरण बनाते हुए स्वस्थ रखना है।

‘विश्व स्वास्थ्य दिवस’ मनाए जाने की शुरूआत WHO द्वारा 7 अप्रैल 1950 को की गई थी और यह दिवस मनाने के लिए इसी तारीख का निर्धारण WHO की संस्थापना वर्षगांठ को चिन्हित करने के उद्देश्य से ही किया गया था। WHO की स्थापना के साथ ही 1948 में विश्व स्वास्थ्य दिवस की नींव भी रख दी गई थी। दरअसल उस समय लोगों की सेहत को बढ़ावा देने और उन्हें गंभीर बीमारियों से सुरक्षित रखने के उद्देश्य से दुनिया के कई देशों ने मिलकर दुनियाभर में ठोस कार्य करने की जरूरत पर बल दिया और आखिरकार विश्व स्वास्थ्य दिवस की नींव रखने के दो वर्ष बाद सन् 1950 में पहली बार 7 अप्रैल को यह दिवस मनाया गया। संयुक्त राष्ट्र का अहम हिस्सा ‘डब्ल्यूएचओ’ दुनिया के तमाम देशों की स्वास्थ्य संबंधी समस्याओं पर आपसी सहयोग और मानक विकसित करने वाली संस्था है, जिसका प्रमुख कार्य विश्वभर में स्वास्थ्य समस्याओं पर नजर रखना और उन्हें सुलझाने में सहयोग करना है। इस संस्था के माध्यम से प्रयास किया जाता है कि दुनिया का प्रत्येक व्यक्ति शारीरिक, मानसिक एवं सामाजिक रूप से पूर्ण स्वस्थ रहे।

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समूचे विश्व में जन-स्वास्थ्य से जुड़े कुछ वैश्विक तथ्यों पर ध्यान दिया जाए तो हालांकि टीकाकरण, परिवार नियोजन, एचआईवी के लिए एंटीरिट्रोवायरल उपचार तथा मलेरिया की रोकथाम में सुधार हुआ है लेकिन चिंता की स्थिति यह है कि अभी भी दुनिया की आधी से अधिक आबादी तक आवश्यक स्वास्थ्य सुविधाओं की पहुंच नहीं है। विश्वभर में 80 करोड़ से भी ज्यादा लोग अपने घर के बजट का कम से कम दस फीसदी स्वास्थ्य देखभाल सेवाओं पर खर्च करते हैं। यही नहीं, स्वास्थ्य देखभाल सेवाओं पर बड़ा खर्च करने के कारण दस करोड़ से ज्यादा लोग अत्यधिक गरीबी रेखा के नीचे चले जाते हैं।

चिंता की स्थिति यह है कि पिछले कुछ दशकों में एक ओर जहां स्वास्थ्य क्षेत्र ने काफी प्रगति की है, वहीं कुछ वर्षों के भीतर एड्स, कैंसर जैसी जानलेवा बीमारियों के प्रकोप के साथ हृदय रोग, मधुमेह, क्षय रोग, मोटापा, तनाव जैसी स्वास्थ्य संबंधी समस्याएं भी तेजी से बढ़ी हैं। ऐसे में स्वास्थ्य क्षेत्र की चुनौतियां निरन्तर बढ़ रही हैं। वैसे तो दुनिया के तमाम देश बीते कुछ दशकों से स्वास्थ्य के क्षेत्र में लगातार प्रगति कर रहे हैं लेकिन कोरोना जैसे वायरसों के समक्ष जब अमेरिका जैसे विकसित देश को भी बेबस अवस्था में देखा गया और वहां भी स्वास्थ्य कर्मियों के लिए जरूरी सामान की भारी कमी नजर आई, तब पूरी दुनिया को अहसास हुआ कि अभी भी जन-जन तक स्वास्थ्य सुविधाएं पहुंचाने के लिए बहुत कुछ किया जाना बाकी है। विश्व स्वास्थ्य संगठन तो स्वयं मानता है कि दुनिया की कम से कम आधी आबादी को आज भी आवश्यक स्वास्थ्य सेवाएं उपलब्ध नहीं हैं। विश्वभर में अरबों लोगों को स्वास्थ्य देखभाल हासिल नहीं होती। करोड़ों लोग ऐसे हैं, जिन्हें रोटी, कपड़ा और मकान जैसी मूलभूत आवश्यकताओं तथा स्वास्थ्य देखभाल में से किसी एक को चुनने पर विवश होना पड़ता है।

