नदी और पहाड़ केवल प्रकृति के प्रतीक नहीं, बल्कि सभ्यता, संस्कृति और जीवन के आधार हैं। जब नदियाँ बीमार होती हैं और पहाड़ घायल होते हैं, तब समाज का संतुलन भी डगमगाने लगता है। आज जलवायु संकट, अंधाधुंध खनन और बढ़ते अतिक्रमण के बीच नदी-पहाड़ सम्मेलन प्रकृति, संविधान और जनभागीदारी के समन्वय से संरक्षण, पुनर्जनन और सतत विकास की नई दिशा तय करने का संकल्प है।
जब-जब जीवन की जटिलताएँ बढ़ती हैं, तब-तब मानवता और प्रकृति दोनों संकट में पड़ते हैं। आज कृत्रिम बुद्धिमत्ता और अंधाधुंध विकास के दौर में मनुष्य का नदी, पहाड़ और प्रकृति से संबंध कमजोर होता जा रहा है। नदियां बीमार हो रही हैं, लेकिन उनके उपचार और पुनर्जनन के लिए प्रभावी कानून का सर्वथा अभाव है। इसलिए अब नदी संरक्षण और नदी पुनर्जनन कानून की आवश्यकता शिद्दत से महसूस की जा रही है।
नदियां केवल जल का स्रोत नहीं, बल्कि सभ्यता, संस्कृति, अर्थव्यवस्था और जीवन का आधार हैं। दुनिया की अधिकांश सभ्यताएं नदियों के किनारे विकसित हुईं। आज अतिक्रमण, प्रदूषण और अत्यधिक दोहन के कारण नदियां अपनी पहचान खो रही हैं। कहीं वे सूख रही हैं, तो कहीं बाढ़ और विनाश का कारण बन रही हैं। नदियों का मरना, सभ्यता के संकट का संकेत है।
अपना भारत तेजी से जल संकट की ओर बढ़ रहा है। अनियंत्रित शहरीकरण, औद्योगीकरण, जल स्रोतों पर कब्जा, प्रदूषण और जलवायु परिवर्तन ने जल चक्र को असंतुलित कर दिया है। इसके कारण बाढ़ और सूखे की समस्या लगातार गंभीर होती जा रही हैं।
नदी पुनर्जनन केवल सफाई अभियान नहीं, वरन नदियों की प्राकृतिक, पारिस्थितिक और जलवैज्ञानिक संरचना को पुनर्जीवित करने की प्रक्रिया है। नदियों को उनके प्राकृतिक प्रवाह के साथ सुरक्षित रखना, अतिक्रमण रोकना, प्रदूषण पर नियंत्रण और जल के संतुलित उपयोग को सुनिश्चित करना इसकी मूल आवश्यकता है।
भारत का संविधान पर्यावरण संरक्षण को नागरिकों और स्थानीय संस्थाओं की जिम्मेदारी मानता है। ग्राम पंचायतों, नगर निकायों और स्थानीय समुदायों की सक्रिय भागीदारी के बिना जल संरक्षण संभव नहीं है। “नदी पंचायत” और “क्षेत्र सभा” जैसी व्यवस्थाएँ जल संरक्षण को जन आंदोलन का रूप दे सकती हैं।
मेरा स्पष्ट मानना है कि नदियों और जल स्रोतों की रक्षा के लिए कठोर कानून आवश्यक हैं। जल निकायों में अतिक्रमण, अवैध खनन, प्रदूषण और कचरा डालने पर सख्त रोक होनी चाहिए। साथ ही वर्षा जल संचयन, पारंपरिक जल स्रोतों का पुनर्जीवन और वृक्षारोपण को बढ़ावा देना होगा।
जल संरक्षण केवल वर्तमान की आवश्यकता नहीं, बल्कि आने वाली पीढ़ियों के प्रति हमारी जिम्मेदारी है। इसलिए नदी पुनर्जनन को सरकारी योजना नहीं, बल्कि राष्ट्रीय आंदोलन बनाना होगा। सरकार कानून बनाए, स्थानीय संस्थाएं उसे लागू करें और नागरिक सक्रिय भागीदारी निभाएँ। नदियों को बचाना ही जीवन और भविष्य को बचाना है।
