हमारे राजनीतिक-सामाजिक फलक पर हाल के वर्षों में ‘आम आदमी पार्टी’ के बाद मजाक-मजाक में बनी ‘कॉकरोच जनता पार्टी’ का प्रादुर्भाव हुआ है। गठन के कुछ महीनों में ही उसने युवाओं और आम लोगों के बीच खासी पहचान और कहीं-कहीं लोकप्रियता हासिल कर ली है। सवाल है कि क्या वह आम जनता की उम्मीनदों पर खरी उतर पाएगी? क्या वह आम राजनीतिक, आर्थिक प्रलोभनों को पहचानते हुए उन्हें बरका पाएगी?
हाल के दिनों में ‘कॉकरोच जनता पार्टी’ (सीजेपी) के नेतृत्व में चला युवा आंदोलन एक ताज़ी हवा के झोंके की तरह आया है। ऐसे माहौल में, जहां असहमति को दबाने और लोकतंत्र के स्तंभों को ध्वस्त करने की कोशिशों से घुटन महसूस हो रही है, युवाओं का यह कड़ा विरोध किसी जेल की खिड़कियों और दरवाज़ों के अचानक खुलने जैसा दिखाई देता है। वर्ष 2020-21 में किसानों के सालभर चले आंदोलन की तरह ही, सैकड़ों निडर युवाओं ने एक निरंकुश और अहंकारी सरकार को झुकने पर मजबूर कर दिया है। जैसा कि ‘सीजेपी’ के संस्थापक अभिजीत दिपके ने तत्कालीन शिक्षामंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफा देने के बाद कहा था, “झुकती है दुनिया, झुकाने वाला चाहिए।”
‘सीजेपी’ का फौरी लक्ष्यों को हासिल करने के बाद संघर्ष का एक और चरण शुरू हो रहा है। यह देखना बाकी है कि क्या यह मुख्य रूप से शिक्षा क्षेत्र में बहुत ज़रूरी सुधारों पर केंद्रित होगा, या उससे आगे बढ़कर सरकार की जवाबदेही और अन्य ज़रूरी मुद्दों पर ध्यान देगा, जिन्हें ‘सीजेपी’ का समर्थन करने वाले विभिन्न सामाजिक आंदोलनों (किसानों, महिलाओं, मज़दूरों, पर्यावरणविदों आदि) द्वारा उठाया जा रहा है। पूरे देशभर से लोग मांगें और सुझाव रखेंगे और ‘सीजेपी’ के सामने इन पर गौर करने की मुश्किल चुनौती होगी।
जंतर-मंतर पर मोर्चे के समय मध्य जुलाई में कॉकरोच जनता पार्टी और कई दूसरे जन-आंदोलनों के बीच हुई एक ऑनलाइन मीटिंग में, तत्कालीन मुद्दों से लेकर दीर्घकालीन स्थायी महत्व के मुद्दों पर चर्चा हुई। कॉकरोच जनता पार्टी का स्वाभाविक रुख यही था कि अभी के लिए उन्हें तत्कालीन मुद्दों पर ही ध्यान देने दिया जाए। लेकिन अब, एक जीत के बाद, यह उन आंदोलनों की ज़िम्मेदारी बन जाती है, जो लंबे समय से सक्रिय हैं कि वे ‘सीजेपी’ को यह सोचने में मदद करें कि वह अगले कुछ सालों में क्या हासिल करना चाहती है। यह इसलिए ज़रूरी है ताकि भारत और दूसरी जगहों पर हुई क्रांतियों के इतिहास से सीखा जा सके।
विशेषकर, उन बड़ी गलतियों से सीखने की जरूरत है, जो आंदोलन के पास किसी भ्रष्ट मंत्री या पूरी सरकार को हटाने जैसे तत्कालीन मुद्दों से आगे कोई स्पष्ट नजरिया न होने की वजह से हुईं हैं। सरकार बदलने से ज़्यादा न्याय की दिशा में बुनियादी बदलाव नहीं आए हैं, आर्थिक, राजनीतिक और सामाजिक व्यवस्थाओं में कुछ खास बदलाव नहीं हुआ है और न ही प्रकृति से टूटे रिश्ते को फिर से बनाने में मदद मिली है। यहां तक कि हाल ही में ज़ेन-ज़ी और अन्य दूसरे युवा आंदोलनों या लैटिन अमेरिका और दूसरी जगहों पर क्रांतिकारी वामपंथी पार्टियों के सरकार बनाने के अनुभवों से भी ज़रूरी सबक मिलते हैं।
