Gandhi 150

किसान के लिए भी है, ‘गांधी का ताबीज’

आजकल किसानों और किसानी से जुडे लोगों के बीच भारी बेचैनी दिखाई दे रही है। हाल में केन्‍द्र सरकार द्वारा संसद में पारित करवाए गए तीन कानूनों को लेकर देशभर में धरना, प्रदर्शन, चक्‍काजाम और रैलियां जारी हैं। क्‍या किसानी…

खोट गांधी की प्रासंगिकता में नहीं, हमारे साहस में है !

महात्‍मा गांधी : 150वां जयंती वर्ष   गांधी की ज़रूरत के प्रति एक ईमानदार अभिव्यक्ति की पहली शर्त ही यही है कि हम इन हिंसक आत्मघाती दस्तों का अहिंसक और शांतिपूर्ण तरीक़ों से प्रतिकार करने के लिए अपने शरीरों के…

विन्सेंट शीनः जिसने कहा था कि गांधी कभी भी मारे जा सकते हैं

विन्सेंट शीन लिखते हैं कि गांधी ने पूरी दुनिया की आत्म का छू लिया था। गांधी पर 1927 में रेने फुलम मिलर ने एक किताब लिखी। उसका शीर्षक था- लेनिन एंड गांधी। लेकिन तब तक गांधी को गंभीरता से नहीं…

गांधी महज सिद्धांत नहीं, व्यवहार हैं

2 अक्‍टूबर : गांधी जयंती पर विशेष आज के समय में सर्वाधिक उपयुक्‍त,सक्षम और सर्वजन-हिताय विचार महात्‍मा गांधी की कथनी और करनी से लिए जा सकते हैं। गांधी के विचार केवल भारत या भारतीय उपमहाद्वीप भर के लिए नहीं हैं,…

स्वराज नहीं है, अंग्रेजी राज की समाप्ति

अगस्‍त ’47 में मिली आजादी ने क्‍या सचमुच हमें आजाद कर दिया था? क्‍या हम अपनी जरूरतों, संसाधनों और क्षमताओं के हिसाब से अपना विकास कर पाने के लिए स्‍वतंत्र हुए थे? और यदि यह हुआ था तो फिर हमारी…

‘गांधी-150’ : अपनी अप्रासंगिकता का पड़ाव

आज, महात्‍मा गांधी को विदा हुए सात दशकों बाद, कोई यदि उन्‍हें समझना, आत्‍मसात करना और जीवन में उतारना चाहे तो क्‍या करे? गांधी को साक्षात देखने और साथ काम करने वाले संगी-साथी और उनकी बनाई संस्‍थाएं अब नकारा हो…

गांव, गरीब और पेड़ के लिए सत्याग्रह

पांच जून को गांधी विचार को मानने वाले देशभर के अनेक लोगों ने दो अक्‍टूबर, गांधी जयन्‍ती और ‘विश्‍व अहिंसा दिवस’ तक चलने वाले एक-एक दिन के उपवास की शुरुआत की थी। यह उपवास श्रमिकों, किसानों, ग्रामीण-अर्थव्यवस्था और पर्यावरण को…

स्वयं की मुक्ति का उदघोष

हम राजनीतिक रूप से स्वतंत्र अवश्य हो गए हैं परंतु अभी भी मानसिक तौर पर उपनिवेशवाद की स्थिति से मुक्त नहीं हो पाए हैं। इस बीच कारपोरेटीकरण एवं वैश्वीकरण ने नए तरह के उपनिवेशवाद को हमारे ऊपर लाद दिया है।…

मतभेद निपटाने की गांधी की कला

एक तरह से देखें तो गांधी का समूचा जीवन मतभेदों से निपटते ही बीता, भले ही वे मतभेद संगी-साथियों, परिवार और धुर विरोधी विचारों के हों या फिर अपने हित साधने में लगी देशी-विदेशी सत्ताओं के। इन मतभेदों से निपटने…

संकट में साबरमती आश्रम

क्या गांधी को कोई ‘वल्र्ड क्लास’ बना सकता है? सब जानते हैं कि गांधी ने बार-बार अपने जीवन को ही अपना संदेश निरूपित किया है, यानि वे जहां, जैसे रहे-बसे, वह उनके संदेश के दर्जे का हो गया। आजकल अहमदाबाद…