दिल्ली में होने वाली कॉकरोच जनता पार्टी की रैली को केवल सरकार या किसी व्यक्ति के विरोध के रूप में देखना पर्याप्त नहीं होगा। यह रैली अगर सत्ता परिवर्तन की मांग से आगे बढ़कर उन संस्थाओं और प्रक्रियाओं में बदलाव का सवाल उठाती है, जो सत्ता को जवाबदेह बनाती हैं, तो इसका महत्व कहीं व्यापक होगा।
दिल्ली में होने वाली युवाओं की रैली को केवल एक और विरोध-प्रदर्शन के रूप में देखना शायद ठीक नहीं होगा। सवाल केवल यह नहीं रह जाता कि ज्ञानेश कुमार जाएंगे या नहीं? सवाल यह बन जाता है कि ऐसी व्यवस्था क्यों न बनाई जाए, जिसमें भविष्य में कोई भी सरकार अपनी पसंद के ऐसे व्यक्ति को उसी प्रक्रिया से न ला सके, जिससे संस्थाओं की विश्वसनीयता पर सवाल खड़े हों। यानी बात सत्ता परिवर्तन से आगे व्यवस्था परिवर्तन की हो रही है। यह शुरुआत महत्वपूर्ण है, लेकिन इसे मंजिल मान लेना जल्दबाजी होगी।
कुछ महीने पहले युवाओं का एक बड़ा आंदोलन शिक्षा और परीक्षा व्यवस्था से जुड़े सवालों पर हुआ था। आंदोलन का दबाव बढ़ा और तत्कालीन शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान को इस्तीफा देना पड़ा। यह किसी भी जनआंदोलन की महत्वपूर्ण उपलब्धि थी। लेकिन अब पीछे मुड़कर एक असुविधाजनक सवाल पूछना जरूरी है क्या मंत्री बदलने से शिक्षा व्यवस्था बदल गई?
नया शिक्षा मंत्री आने के बाद अभी तक वैसा कोई बड़ा परीक्षा घोटाला सामने नहीं आया, जैसा पहले देखने को मिला था। जाहिर है, ऐसे में इसे व्यवस्था में बुनियादी बदलाव का प्रमाण नहीं माना जा सकता। क्योंकि परीक्षा संस्थाओं की जवाबदेही, प्रश्नपत्र की सुरक्षा, नियुक्तियों की पारदर्शिता, शिकायतों के निवारण और अधिकारियों की जिम्मेदारी तय करने की मूल व्यवस्था में कोई बड़ा परिवर्तन दिखाई नहीं देता। इसलिए व्यक्ति बदलने के बाद वही व्यवस्था फिर किसी दूसरे व्यक्ति को वैसा ही व्यवहार करने की ताकत दे सकती है।
चुनाव आयोग और SIR के मुद्दे पर राहुल गांधी और विपक्ष के कई दल भी लगातार आंदोलन कर रहे हैं। विपक्ष के इस संघर्ष का स्वाभाविक राजनीतिक लक्ष्य मौजूदा सत्ता को चुनौती देना और भविष्य में सत्ता परिवर्तन की जमीन तैयार करना है। सत्ता परिवर्तन लोकतंत्र का अनिवार्य हिस्सा है। लेकिन समस्या तब पैदा होती है, जब हम मान लेते हैं कि सत्ता बदलते ही व्यवस्था भी बदल जाएगी।
मान लीजिए कल सरकार बदल जाती है। नई सरकार आ जाती है। लेकिन चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति की प्रक्रिया वही रहती है, चुनाव आयोग की जवाबदेही का ढांचा वही रहता है, पुलिस और जांच एजेंसियों पर राजनीतिक प्रभाव का सवाल जस का तस रहता है और शिक्षा एवं परीक्षा संस्थाओं की स्वायत्तता का संकट बना रहता है तो क्या मूल समस्या खत्म हो जाएगी? नहीं।