कुछ खास प्रलोभन या मुद्दे जिनसे ‘सीजेपी’ को सावधान रहने की ज़रूरत है :
1. मौजूदा सरकार के साथ मिल जाना, जो किसी आंदोलन की मांगों को ‘मानने’ का दिखावा करती है और फिर कुछ छूट व लालच देती है। जैसे, सरकार में ऊंचे पद देना, जहां ऊपर से तो लगता है कि आप मनचाहे बदलाव ला सकते हैं, लेकिन बाद में पता चलता है कि व्यवस्था इतनी ताकतवर और अपने ढर्रे पर चलने वाली है कि कोई बड़ा बदलाव नहीं होने देती। ऐसे पदों की पेशकश को स्वीकार करने से बचें, चाहे वे कितने भी आकर्षक क्यों न हों।
2. विपक्षी पार्टियों के बहकावे में आना जिन्हें किसी बड़े आंदोलन में मौका दिखता है, या उनमें से किसी एक या ज़्यादा पार्टियों के साथ खुलकर जुड़ जाना; इससे सत्ता में बैठे लोगों को आंदोलन को किसी खास पार्टी द्वारा भड़काया गया बताने का आसान बहाना मिल जाता है। ऐसी पार्टियों से समर्थन ज़रूर लें, लेकिन किसी एक के साथ बहुत ज़्यादा न जुड़ें; अपनी राजनीतिक स्वतंत्रता बनाए रखें।
3. चुनाव जीतने के लिए व्यापक जन-समर्थन के भरोसे खुद को राजनीतिक पार्टी में बदल लेना। अन्ना हजारे और अन्य लोगों द्वारा शुरू किया गया भ्रष्टाचार-विरोधी आंदोलन ‘आम आदमी पार्टी’ में बदल गया था, जो पार्टी की राजनीति के गंदे माहौल में नई हवा लाने का बहुत बड़ा वादा था। जिन जगहों पर पार्टी ने सरकार बनाई, वहां कुछ प्रगतिशील कदम उठाने के बावजूद, आंदोलन के शुरुआती नैतिक मूल्यों को छोड़ देने के कारण इसके कुछ सबसे प्रगतिशील सदस्यों और समर्थकों ने पार्टी छोड़ दी थी। समाज में ज़्यादातर बड़े बदलाव जन-आंदोलनों से ही आए हैं, इसलिए ‘गैर-दलीय राजनीतिक’ प्रक्रिया का हिस्सा बने रहना ज़्यादा ज़रूरी हो सकता है।
4. एक ऐसा संगठन बन जाना जिसमें सीढ़ीदार ढांचा बहुत सख्त हो और कुछ ही लोगों (संस्थापकों, शुरुआती नेताओं) की आवाज़ हावी हो। कई युवा आंदोलनों की एक अच्छी बात यह होती है कि उनमें सत्ता किसी एक के हाथ में केन्द्रित नहीं होती और कई जगहों से आवाज़ें उठ सकती हैं और उसमें खुलापन होता है, लेकिन यह बाद में तेज़ी से सत्ता के केंद्रीकरण में बदल सकता है। सचमुच लोकतांत्रिक और जनता के आधार वाला बने रहें।
5. तत्कालीन मांगों के पूरे होने के बाद बदलाव के व्यापक दृश्य पर ध्यान न देना। दूरगामी सोच न होने से अस्पष्टता और तालमेल की कमी हो सकती है। उद्देश्य बदल सकते हैं, लेकिन उन्हें साफ़ और केन्द्रित रखें।
6. सिर्फ़ मौजूदा शासन के ढांचे के अंदर ‘सुधार’ तक ही सीमित रहना, जबकि ज़्यादा बुनियादी बदलावों के लिए भी काम करना चाहिए, भले ही वह सिर्फ़ शिक्षा क्षेत्र में ही क्यों न हों। सिर्फ़ ऊपरी सुधार करने वाले नहीं, बल्कि मूलभूत बदलाव लाने वाले बनें।
क्रांतिकारी आंदोलनों की एक बुनियादी समस्या पूर्व या भविष्य की कल्पना की कमी रही है, यानी इस बात की पहले से कल्पना न करना कि हमारे फौरी मकसद पूरे होने के बाद हम किस तरह का समाज चाहते हैं। पारंपरिक वामपंथियों का ‘सत्ता पर कब्ज़ा करने’ पर ज़्यादा ध्यान देने से बेशक सामाजिक कल्याण में कुछ बहुत ज़रूरी सुधार हुए हैं, लेकिन इससे सत्ता या पब्लिक या प्राइवेट सेक्टर में शक्ति के जमावड़े को कम करने या प्रकृति के खतरनाक हद तक दोहन से दूर हटने में कोई खास मदद नहीं मिली है।