आपको पता ही है कि अरावली धरती के गर्भ से निकली एक समग्र पर्वतमाला है। इसकी पूरी पारिस्थितिकी चाहे जमीन के भीतर हो या बाहरः समान संरक्षण की मांग करती है। इसी सोच के आधार पर उच्चतम न्यायालय ने अरावली क्षेत्र में खनन पर सख्ती और संरक्षण के लिए ठोस व्यवस्था बनाने का निर्देश दिया है।
कोप-30, बेलेम (ब्राजील) में भी यह स्वीकार किया गया कि अनियंत्रित खनन और जंगलों की कटाई ने अमेज़न जैसे वर्षावनों को भारी नुकसान पहुंचाया है। इसी कारण स्थानीय और आदिवासी समुदायों की भागीदारी को जंगल संरक्षण का आधार माना गया। यह सोच भारत में अरावली संरक्षण के संघर्ष से भी मेल खाती है।
दरअसल, अरावली भारत की प्राकृतिक और सांस्कृतिक विरासत है। सामान्य खनिजों के लिए पर्वत काटना, जंगल नष्ट करना और नई खदानें खोलना पर्यावरण, जल स्रोतों और जलवायु तीनों के लिए गंभीर खतरा है। केवल राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़े अत्यावश्यक खनिजों के मामले में सीमित छूट दी गई है।
अरावली को बचाने की आवाज सबसे पहले 1980 के दशक के अंत में जोरदार तरीके से उठी। तरुण भारत संघ ने 1988 से अरावली में हो रहे अंधाधुंध खनन, जंगल विनाश और जल स्रोतों के संकट के खिलाफ अभियान शुरू किया। 1991 में सुप्रीम कोर्ट में जनहित याचिका दायर की गई, जिसके बाद सरिस्का क्षेत्र की सैकड़ों खदानों को बंद करने का ऐतिहासिक आदेश आया। यह केवल कानूनी लड़ाई नहीं थी, बल्कि जल, जंगल और जीवन बचाने का जन आंदोलन था।
आपको याद दिलाता चलूं कि 2 अक्टूबर 1993 को गुजरात के हिम्मतनगर से दिल्ली तक पदयात्रा निकालकर अरावली संरक्षण की मांग को राष्ट्रीय स्तर पर उठाया गया। इस संघर्ष का असर यह हुआ कि हजारों अवैध खदानों पर रोक लगी और कई क्षेत्रों में अरावली का प्राकृतिक पुनर्जीवन शुरू हुआ। जहां खनन रुका, वहां जल स्रोत लौटे, जंगल बढ़े और भूजल स्तर में सुधार आया। यह परिवर्तन था।
लेकिन बाद के वर्षों में कई स्थानों पर अवैध खनन फिर शुरू हो गया, जिससे जल संकट और पर्यावरणीय क्षति बढ़ती गई। फरीदाबाद, नूंह, गुरुग्राम और राजस्थान के कई हिस्से इसके उदाहरण हैं। इसलिए आज फिर अरावली को समग्र रूप से बचाने की आवश्यकता महसूस की जा रही है।
20 नवंबर 2025 को ब्राजील में आयोजित वैश्विक सम्मेलन में जलवायु परिवर्तन के संकट से निपटने के लिए दुनिया के जंगलों, नदियों और पहाड़ों को बचाने पर व्यापक सहमति बनी। भारत सहित अनेक देशों ने पारदर्शी व्यवस्था और साझा तंत्र विकसित करने की दिशा में पहल की।
