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उत्तराखंड : सरला बहन का बचाया जंगल अंतिम सांसें गिन रहा है

उत्तराखंड : सरला बहन का बचाया जंगल अंतिम सांसें गिन रहा है

जिस जंगल को महात्मा गांधी की पुत्री मानी जाने वाली सरला बहन उर्फ कैथरीन मैरी हेइलमैन ने बचाया हो उस पर अब फिर से संकट के बादल घिर रहे हैं। वजह है, पूंजी पीटने की हवस में बढ़ाया जा रहा...

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जिस जंगल को महात्मा गांधी की पुत्री मानी जाने वाली सरला बहन उर्फ कैथरीन मैरी हेइलमैन ने बचाया हो उस पर अब फिर से संकट के बादल घिर रहे हैं। वजह है, पूंजी पीटने की हवस में बढ़ाया जा रहा पर्यटन और उसकी खातिर बनाई जाने वाली चौड़ी सड़कें। क्या होगा इसका नतीजा?


उत्तराखंड में बागेश्वर जिले के बाली घाट से कोटमन्या तक मौजूदा मोटर मार्ग की दूरी लगभग 54 किमी है। यहां सघन वनों के बीच से गुजर रही सड़क के दोनों ओर हिमालय का अद्भुत नजारा है, लेकिन भारी संख्या में वनों के कटान की संभावना से लोग बहुत चिंतित है। यहां पर महात्मा गांधी की शिष्या सरला बहन का आश्रम है जो दुनिया में ‘हिम दर्शन कुटीर’ के नाम से जाना जाता है। यहां सरला बहन ने अपने जीवन के अंतिम दिन पूरे किये थे। वर्ष 1980 में भी जब यहां पर पेड़ों के कटान की संभावना थी, तब सरला बहन ने तत्कालीन प्रधानमंत्री श्रीमती इंदिरा गांधी को पत्र लिखकर इसका विरोध किया था। नतीजे में सड़क चौड़ीकरण के नाम पर पेड़ों का कटान रोक दिया गया था। 

गौरतलब है कि सरला बहन (कैथरीन मैरी हेइलमैन; 1901–1982) एक प्रसिद्ध अंग्रेज़ गांधीवादी सामाजिक कार्यकर्ता थीं, जिन्होंने उत्तराखंड के कुमाऊं क्षेत्र में महिला सशक्तिकरण, शिक्षा और पर्यावरण संरक्षण के लिए कार्य किया। उन्होंने ‘चिपको आंदोलन’ की नींव रखने में मदद की। ‘चिपको आंदोलन’ की शुरुआत करने वाले सुन्दरलाल बहुगुणा और चंडीप्रसाद भट्ट सरला बहन से प्रभावित थे। उन्हें महात्मा गांधी की दो अंग्रेज़ बेटियों में से एक (मीराबेन के साथ) माना जाता है।   

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ऐसी सरला बहन द्वारा बचाया गया वन अब फिर कटाई के संकट का सामना कर रहा है। यहां पर बड़ी संख्या में बांज, बुरांश, काफल, उतीश जैसी दुर्लभ वन-प्रजातियों के वृक्ष मौजूद हैं जो उत्तराखंड (हिमालय) में लगभग 6 से 9 हज़ार फीट ऊंचाई के बीच पाये जाते हैं। यहां लोग काफल जैसे स्वादिष्ट जंगली फल का भरपूर आनंद उठाते हैं। गांव के लोग भी आने-जाने वाले यात्रियों को टोकरियों में लेकर काफल उपलब्ध कराते हैं। यहां पर अभी सड़क मार्ग की चौड़ाई 5 से 6 मीटर है जिसमें दो गाड़ियां आसानी से आना – जाना कर सकती हैं। लोगों का कहना है कि यदि यहां पर 12 से 18 मीटर चौड़ी सड़क बनेगी तो यहां के पर्यावरण को भारी नुकसान होगा। इससे पर्वत के ऊपर के वन के अनगिनत दुर्लभ प्रजाति के पेड़ कट जाएंगे।

काबिले गौर है कि यहां पर दुर्लभ वन्य जीव प्रजाति ‘कस्तूरी मृग अनुसंधान केंद्र’ है। इसका अस्तित्व यहां की जैव-विविधता पर टिका हुआ है। यहां से बरड़ और पुंगर नदियां निकलती हैं। बरड नदी थल के पास राम गंगा में मिलती है और पुंगर नदी बालीघाट में सरयू में मिल जाती है। ये दोनों कोसी की सहायक नदियां हैं और आगे गंगा में मिलती हैं। वन संपदा से घिरे हुए इस पर्वतमाला के दोनों ओर सैकड़ों गांव बसे हुए हैं जहां से लोगों की प्यास बुझाने वाले जलस्रोत और खेती-बाड़ी चलती है। यहां शीतकाल में सघन बर्फ भी पड़ती है जिसको देखने के लिए मसूरी की तरह ही लोग मैदानों से वहां पहुंच जाते हैं। यह उत्तराखंड का एक सुंदर मनमोहक पर्यटन केंद्र भी है जहां प्रतिवर्ष हजारों की संख्या में लोग ‘हिम दर्शन कुटीर’ को देखने और यहां की मनोरम प्राकृतिक छटा का आनंद लेने के लिए पहुंचते हैं।