गांधी ने बहुत पहले ही चेतावनी दी थी कि गोरे लोगों से भूरे लोगों के हाथों में सिर्फ़ सत्ता का स्थानांतरण हमें स्वराज तक नहीं ले जाएगा। जैसा कि ‘सीजेपी’ अच्छी तरह जानती है, मंत्री बदलने या परीक्षा व्यवस्था की कमियों को दूर करने से, ऐसा शिक्षा क्षेत्र नहीं बनेगा, जो, उदाहरण के लिए, डिग्री पाने और सार्थक रोज़गार पाने के बीच की भारी खाई को पाट सके।
भले ही यह सिर्फ़ शिक्षा के क्षेत्र में ही हो, लेकिन इसमें बड़े बदलाव की ज़रूरत है ताकि ज़्यादा से ज़्यादा लोगों का समर्थन मिल सके। हमें उस निजीकरण से दूर हटना होगा, जो परिवारों को ऐसी फ़ीस देने के लिए मजबूर करता है जिसे वे वहन नहीं कर सकते। हमें ऐसी शिक्षा चाहिए, जो गुणवत्तापूर्ण हो और जिसमें मातृभाषा में सीखने का मौका मिले, ताकि बच्चे और युवा अपनी संस्कृति और पर्यावरण व परिवेश से जुड़े रहें और साथ ही दूसरों के बारे में भी सीखें।
शिक्षा ऐसी हो, जो बच्चों को खुद सीखने वाला और खोजकर्ता बनाए, न कि सिर्फ़ शिक्षक की बातों को चुपचाप सुनने वाला; शिक्षा मज़ेदार और रचनात्मक हो; इसमें सिर्फ़ किताबी ज्ञान के बजाय अनुभव से सीखने को प्राथमिकता दी जाए; और केवल डिग्री वालों के बजाय प्रकृति और हुनरमंद लोगों से सीखने को बढ़ावा दिया जाए। इसमें संभवतः परीक्षा पर बहुत ज़्यादा ज़ोर देने के बजाय, ज्ञान और कौशल बढ़ाने के लिए मिलकर सीखने के तरीकों को अपनाया जाए। इन सबके ज़रिए, युवाओं को रोज़गार के अलग-अलग रास्ते खोजने और नए रास्ते बनाने के लिए सशक्त बनाया जाए।
‘सीजेपी’ ने जिस समझदारी से मौजूदा अभियान चलाया है, उसे देखते हुए लगता है कि इसके संचालक ऊपर बताई गई कुछ प्रलोभनों में नहीं फंसेंगे। उनके मन में सचमुच एक क्रांतिकारी सोच है, भले ही उन्होंने अभी उसे खुलकर न बताया हो। हमें यह भी भरोसा है कि वे उन आंदोलनों के साथ मिलकर काम करने के लिए तैयार होंगे जो दूसरे क्षेत्रों (स्वास्थ्य, प्रकृति और पर्यावरण, लैंगिक न्याय, लोकतंत्र, भोजन और खेती, रचनात्मक आजीविका इत्यादि) में बड़े बदलाव चाहते हैं। उनके मुख्य प्रवक्ताओं में से एक, सौरव दास, ‘क्लाइमेट एक्शन फ्रंट’ के संस्थापक भी हैं और जलवायु कार्यकर्ता सोनम वांगचुक भी इसमें शामिल हैं; इससे पता चलता है कि ऐसा करना मुश्किल नहीं होना चाहिए। शायद इससे ‘गैर-दलीय राजनीति’ का एक बड़ा गठबंधन बन सके।
यह एक बड़ी चुनौती है और पहले भी कई बार (जैसे किसान आंदोलन के बाद) ऐसी कोशिशें नाकाम रही हैं, लेकिन भारत (और दुनिया) को इसकी बहुत ज़रूरत है, इसकी बार-बार कोशिश की जानी चाहिए। युवाओं की ऊर्जा और नई रचनात्मक सोच इसमें बदलाव ला सकती है। क्या ‘सीजेपी’ द्वारा लाई गई ताज़ी हवा एक ऐसे सकारात्मक तूफ़ान में बदल सकती है, जो आज के बेहद अन्यायपूर्ण समाज की नींव को हिला दे और एक ज़्यादा न्यायपूर्ण समाज की राह दिखाए? (सप्रेस)