विश्व पृथ्वी शिखर सम्मेलन में ब्राजील के राष्ट्रपति ने कहा था कि जलवायु परिवर्तन का सबसे बड़ा कारण जंगलों का लगातार कम होना है। इसी उद्देश्य से अमेज़न क्षेत्र के बेले शहर में यह सम्मेलन आयोजित किया गया, ताकि पूरी दुनिया प्रकृति संरक्षण के लिए सामूहिक प्रयास कर सके।
इसी दौरान भारत में भी संविधान के अनुच्छेद 253 के आलोक में पर्यावरण संरक्षण से जुड़े प्रयासों की शुरुआत हुई। उसी दिन यानी 20 नवंबर 2025 को उच्चतम न्यायालय ने अरावली पर्वतमाला की परिभाषा से संबंधित एक आदेश दिया, जिस पर व्यापक बहस हुई। संविधान का अनुच्छेद 21 प्रत्येक नागरिक को स्वस्थ और सुरक्षित जीवन का अधिकार देता है। जनभावनाओं और लोकतांत्रिक आवाज़ों के बाद न्यायालय ने अपने निर्णय पर पुनर्विचार किया। इस पूरी प्रक्रिया ने नदी और पहाड़ों की सुरक्षा के लिए स्पष्ट कानून बनाने की आवश्यकता को और मजबूत किया।
उच्चतम न्यायालय ने स्पष्ट किया है कि अरावली को राज्यों की सीमाओं में बांटकर नहीं देखा जा सकता। यह एक अखंड पर्वतमाला है, जिसके जंगल, जल स्रोत, वन्यजीव और आदिवासी समुदाय सभी का संरक्षण समान रूप से जरूरी है। अरावली को बचाना केवल एक पर्वतमाला को बचाना नहीं, बल्कि भारत के जल, जलवायु और भविष्य को सुरक्षित रखना है।
मैंने अपने इस विचार को श्री सरयू राय जी के समक्ष रखा। उनके सहयोग और दूरदर्शिता से नदी-पहाड़ सम्मेलन आयोजित करने की दिशा बनी। अब समय आ गया है कि नदियों और पहाड़ों की सुरक्षा के लिए प्रभावी कानून तैयार किए जाएं। मानव सभ्यता का इतिहास प्रकृति के साथ उसके संबंधों का इतिहास है। प्राचीन काल में जब प्रकृति के साथ संतुलन बना हुआ था, तब जंगल, नदियां और पहाड़ सुरक्षित थे। लेकिन जैसे-जैसे लालच, अतिक्रमण और शोषण बढ़ा, प्रकृति का संतुलन भी बिगड़ता गया। भारतीय परंपरा और पुराणों में भी प्रकृति संरक्षण के अनेक संदेश मिलते हैं।
आज के दौर में नदियों और पहाड़ों पर सबसे बड़ा संकट अंधाधुंध खनन, जल दोहन, प्रदूषण और अतिक्रमण का है। इसका समाधान केवल तकनीक या कृत्रिम बुद्धिमत्ता से संभव नहीं है। इसके लिए प्रकृति, संस्कृति और संविधान तीनों के समन्वय की आवश्यकता है।
जब तक हमारा समाज प्रकृति के साथ संतुलन बनाकर चलता रहा, तब तक हमारी अर्थव्यवस्था और जीवन व्यवस्था मजबूत रही। लेकिन पंचमहाभूतों, जल, वायु, अग्नि, पृथ्वी और आकाश से दूरी बढ़ने के कारण आज जलवायु परिवर्तन का संकट लगातार गहराता जा रहा है।
इस संकट से बचने का सबसे मजबूत आधार हमारा संविधान है। संविधान के सम्मान और जनसहभागिता के माध्यम से ही नदियों, पहाड़ों और पर्यावरण की रक्षा संभव है। यही नदी-पहाड़ सम्मेलन का मूल उद्देश्य है।