आज जिस व्यवस्था की शिकायत विपक्ष कर रहा है, कल वही व्यवस्था उसके हाथ में भी आ सकती है। इसलिए किसी भी राजनीतिक आंदोलन के सामने असली सवाल होना चाहिए सत्ता में आने के बाद आप क्या बदलेंगे? सिर्फ यह कहना पर्याप्त नहीं है कि ‘हम आएंगे तो सब ठीक कर देंगे।’ जनता को यह जानने का अधिकार है कि संस्थाओं को स्वतंत्र और जवाबदेह बनाने के लिए ठोस कदम क्या होंगे।
भारत का आंदोलन इतिहास बहुत समृद्ध है। स्वतंत्रता आंदोलन से लेकर जेपी आंदोलन, चिपको आंदोलन, नर्मदा बचाओ आंदोलन, सूचना के अधिकार का संघर्ष और भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन तक अनेक आंदोलनों ने देश की राजनीति और समाज को प्रभावित किया।
जेपी आंदोलन का लक्ष्य केवल सरकार बदलना नहीं था। उसमें ‘सम्पूर्ण क्रांति’ की बात थी—राजनीतिक, सामाजिक, आर्थिक और नैतिक बदलाव की। सूचना के अधिकार का आंदोलन भी किसी एक सरकार के खिलाफ खड़ा आंदोलन नहीं था। गांवों में मजदूरी और सरकारी खर्च का हिसाब मांगने से शुरू हुआ संघर्ष धीरे-धीरे राष्ट्रीय कानून की मांग में बदला। वर्षों की जनसुनवाई, दस्तावेजों की पड़ताल और स्थानीय संघर्ष के बाद यह अधिकार कानून का रूप ले सका।
यानी आंदोलन केवल भीड़ से सफल नहीं होते। उनके पीछे विचार, अध्ययन, संगठन और लगातार काम करने की क्षमता होती है। 2011 का भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन भी इसका बड़ा उदाहरण है। उसने भ्रष्टाचार के सवाल को राष्ट्रीय राजनीति के केंद्र में ला दिया। लेकिन बाद में यह भी स्पष्ट हुआ कि सड़क पर पैदा हुई विशाल ऊर्जा को स्थायी संस्थागत सुधार में बदलना कितना कठिन है। सड़क पर मिली जीत और व्यवस्था में मिली जीत दो अलग चीजें हैं।
‘व्यवस्था परिवर्तन’ सुनने में बड़ा और आकर्षक शब्द है, लेकिन इसे ठोस सवालों में बदलना होगा। मुख्य चुनाव आयुक्त की नियुक्ति कैसे हो? चुनाव आयोग को राजनीतिक दबाव से मुक्त रखने की व्यवस्था क्या हो? मतदाता सूची में नाम जोड़ने और हटाने की प्रक्रिया कितनी पारदर्शी हो? किसी नागरिक का वोट प्रभावित करने वाले निर्णय की जवाबदेही किसकी हो? चुनाव आयोग के फैसलों की स्वतंत्र समीक्षा कैसे हो? राजनीतिक दलों के भीतर लोकतंत्र कैसे मजबूत हो? पुलिस और जांच एजेंसियों को राजनीतिक हस्तक्षेप से कैसे बचाया जाए? परीक्षा संस्थाओं की स्वायत्तता और जवाबदेही कैसे सुनिश्चित हो? विश्वविद्यालयों की स्वतंत्रता कैसे सुरक्षित रहे? इन सवालों के जवाब तैयार किए बिना ‘व्यवस्था परिवर्तन’ सिर्फ एक अच्छा नारा बनकर रह जाएगा।
अगर मौजूदा आंदोलन वास्तव में सत्ता परिवर्तन से आगे व्यवस्था परिवर्तन की ओर बढ़ना चाहता है तो उसे तीन चरणों में काम करना होगा—शिक्षण, प्रशिक्षण और संघर्ष। पहला चरण शिक्षण का है। युवाओं और आम नागरिकों को संविधान, चुनाव आयोग की शक्तियों, नियुक्ति प्रक्रियाओं और नागरिक अधिकारों की जानकारी देनी होगी।
दूसरा चरण प्रशिक्षण का है। सिर्फ नारे लगाने वाले युवाओं की नहीं, संविधान पढ़ने, कानून समझने, सरकारी दस्तावेजों की जांच करने, आंकड़ों का विश्लेषण करने और गलत सूचना से मुकाबला करने वाले नागरिकों की जरूरत है।