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गांधीवादी डॉ० रमेश पंत का कहना है कि यहां पर लगभग 13 हजार से अधिक हरे पेड़ों पर निशान लगाए गये हैं जिन्हें सड़क चौड़ीकरण के नाम पर काटने की तैयारी चल रही है। इसका वे विरोध कर रहे हैं। उन्होंने कहा है कि उच्च न्यायालय, नैनीताल में भी याचिका दायर की गई है जिस पर आगे काम चल रहा है, लेकिन उनकी चिंता है कि विकास के नाम पर सरकार का पक्ष अधिक सुना जा रहा है और पर्यावरण को जो न्याय मिलना चाहिए उस विषय पर खामोशी लगती है। दूसरी ओर, गर्मी से राहत पाने के लिए मैदानी क्षेत्र के लोगों का हिमालय की तरफ पहले से अधिक आना – जाना बढ़ गया है। इन पर्यटकों की सुविधा के लिए पर्वतों की शांत वादियों में पर्यावरण के साथ बहुत बड़ी छेड़छाड़ हो रही है। महसूस किया जा रहा है कि मनुष्य कुछ क्षणों की सुविधा के लिए बहुत बड़ी बर्बादी की तरफ कदम बढ़ा रहा है। 

उत्तराखंड जैसे हिमालयी राज्य में, जहां जलवायु परिवर्तन का प्रभाव बहुत तेजी से बढ़ रहा है और जहां की बची- खुची दुर्लभ वन प्रजातियों का इस तरह से नुकसान होगा तो आस-पास के गांव के जलस्रोत और यहां से निकलने वाली नदियां सूख सकती हैं। नंगे पहाड़ बरसात के समय तेजी से फिसलने लगेंगे। बार-बार इन गंभीर विषयों पर चर्चा भी हो रही है, लेकिन लापरवाही का अंतहीन सिलसिला जारी है।

‘सरला आश्रम’ की साधिका शोभा बहन के नेतृत्व में स्थानीय वन पंचायत सरपंचों, ग्राम प्रधानों और क्षेत्र के सामाजिक कार्यकर्ताओं ने सरकार को अक्टूबर 2024 में एक पत्र लिखा था जिसमें मांग की गई थी कि यहां मौजूदा सड़क पर, जहां अंधे मोड़ के कारण आने-जाने में दिक्कत महसूस होती है, का सुधार करने की आवश्यकता है। उनकी इस मांग को प्रख्यात समाजसेविका और पद्मश्री राधा बहन का समर्थन है, लेकिन जिस तरह से हरे पेड़ों को काटने के लिए बड़ी संख्या में निशान लगाए गए हैं उससे पेड़ों का व्यापारीकरण हो सकता है, अधिक राजस्व भी मिल जायेगा, लेकिन यहां की भौगोलिक संरचना के अनुसार जितनी चौड़ी सड़क प्रस्तावित की जा रही है उसके अनुसार पर्याप्त स्थान ही उपलब्ध नहीं है।

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जरूरी है कि विकास ऐसा हो जो आफत खड़ी न करे। इस अनियोजित कार्य से हिमालय के शिखर तक पहुंचना आसान नहीं होगा क्योंकि पिछले वर्षों में जहां-जहां भीषण बाढ़ और भूस्खलन से तबाही हुई है वहां अनेक स्थान ‘डेंजर जोन’ (खतरनाक इलाकों) का रूप ले चुके हैं। यहां भविष्य में किसी भी प्रकार का निर्माण करना और अधिक जोखिमपूर्ण हो गया है। परिणाम स्वरूप भविष्य में भूस्खलन की बड़ी समस्या बढ़ती जाएगी जो उत्तराखंड में जगह-जगह दिखाई दे रही है। इसलिए लोगों का संदेश है कि हिमालय के वनों को उजाड़ने से कोई लाभ नहीं मिलेगा। अच्छा हो कि जलवायु संकट से बचने के लिए प्राकृतिक वनों की रक्षा करना सर्वोपरि उद्देश्य माना जाए। (सप्रेस)

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