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यदि भारत की बात की जाए तो भारतीय समाज में सदियों से धारणा रही है ‘जान है तो जहान है’ तथा ‘पहला सुख निरोगी काया, दूजा सुख घर में हो माया’। ‘सर्वे भवन्तु सुखिनः, सर्वे सन्तु निरामया’ अर्थात् ‘सब सुखी हों और सभी रोगमुक्त हों’ मूलमंत्र में यही स्वास्थ्य भावना निहित है। कोरोना काल की अवधि को छोड़ दिया जाए तो देश में पिछले दशकों में आर्थिक दृष्टि से तीव्र गति से विकास तो अवश्य हुआ लेकिन कड़वा सच यह भी है कि तेज गति से आर्थिक विकास के बावजूद इसी देश में करोड़ों लोग कुपोषण के शिकार हैं।

राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण के अनुसार तीन वर्ष की अवस्था वाले तीन फीसदी से भी अधिक बच्चों का विकास अपनी उम्र के हिसाब से नहीं हो सका है और चालीस फीसदी से अधिक बच्चे अपनी अवस्था की तुलना में कम वजन के हैं। इनमें करीब अस्सी फीसदी बच्चे रक्ताल्पता (अनीमिया) से पीडि़त हैं। एक रिपोर्ट के अनुसार प्रत्येक दस में से सात बच्चे अनीमिया से पीडि़त हैं जबकि महिलाओं की तीस फीसदी से ज्यादा आबादी कुपोषण की शिकार है। कुछ रिपोर्टों के मुताबिक देश में अभी भी सार्वजनिक स्वास्थ्य सेवाएं पूरी तरह मुफ्त नहीं हैं और जो हैं, उनकी स्थिति संतोषजनक नहीं है। भारत में स्वास्थ्य सेवाओं को देखा जाए तो स्वास्थ्य के क्षेत्र में प्रशिक्षित लोगों की बड़ी कमी है। यहां डॉक्टरों तथा आबादी का अनुपात संतोषजनक नहीं है, बिस्तरों की उपलब्धता बेहद कम है।

बहरहाल, विश्व स्वास्थ्य दिवस के माध्यम से जहां समाज को बीमारियों के प्रति जागरूक करने का प्रयास किया जाता है, वहीं इसका सबसे महत्वपूर्ण बिन्दु यही होता है कि लोगों को स्वस्थ वातावरण बनाकर स्वस्थ रहना सिखाया जा सके। दरअसल विश्व स्वास्थ्य संगठन के मुताबिक शारीरिक, मानसिक और सामाजिक रूप से पूर्ण स्वस्थ होना ही मानव-स्वास्थ्य की परिभाषा है।

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यह बेहद चिंता का विषय है कि दुनिया की करीब 30 प्रतिशत आबादी के पास बुनियादी स्वास्थ्य उपचार तक पहुंच नहीं है और करीब 200 करोड़ लोग विनाशकारी अथवा खराब स्वास्थ्य देखभाल लागत का सामना कर रहे हैं, जिसमें काफी असमानताएं हैं, जो सबसे वंचित परिस्थितियों में लोगों को प्रभावित कर रही हैं। हालांकि स्वास्थ्य का अधिकार एक ऐसा मौलिक मानवाधिकार है, जिसके तहत प्रत्येक व्यक्ति को बगैर किसी वित्तीय बोझ के, जब भी जरूरत हो, स्वास्थ्य देखभाल तक पहुंच मिलनी चाहिए।

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