तीसरा चरण संघर्ष का है। तब आंदोलन केवल यह नहीं कहेगा कि ‘CEC इस्तीफा दो’, बल्कि यह भी कहेगा कि ‘CEC की नियुक्ति की प्रक्रिया बदलो।’ यही वह बिंदु होगा जहां आंदोलन व्यक्ति से संस्था की ओर बढ़ेगा।
भारत में आंदोलनों की एक कमजोरी यह रही है कि वे अक्सर किसी एक चेहरे के आसपास केंद्रित हो जाते हैं। लोकप्रिय चेहरा भीड़ जुटा सकता है, लेकिन व्यवस्था परिवर्तन किसी एक व्यक्ति के भरोसे नहीं हो सकता। लोकतंत्र को केवल नेताओं की ईमानदारी पर निर्भर नहीं किया जा सकता। मजबूत लोकतंत्र वह है जिसमें संस्थाएं इतनी मजबूत हों कि व्यक्ति बदलने से उनके मूल चरित्र में बदलाव न आए।
लेकिन बड़ा सवाल होगा कि युवाओं के आंदोलन के पास इस रैली के बाद का कार्यक्रम क्या है। क्या देश के अलग-अलग हिस्सों में संविधान और लोकतांत्रिक संस्थाओं को समझने के लिए नागरिक प्रशिक्षण होगा? क्या चुनावी संस्थाओं में सुधार का वैकल्पिक मॉडल तैयार होगा? क्या विशेषज्ञों, वकीलों, शिक्षकों, पत्रकारों और युवाओं को जोड़कर संस्थागत सुधार का मसौदा तैयार किया जाएगा? क्या राजनीतिक दलों से लिखित प्रतिबद्धता ली जाएगी कि सत्ता में आने पर वे इन सुधारों को लागू करेंगे? अगर ऐसा होता है तो यह एक बड़े लोकतांत्रिक आंदोलन की शुरुआत हो सकती है।
इसलिए अब सवाल बदलने की जरूरत है। सवाल सिर्फ यह नहीं कि सत्ता में कौन है। सवाल यह है कि सत्ता चलती कैसे है। सवाल यह होना चाहिए कि अगला नेता चाहे कोई भी हो, वह व्यवस्था को मनमाने ढंग से न चला सके। यही सत्ता परिवर्तन और व्यवस्था परिवर्तन के बीच का फर्क है।
इस काम की कठिनाई की एक बड़ी वजह यह भी है कि आजादी के 79 साल बाद भी हमारी शासन-व्यवस्था का बड़ा हिस्सा उस औपनिवेशिक ढांचे से बाहर नहीं निकल पाया है, जिसे अंग्रेजों ने भारत पर शासन करने के लिए बनाया था, भारत की जनता की सेवा के लिए नहीं।
अगर अब वास्तव में व्यवस्था परिवर्तन की बात हो रही है तो सबसे पहले नीयत और नजरिया बदलना होगा। जनता पर शासन करने के लिए बनाई गई व्यवस्था को जनता के प्रति जवाबदेह, संवेदनशील और जनकल्याणकारी व्यवस्था में बदलना होगा। पुलिस का काम नागरिक को डराना नहीं, उसकी सुरक्षा करना हो; प्रशासन का काम नागरिक पर अधिकार जताना नहीं, उसके अधिकार सुनिश्चित करना हो और सत्ता का अर्थ विशेषाधिकार नहीं, सार्वजनिक जिम्मेदारी हो। यह बदलाव आसान नहीं होगा, क्योंकि इसके लिए सिर्फ कानून नहीं, दशकों से चली आ रही प्रशासनिक संस्कृति और मानसिकता बदलनी होगी। लेकिन कठिन होना और असंभव होना दो अलग बातें हैं। अगर व्यवस्था बनाने की नीयत बदले तो व्यवस्था भी बदली जा सकती है। देश को केवल अच्छे शासकों की जरूरत नहीं है। उसे ऐसी अच्छी व्यवस्था की जरूरत है, जो बुरे शासकों से भी लोकतंत्र की रक्षा कर सके। (सप्रेस)