Sarvodaya Press Service

सर्वोदय प्रेस सर्विस – फीचर्स सेवा के छ: दशक

जुगनू जहां भी रहे ,उजाला ही फैलाते रहे

श्रद्धांजलि

श्रवण गर्ग

बिहार के जाने-माने पत्रकार जुगनू शारदेय का 15 दिसंबर को दिल्ली के एक वृद्धाश्रम में निधन हो गया। वह निमोनिया से ग्रस्त हो गए थे और उन्हें वृद्धाश्रम की गढ़मुक्तेश्वर स्थित शाखा से दिल्ली लाया गया था। पिछले कुछ समय से वह गुमनामी में रह रहे थे। जुगनू शारदेय को धारदार लेखनी और मनमौजी जीवनशैली के लिए जाना जाता था। जुगनू शारदेया बिहार में 1974 के जेपी आंदोलन का जाना-पहचाना चेहरा थे। वह फणीश्वर नाथ रेणु के काफी करीबी माने जाते थे। इतना ही नहीं रेणु और शारदेय 1974 में पटना कॉफी हाउस में अक्सर आते थे।

जुगनू शारदेय को याद करने के लिए सैंतालीस साल पहले के ‘बिहार छात्र आंदोलन’ (1974) के दौरान पटना में बिताए गए दिनों और महीनों में वापस लौटना कोई आसान काम नहीं था। जुगनू के बहाने और भी कई लोगों और घटनाओं का भी स्मरण करना ज़रूरी हो गया था।आंदोलन के प्रारम्भिक दिनों में ‘सर्वोदय साप्ताहिक ‘ के लिए दिल्ली से रिपोर्टिंग करने के लिए प्रभाष जोशी जी ने कुछ ही दिनों के लिए पटना भेजा था पर जे पी ने लगभग पूरे साल के लिए वहाँ रोक लिया।पटना में रहते हुए काम करने के लिए जुगनू से मिलना और दोस्ती करना ज़रूरी था। उसी दौरान डॉ.लोहिया के सहयोगी रहे प्रसिद्ध लेखक और पत्रकार ओमप्रकाश दीपक जी से भी वहाँ मुलाक़ात और मित्रता हो गई।

जुगनू का पहला आलेख दीपक जी द्वारा सम्पादित समाजवादी पार्टी की पत्रिका ‘जन’ में ही 1968 में प्रकाशित हुआ था। दीपक जी ‘दिनमान’ के लिए पटना से आंदोलन पर लिख रहे थे।अतः दोनों के बीच पहले से ही काफ़ी आत्मीय सम्बंध थे। बाद में मैं भी दोनों के साथ जुड़ गया। पटना में हम तीनों का एक छोटा सा समूह बन गया था। जे पी के कदम कुआँ स्थित निवास के नज़दीक तब दूसरी मंज़िल पर स्थित एक रेस्तराँ हमारी नियमित बैठकों का अड्डा था।दीपक जी बाद में नहीं रहे पर जुगनू से मिलना-जुलना या फ़ोन पर बातचीत करना हाल के कुछ सालों तक बना रहा।

जुगनू शारदेय

जुगनू बिहार की राजनीति और वहाँ की पत्रकारिता के ज्ञानकोश थे। पटना में रहते हुए अपनी किताब ‘बिहार आंदोलन; एक सिंहावलोकन ‘ के लेखन के दौरान तथ्यों की पुष्टि के लिए उनसे भी मदद लेना पड़ी थी।बिहार छोड़ने के बाद मैं देश में कई स्थानों पर रहा पर जुगनू से सम्पर्क बराबर बना रहा । दिल्ली, भोपाल ,इंदौर आदि स्थानों पर तो वे मिलने ले लिए भी आते रहे। मेरे आग्रह पर लिखते भी रहे।

सत्तर के दशक के बिहार की राजनीति और पत्रकारिता आज के जमाने से बिलकुल अलग थी।’इंडियन नेशन’ और ‘सर्च लाइट’ अंग्रेज़ी के तथा ‘आर्यावर्त’ और ‘प्रदीप’ हिंदी के समाचार पत्र हुआ करते थे। आज के जमाने में कल्पना करना भी कठिन होगा कि लालू यादव, सुशील मोदी, रामबिलास पासवान , शिवानंद तिवारी आदि तब एक साथ मिलकर काम करते थे। बाबा नागार्जुन और रेणु जी भी आंदोलन के साथ नज़दीक से जुड़े हुए थे। जुगनू एक ऐसी खिड़की थे जिसके ज़रिए बिहार को समग्र रूप से बिना किसी लाग-लपेट के देखा और समझा जा सकता था। वे एक ऐसा बिहार थे जो देश भर में घूमता रहता था।बिहार के पत्रकार जगत में उनके मित्रों की संख्या कम थी पर देश के बाक़ी हिस्सों में अपार थी।

जुगनू ने जीवन जीने की जिस शैली को अपने साथ जोड़ लिया था वे उससे अपने को अंत तक मुक्त नहीं कर पाए।इस दिशा में उन्होंने शायद संकल्पपूर्वक कोशिश भी नहीं की । मुंबई के टाटा मेमोरियल अस्पताल में इलाज करवाते रहने के बाद भी नहीं।वे जीवन भर अभावों में जीते रहे पर ईमानदारी नहीं छोड़ी।वैचारिक मतभेदों के चलते मित्रों के साथ उनके झगड़े होते रहे पर उन्होंने समझौते नहीं किए। अपने शारीरिक कष्टों और अभावों का अपनी सीमित शक्ति के साथ मुक़ाबला करते रहे पर किसी से कोई माँग नहीं की। अपने अंतिम दिनों में दिल्ली के वृद्धाश्रम में रहते हुए जिन परिस्थितियों में उनका निधन हुआ उनसे उनके कष्टों की पराकाष्ठा की कल्पना की जा सकती है। विनम्र श्रद्धांजलि के साथ दुःख की इस घड़ी में अभी इतना ही।

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